किसान जानें उचित एवं लाभकारी मूल्य (एफ.आरपी) का गणित

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कृषकों की मांगों को स्वीकारते हुये भारत सरकार ने कृषकों को ‘‘उचित एवं लाभकारी मूल्य’’ में भी वृद्धि की है, ऐसे में कारखानों द्वारा गन्ना मूल्य भुगतान में देरी के सन्दर्भ में कृषकों को एफ.आरपी का गणित एवं भविष्य में शासन से अपेक्षाओं की जानकारी होना आवश्यक है।
भारत सरकार हमेशा प्राईस एवं कास्ट कमीशन (कृषि मूल्य आयोग) की अनुशंसा अनुसार वर्ष 1963-64 से न्यूनतम गन्ना मूल्य घोषित करती आई है। लेकिन वर्ष 2009-10 उपरांत कृषि आदानों के मूल्यों एवं अन्य प्रतिस्पर्धी फसलों को ध्यान में रखते हुये शासन ने मूल्य निर्धारण प्रक्रिया में बदलाव कर ‘‘उचित एवं लाभकारी मूल्य’’ (एफ.आरपी) की घोषणा करना प्रारम्भ किया। इसकी अनुशंसा के लिये कृषक संघों, शक्कर उद्योग, उपभोक्ता प्रतिनिधियों एवं राज्य सरकारों से गहन चर्चा की जाती है। इस प्रक्रिया में गन्ने का लागत मूूल्य, कृषकों को अन्य फसलों से मिलने वाला लाभ एवं अन्य जिन्सों के बाजार भाव, उद्योगों द्वारा उपभोक्ताओं को बेंची जानी वाली शक्कर के उचित भावों का ध्यान रखा जाता है। गन्ना मिलों को प्राप्त गन्ने से शक्कर का पड़ता (रिकवरी), उप उत्पादों जैसे- मोलेसिस, प्रेसमड एवं बगास आदि से होने वाली अनुमानित आय के साथ-साथ गन्ना उत्पादकों के सम्भावित खतरों एवं लाभांश का भी ध्यान रखा जाता है।
कृषकों को अपने खेतों हेतु लाभकारी फसल योजना बनाने हेतु अगले सीजन का गन्ना मूल्य (एफ.आरपी) लगभग 14 माह पहले ही घोषित कर दिया जाता है। प्राईस एण्ड कास्ट कमीशन द्वारा 2010-11 से 2015-16 तक घोषित एफ.आरपी की गणना करने में गन्ने के उत्पादन का औसत लागत मूल्य, ट्रान्सपोर्टेशन एवं बीमा एवं संभावित लाभ का ब्यौरा तालिका-1 में दिया गया है।
इसके अनुसार अगले वर्ष 2015-16 का गन्ना एफ.आरपी रू. 230/- प्रति क्विंटल 9.5 प्रतिशत रिकवरी पर घोषित किया है। इसके अतिरिक्त प्रति 0.1 प्रतिशत रिकवरी पर रू 2.42/- प्रति क्विंटल अतिरिक्त देय होगा। इस तरह अगले वर्ष का रिकवरी मान से शक्कर कारखाने उदाहरणतया निम्नलिखित गन्ना मूल्य देने को तैयार रहें फिर चाहे शक्कर भाव कुछ भी हों ! 9.5 प्रतिशत पर रू. 230/, 10 प्रतिशत पर रू. 242.10/-,10.5 प्रतिशत पर रू. 254.20/-, 11 प्रतिशत पर रू. 266.30/- प्रति क्विंटल आदि। उपरोक्त तालिका से यह भी स्पष्ट है कि वर्ष 2010 से 2015 तक जैसे-जैसे एफ.आरपी बढ़ी है, लाभ का अंश रू 38.31/- से घटकर रू 6/- पर आ गया है, जो चिंता का विषय है।

राजस्व विभाजन आधार पर गन्ना मूल्य :
गन्ना एवं कृषि आदानों एवं शक्कर के बढ़ते मूल्यों के साथ गिरते शक्कर भावों की नूराकुुश्ती से निपटने के लिये भारत सरकार द्वारा गठित रंगराजन कमेटी ने राजस्व विभाजन आधार पर गन्ने की मूल्य नीति घोषित की है। इसके अनुसार गन्ना मूल्य निर्धारण, शक्कर एवं उप उत्पादों से प्राप्त कुल आय का 70 प्रतिशत या केवल उत्पादित शक्कर के मूल्य आधार पर 75 प्रतिशत कृषक भागीदारी रखने की अनुशंसा की है। इस फार्मुले के आधार पर भुगतान 2 किश्तों में सुझाया गया है प्रथम शासन द्वारा घोषित एफ.आरपी की पूर्ण राशि वैधानिक अवधि में एवं दूसरी किश्त या बाकी बचा गन्ना मूल्य भुगतान कारखाने की पिराई सत्र बन्द होने पर। दोनों दशाओं में कृषक को मिलने वाला न्यूनतम भुगतान निर्धारित एफ.आरपी से कम नहीं होगा।
इस फार्मुले को महाराष्ट्र एवं कर्नाटक प्रदेशों ने मान्यता दी है। उत्तर प्रदेश में भी कई कारखानें इस ओर प्रयासशील हैं। कृषकों की असहमति एवं विरोध के स्वरों की मुखरता भी छुपी नहीं है। देखें- भविष्य में कितनी सफलता मिलती हैं ?

शक्कर उद्योग की पीड़ा

शक्कर उद्योग की खस्ता हालत का सूत्रपात तब हुआ जब कुछ राज्य सरकारों जैसे-उत्तर प्रदेश, हरियाणा, तमिलनाडू आदि ने उपरोक्त वैज्ञानिक समीकरण के ऊपर राज्य समर्थित मूल्य रू. 280-290 तक घोषणा कर कारखानों को भुगतान करना वैधानिक कर दिया। अच्छे गन्ना मूल्यों के समर्थन में गन्ने का मूल्य एवं क्षेत्रफल तो बढ़ा पर शक्कर के दाम धरातल छू गये। बढ़े मूल्यों के भुगतान की कारखानों में क्षमता ही नहीं थी। शक्कर उद्योगपतियों का मत है कि गन्ने के अधिक भावों को देने में ऐतराज नहीं हैं, उनकी पीड़ा तो शक्कर के भावों के कम होने की है। उचित एवं लाभकारी मूल्यों की बात गन्ने के साथ ही शक्कर पर भी उतनी ही लागू होती है। अगर कोई राज्य एफ.आरपी के ऊपर गन्ना भाव देने की अनुशंसा करता है तो उस भाव के अंतर का वित्तीय भार उसी राज्य को वहन करना चाहिये, जैसा कि कुछ राज्य गेहूं, धान आदि खाद्यानों की खरीद में कर रहे हैं। अधिकांश कृषकों का यह मानना है कि लाभकारी मूल्य तो मिलना ही चाहिये पर इससे भी आवश्यक यह है कि भुगतान समय सीमा में हो।

कृषकों हेतु गन्ना मूल्य भुगतान की समस्या सबसे अधिक उन राज्यों में है जहां अतिरिक्त राज्य अनुशंसित मूल्य घोषित किये जाते हैं। उत्तर प्रदेश राज्य में है आज 3000 हजार करोड़ से अधिक की देनदारी शेष है। ऐसा लगता है कि उत्तर प्रदेश जैसे शक्कर समृद्ध प्रदेश जहां शक्कर रिकवरी कम एवं गन्ना मूल्य अधिक हैं के हालात ऐसे नजर आ रहे हैं कि जहां से वापसी कठिन है। मध्य मार्च माह तक महाराष्ट्र की 176 मिलों में से केवल 25 से 27 मिलें ही ऐसी हैं जो गन्ना किसानों को एफ.आरपी दे पा रहीं हैं। शेष मिलों पर लगभग रू 1500 करोड़ का बकाया है। यह सुखद है कि मध्यप्रदेश में कृषकों का पिछले साल का गन्ना मूल्य भुगतान शेष नहीं है पर इस वर्ष कारखाने भुगतान मं कठिनाई महसूस कर रहे हैं।

कृषकों को गन्ने का सहारा:
उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र आदि प्रदेशों में गन्ना भुगतान में अनेकों कठिनाईयों के वावजूद कृषकों का मानना है कि ओला, पाला, असमय वर्षा की मार जैसी मौसम की विपरीत स्थितियों को झेलने में सफल फसल गन्ना ही है, जो अपने आप में कृषि का बीमा है। इसी कारण इन हालातों में भी गन्ना क्षेत्रफल में गिरावट नहीं देखी|

राष्ट्रीय स्तर पर विचारने योग्य बिन्दु
कुछ महत्वपूर्ण विचारणीय बिन्दु यहां सुझाये जा रहे हैं जिनसे शक्कर उद्योग की दशा में सुधार की संभावनाएं हैं।
चालू एवं भावी सौदों की गारण्टी : अब कारखाने जब चाहें सुविधानुसार शक्कर बेचने को स्वतंत्र हैं इसके कारण कारखानों को बाजार भाव एवं इसके साथ भावी बाजार की बेहतर सूचना एवं मूल्यांकन होना आवश्यक है। आवश्यकता है कि उद्योग एक ऐसा मंच स्थापित करे जिससे बिक्री हेतु ‘‘चालू एवं भावी सौदों’’ की गारण्टी मिल सके। वैश्विक फ्यूचर मार्केट बहुत सुदृढ़ है इसलिये भारतीय बाजार उससे जुड़कर घाटे से बच सकता है एवं शक्कर भावों को स्थिरता प्रदान कर सकता है।
भावी युक्तिपूर्ण आरक्षित भण्डार (स्ट्रेटेजिक शुगर रिजर्व) : पुरानी बफर स्टॉक रखने की नीति में संशोधन कर अगर शासन उपभोग से अधिक उत्पादित 20-30 लाख टन शक्कर उचित भाव पर खरीद कर एक ‘‘स्ट्रेटेजिक रिजर्व’’ बना दे। इसके भण्डारण हेतु कारखानों के गोदामों का उपयोग किया जा सकता है। शासन इस शक्कर का उपयोग घरेलू पी.डी.एस. या विदेशी बाजारों हेतु कर सकती है। इससे कारखानों को गन्ना मूल्य भुगतान में राहत मिलेगी एवं अगले वर्ष के केरी ओवर स्टॉक के कारण मंदी की भावना से भी निजात मिलेगी।
उत्पादित शक्कर के निर्यात पर अनुदान : भारत सरकार ने कच्ची शक्कर के उत्पादन एवं निर्यात पर रू 4,000/- प्रति टन अनुदान दिया है। इसके अन्तर्गत 1.4 मिलियन टन कच्ची शक्कर वर्ष 2014-15 में निर्यात की जायेगी। इस पिराई सत्र में देर से ही सही यह घोषणा एक स्वागत योग्य कदम है। इसका सही असर आगामी पिराई सत्र में दिखाई देगा। वैश्विक मन्दी के कारण भारतीय शक्कर को प्रतिस्पर्धी बनाने हेतु इसमें और अधिक बढ़ोत्तरी की जाना आवश्यक है।
आयात शुल्क बढ़ाना आवश्यक है : शक्कर के मूल्य फिलहाल चिन्तनीय ही रहेंगे क्योंकि वैश्विक बाजार में शक्कर की बाढ़ आने के कारण, मंदी का वातावरण होने से, निर्यात संभावनायें धूमिल हैं। विदेशी सस्ती शक्कर भारत में न आ सके इसको रोकने हेतु यह आवश्यक है कि आयात शुल्क को 25 प्रतिशत से बढ़ाकर 40 प्रतिशत से भी अधिक किया जावे।
उप उत्पाद आधारित उद्योगों को प्रोत्साहन: भारत सरकार को पेट्रोल के साथ 5 प्रतिशत इथेनाल मिलाने की बाध्यता सख्ती से लागू करनी होगी, जिससे देश की 800 मिलियन डॉलर की विदेशी मुद्रा बच सकेगी। इस तरह कारखानों में लाभ वृद्धि होगी एवं शक्कर बनाने पर दबाव कम होगा। इसी तरह बगास आधारित हरित उर्जा को प्रोत्साहन, उद्योग की सुदृढ़ आर्थिक स्थिति में सहायक होगा।
वित्तीय सहायता (सुफासु) का पुन: नियोजन : वर्ष 2014 में दी गई वित्तीय सहायता (सुफासु) का मारोटोरियम पीरियड दिसम्बर-2015 में समाप्त हो रहा है। शक्कर के भावों एवं गन्ना भुगतान की बकाया राशि के भार के कारण इस अवधि में 3 से 5 साल की छूट दी जावे। इस स्कीम में 2013-14 को आधार माना गया था पर वर्तमान परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुये इस स्कीम में 2014-15 की अनुमानित एक्साइज डयूटी को शामिल कर सहायता की राशि को रीशेड्यूल (पुन: नियोजन)किया जावे।

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