ट्राइकोडर्मा मित्र फफूंद से भूमि से आए रोग मिटाएं

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उपचार विधि– बीजोपचार : फसल जो कि भूमि जनित कवक रोगों से ग्रसित हैं उनके बीजों को बीजोपचार के लिए किसी साफ बर्तन में रखें, बीजों पर थोड़े से पानी के छीटें देकर बीजों में 6-10 ग्राम ट्राईकोडर्मा संवर्धन प्रति किलो बीज की दर से मिलाकर अच्छी तरह से उलट-पलट दें तथा यह भी देख लेना चाहिए कि संवर्धन की एक समान परत बीजों के चारों ओर चिपक गई है। फिर बाद में बीज की बुआई करें। बुआई से पहले बीजों का बीजोपचार एक निश्चित क्रम में ही करें।

मृदा में विभिन्न रोग मृदा जनित कवकों द्वारा उत्पन्न दलहनी, तिलहनी, सब्जियों एवं नकदी फसलों जैसे- कपास, मूंगफली, चना, जीरा  आदि में सर्वाधिक नुकसान पहुंचाते हैं। मृदा जनित कवकों से जड़ गलन, तना गलन, कॉलर रॉट, उखटा आदि रोग उत्पन्न होते हैं। इन रोगों की रोकथाम के लिए ट्राइकोडर्मा नामक मित्र फफूंद विकसित की गई हैं। यह ट्राईकोडर्मा मृदा में स्थित रोग उत्पन्न करने वाले हानिकारक कवकों की वृद्धि रोककर उन्हें धीरे-धीरे नष्ट करता हैं। जिससे ये हानिकारक कवक फसलों की जड़ों के आसपास नहीं पनपते है और रोग उत्पन्न करने में असमर्थ हो जाते हैं।

पहले बीज को क्रमश: थाइरम (2.5 ग्राम), फिर कीटनाशी (सिफारिशानुसार), फिर राइजोबियम कल्चर और अंत में ट्राईकोडर्मा कल्चर (10 ग्राम) से बीजोपचार करें।
यह विधि है: फफूंदनाशी-कीटनाशी-रायजोबियम, ट्राईकोडर्मा संवर्धन।
उपचार से लाभ :-

  • ट्राईकोडर्मा अनेक फसलों जैसे- कपास, मूंगफली, चना, अरहर, सरसों आदि में भूमि जनित फफूंद रोगों जैसे- जड़ गलन, उखटा तथा तना गलन के नियंत्रण में प्रभावी है।
  • इसके संवर्धन से पोषक तत्व उपलब्धता बढ़ जाती है।
  • पौधों का उचित विकास और अधिक उत्पादन प्राप्त होता हैं।
  • यह वायुमंडलीय नत्रजन स्थिर करने वाले जीवाणु राइजोबियम, एजेटोबेक्टर, एजोस्पाईरिलम तथा फॉस्फेट विलेयक जीवाणु (पी.एस.बी.) आधारित संवर्धनों (कल्चर) के साथ उपचार योग्य हैं।
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