अधिक उत्पादकता वाले बीज-एक चुनौती

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बीज ने विश्व की जैव क्रान्ति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। क्योंकि फसलों की उत्पादकता का सीधा संबंध लगाये गये बीज की आनुवांशिक क्षमता पर निर्भर करता है। फसल उत्पादन में अकेला बीज उत्पादन का 15-20 प्रतिशत का योगदान देता है। उचित प्रबंधन कर इस योगदान को 45 प्रतिशत तक पहुंचाया जा सकता है। बीज के महत्व को प्राचीनकाल से ही समझा जाता रहा है। मनु (200 वर्ष ईसा पूर्व) ने कहा था अच्छा बीज, अच्छी भूमि में बहुतायत उत्पादन देता है। बीज किसी की बपोती नहीं, यह तो जीवन को जीवन का उपहार है।

भारत में कृषि विकास का आधार ही बीज है। सन् 1871 में उस समय पड़े आकाल पर बने आयोग की रपट आने के बाद ही भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का गठन पूसा, बिहार में हुआ। इसके पश्चात 1905 से 1907 के बीच 6 कृषि महाविद्यालयों का गठन कृषि क्षेत्र के लिए किया गया। देश में पहली बीज कम्पनी सटोन एंड संस की स्थापना कोलकाता में वर्ष 1912 में हुई। बीज का महत्व रायल कमिशन आन एग्रीकल्चर की 1925 में रपट आने के बाद और बढ़ गया जिसमें उन्नत बीजों के आरंभ करने व विस्तार की अनुशंसा की गयी थी। स्वतंत्र भारत में बीज को लेकर सबसे बड़ा निर्णय 1963 में राष्ट्रीय बीज निगम की स्थापना के रूप में हुआ। राष्ट्रीय बीज निगम यह ऐसी संस्था बनी जिसे सभी फसलों के बीज प्रमाणीकरण का दायित्व मिला। इसके पश्चात 1966 में भारतीय संसद द्वारा बीज एक्ट पारित किया गया ताकि बीज की गुणवत्ता को संरक्षित किया जा सके। 1968 में बीज नियम पूरे भारत में लागू किये गये ताकि बीज संबंधी मुद्दों का निराकरण किया जा सके। बीसवीं शताब्दी का छटा दशक भारतीय कृषि इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण दशक रहा है। जहां गेहूं तथा धान की अधिक उत्पादन देने वाली जातियों का पदार्पण हुआ वहीं बीज के संबंध में सकारात्मक नियम भी सामने आये और बीज के महत्व को किसानों द्वारा भी मान्यता मिली। बीज उद्योग के लिये 1988-89 में बनाई गई बीज विकास नीति भी मील का पत्थर साबित हुई, जिसने इस उद्योग का रूप ही बदल दिया और जिसके परिणाम हम सबके सामने हैं।
वर्तमान में 15 राज्य बीज निगम तथा राष्ट्रीय स्तर के (राष्ट्रीय बीज निगम तथा स्टेट फार्म कार्पोरेशन आफ इंडिया) देश में बीज का कार्य कर रहे हैं। इसके साथ ही 1979 में आरंभ किये गये ‘राष्ट्रीय बीज परियोजना के 14 केंद्र जो कृषि विश्वविद्यालयों में स्थित हैं बीज संबंधित कार्य में लगे हुए हैं। बीज की गुणवत्ता को परखने तथा उसके प्रमाणीकरण हेतु देश में 22 राज्य बीज प्रमाणीकरण संस्था तथा 104 राज्य बीज प्रयोगशाला भी कार्य कर रही है।
इतने प्रयासों के बाद भी पर्याप्त मात्रा में उन्नत बीजों का समय से किसानों तक न पहुंच पाना एक गंभीर चिन्ता का विषय है। साथ ही दलहन तथा तिलहन फसलों के अधिक पैदावार देने वाली बीज वैज्ञानिकों के लिये चुनौती बने हुए हैं।

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