टमाटर में नाशीजीव प्रबंधन

www.krishakjagat.org
Share

प्रमुख कीट
फल भेदक : यह एक सर्वभक्षी कीट है। इस कीट का प्रकोप मार्च-अप्रैल में अधिक होता है। इस कीट की मादा लगभग 200-500 गोल, पीले रंग के अण्डे एक-एक या समूह में पत्तियों पर देती है। 5-7 दिन में सुण्डी निकलती है। सुण्डियाँ हल्की पीले-हरे रंग की होती हैं। तथा दोनों किनारों पर पीली धारियाँ होती हैं। यह सुण्डी कोमल पत्तियों, शाखाओं तथा फूलों को नुकसान पहुँचाती है व फल लगने पर टमाटर के फल में गोल छेद करके शरीर का आधा भाग अंदर घुसाकर फल का आन्तरिक भाग खाती है, जिसके कारण फल बिल्कुल खराब हो जाता है।

तम्बाकू की सुण्डी: इस कीट के पंतगे लगभग 200 अण्डे समूह में पत्ती के निचली सतह पर देते हैं। 3-4 दिनों में सुण्डी बाहर निकल जाती है, जो पत्तों को खुरचकर खाती है तथा बड़ी अवस्था की सुण्डियाँ पत्तों को गोल-गोल काटकर खा जाती है।
सफेद मक्खी: यह कीट छोटे, सफेद पंखवाले एवं पीले शरीर वाले होते है। मादा पत्तियों के निचली सतह पर पीले रंग के अण्डे पर एक-एक करके देती है। वयस्क व शिशु पत्तियों का रस चूसकर उनको कमजोर बना देते हैं, जिनके कारण पत्तियाँ मुड़ जाती है साथ ही शहद जैसा चिपचिपा पदार्थ छोड़ती हैं। जिसके ऊपर फफूंद उत्पन्न होकर बाद में पतियों को काला कर देती हैं। तथा अधिक प्रकोप होने पर सूख जाती है। वयस्क कीट फसल में पर्णकुंचन बीमारी का वायरस फैलाने का काम करता है।
पर्णजीवी: वयस्क मादा पौधे के हरे भागों पर किडनी के आकार के अण्डे एक-एक करके देती है। वयस्क कीट स्लेडरनुमा पीलापन लिये हुए भूरे रंग का होता है। शिशु छोटे पंख रहित लेकिन आकार एवं रंग में वयस्क से मिलते-जुलते हैं। वयस्क व शिशु दोनों ही पत्तियों को खुरचकर निकलने वाले रस को चूसते हैं। अधिक प्रकोप की अवस्था में पत्तियाँ मुड़ जाती हैं। पौधों की बढ़वार रूक जाती है। पौधा झुलसा हुआ दिखाई देता है तथा कभी-कभी सूख भी जाता है।
हरा तेला: मादा पीले रंग के अण्डे पत्तियों की नीचे की तरफ शिराओं पर देती है। अण्डों से शिशु निकलकर पत्तियोंं से रस चूसते रहते हैं। यह हरे रगं के कीट हमेशा पत्तियों के निचली सतह पर बैठे देखे जा सकते हैं। इस कीट से ग्रसित पौधे में बौनापन और पत्तियां किनारों से मुड़ कर भूरी पड जाती है। व सूख जाती है।

 

लाल मकड़ी/बरूथी: इस कीट के शिशु व वयस्क पत्तियों की निचली सतह एवं टहनियों से रस चूसते हैं, जिससे पत्तियाँ लाल भूरे रंग की हो जाती है और मुड़कर सूख जाती हैं।

 

नर्सरी अवस्था मेें प्रबंधन

  • गर्मियों में पौधशाला में बीजों की बुवाई से पूर्व मिट्टी को 0.45 मोटी पॉलिथीन शीट से ढक्कर सूर्यीकरण विधि से निर्जलीकृत करें।
  • जल निकास एवं जड़ सडऩ रोग से बचाव हेतु नर्सरी का निर्माण 10 सेमी ऊँचाई पर करना चाहिए।
  • पौधों के पास अधिक आद्र्रता नहीं होनी चाहिए। इसलिए समयानुसार ही पानी दें।
  • रोग व कीट ग्रसित अंकुरों को नर्सरी से निकालकर नष्ट कर देना चाहिए।
  • बीज घने नहीं बोने चाहिए।
  • कीटों की रोकथाम के लिए 1 प्रतिशत नीम के सत्व का छिड़काव करें।
  • पौधशाला को खेत में एक ही जगह लगातार नहीं उगाना चाहिए।
  • रोपाई से पूर्व पौधों की जड़ों को ट्राइकोडर्मा विरडी 100 ग्राम प्रति लीटर पानी से दस मिनट के लिए घोल में उपचारित कर रोपाई करें ।रोपाई से फसल की कटाई तक
  • ग्रीष्मकालीन खेत की गहरी जुताई करें ताकि ज़मीन में दबे कीट व फफूंद तेज गर्मी से नष्ट हो जाएं।
  • खेत मेें पड़े अवशेष, खरपतवार व अन्य वैकल्पिक पौधों को इकट्ठा कर नष्ट कर दें।
  • पौधों की रोपाई उचित दूरी व 6-10 इंच ऊँची मेढ़ बनाकर करें।
  • आवश्यकतानुसार ही सिंचाई करें।
  • फसल चक्रका चुनाव करें।
  • सूत्रकृमि नियंत्रण हेतु फसल चक्र में अनाज वाली फसलों को लगाए।
  • रात्रि में प्रकाश के प्रति आकर्षित होने वाले कीटों के लिए प्रकाश प्रपंच 4-5 प्रति हेक्टेयर की दर से लगाएं।
  • फलछेदक कीट के नियंत्रण हेतु टमाटर की प्रत्येक 16 पंक्तियों के बाद गेंदे की एक  पंक्ति फसल प्रपंच के रूप में लगाएं।
  • तम्बाकू की सुण्डी की रोकथाम के लिए टमाटर के चारों ओर अरण्डी की फसल लगाएं।
  • माहु/चेपा के नियंत्रण हेतु नाइट्रोजन उर्वरकों का अनुशंसित मात्रा में ही प्रयोग करें।
  • फल छेदक एवं तम्बाकू की इल्ली की निगरानी के लिए फेरोमेन प्रपंच 5-6 प्रति हेक्टेयर की दर से लगाएं।
  • रसचूसक कीटों के नियंत्रण हेतु चिपचिपे पॉश 8-12 प्रति हेक्टेयर लगाएं।
  • रोग व कीट से ग्रसित पत्तियों व फलों को तोड़कर नष्ट कर दें।
  • पक्षियों को खेत में बैठने के लिए ‘टी’ आकार की डण्डियां 20-25 प्रति हेक्टेयर की दर से लगाएं।
  • फल छ्रेदक कीट व तम्बाकू की सुण्डी के नियंत्रण हेतु 250 एल.ई./हेक्टेयर की दर से क्रमश: एच.ए.एन.पी.वी व एस.एल.एन.पी.वी. का छिड़काव करें।
  • सूत्रकमि के प्रबन्धन के लिये नीम चूर्ण या खली का उपयोग 250 किगा्र./हेक्टेयर की दर से करें।
  • मुरझान रोग अधिक दिखने पर बाविस्टीन 1-2 ग्राम/लीटर पानी में मिलाकर 5-6 दिन के अन्तराल में 3 बार छिड़काव करें।
  • रोपाई के बाद 10-15 दिनों के अंतराल पर 5 प्रतिशत नीम के बीजों के पाउडर का छिड़काव करें।
  • आद्र्रगलन रोग के नियंत्रण हेतु बोर्डो मिश्रण 2: 2: 50 का प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।
  • बी.टी. 1.0 ग्राम मात्रा/ली. पानी में मिलाकर छिड़कें।
  • अण्ड परजीवी टाइकोग्रामा कीलोनिस के अण्डे 1,00,000 प्रति हेक्टेयर की दर से 7 दिन के अन्तराल पर फूल आने की अवस्था होने पर 4-5 बार छोड़े।

5 प्रतिशत नीम की निम्बोली का सत्व बनाने की विधि

50 ग्राम नीम की निम्बोली को बारीक पीसकर 500 मिलीलीटर पानी के साथ मिलाकर बारीक कपड़े से छान लेते हैं। इस घोल को 24 घण्टे या एक रात भिगोकर छोड़ देते हैं। इसके बाद वापस दो परत वाले बारीक कपड़े से छानकर एक लीटर का घोल तैयार कर लेते है व 0.1 या 1 प्रतिशत कास्टिक सोडा मिलाकर छिडकाव में प्रयोग कर सकते हैं।

प्रमुख रोग
आद्र्र गलन: यह बीमारी पौधशाला मे सर्वाधिक होती है। पौधे अंकुरण से पूर्व ही मर जाते हैं। या इस रोग के प्रकोप से पौधे का जमीन की सतह पर स्थित तने का भाग काला पड़कर सड़ जाता है पौधा मुरझाकर गिर जाता है तथा 2-3 दिनों में ही पूरी नर्सरी में फैलकर सभी पौधे नष्ट हो जाते हैं। यह रोग भूमि के माध्यम से फैलता है।

झुलसा रोग: इस रोग से टमाटर के पौधों की पत्तियों पर गहरे भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं, जिससे पौधा सूखकर मर जाता है। झुलसा दो प्रकार का होता है:-
अगेती झुलसा: इस रोग में धब्बों पर गोल-गोल छल्लेनुमा धारियाँ दिखाई देती हैं। धब्बों का क्षेत्र पीला होने लगता है तथा कई धब्बे आपस में मिलकर पत्तियों को सूखा देते हैं।
पिछेती झुलसा: यह रोग बाद की अवस्थाओं पर आक्रमण करता है तथा नम व ठण्डे वातावरण में काफी नुकसान पहुँचाता है। इस रोग में पत्तियों पर जलीय, भूरे रंग के गोल अनियमित आकार के धब्बे बनते हैं, जिनके कारण अंत में पत्तियाँ पूर्ण रूप से झुलस जाती हैं।
पर्णकुंचन व मोजेक: ये विषाणुजनित रोग है। रोगी पत्तियों का रंग गहरा हरा, पर्णवृन्त छोटा, मोटा और झुर्रीदार होता है। पुष्पवृन्त पर फूल कम और वह हरा, मोटा तथा झाड़ू के आकार का नजर आता है। संक्रमित पौधे में फल कम बनते हैं। मोजेक रोग के कारण पत्तियों पर गहरा व हल्का पीलापन लिये हुए हरे रंग के धब्बे नजर आते हैं। मोजेक व पर्णकुंचन रोग को फैलाने में कीट अहम भूमिका निभाते हैं।
चित्तीदार म्लानि (मुरझान): इस रोग के कारण पत्तियों, तने व फल पर भूरे रंग की धारियाँ बन जाती हैं तथा पौधा सूखकर मुरझा जाता है। यह रोग थ्रिप्स के द्वारा फैलता है।
बकअक्षु रोग: इस रोग के लक्षण फलों पर दिखाई देते हैं। फल पर पहले छोटे काले धब्बे दिखाई देते हैं जो धीरे-धीरे बड़े हो जाते हैं तथा संक्रमित भाग के चारों ओर हल्के भूरे रंग का गोलाकार घेरा बन जाता है। यह रोग टमाटर के कच्चे फलों में अधिक होता है।
जडग़ांठ (सूत्रकृमि): सूत्रकृमि पौधों की जडों को क्षति पहुंचाते हैं जिससे जड़ों की पानी व खाद्य पदार्थों को सोखने की शक्ति कम हो जाती है तथा पौधे कमजोर व मुर्झाये से दिखते हैं। तथा अधिक संक्रमण होने पर तथा पौधे की वृद्धि रूककर बौने रह जाते है। पत्तियाँ पीली होकर सिकुड़ जाती है व पौधा मर जाता है।

ट्राइकोडर्मा के उपयोग की विधियाँ

बीज उपचार:-

  • फसल के बीजों को साफ बर्तन में रखकर थोड़े पानी के छीटें दें ।
  • ट्राइकोडर्मा कल्चर 6 से 8 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से बीजों में इस तरह मिला दें, जिससे सभी बीजों पर एक समान परत बन जाये
  • उपचारित बीज को छाया में सुखाकर बुवाई करें ।

भूमि उपचार: –

  • एक हैक्टेयर भूमि के लिए 2.5 किलोग्राम कल्चर को 100 किलोग्राम सड़े गोबर की खाद में मिलाकर अन्तिम जुताई के समय भूमि में मिला दें ।

जड़ उपचार : –

  • प्रत्यारोपित करने वाली पौध के लिए 1 किलोग्राम कल्चर को 5 लीटर पानी में अच्छी तरह घोलकर, पौधे की जड़ों को इस घोल में 20 से 30 मिनट डुबोकर लगायें ।
   आवश्यकता आधारित कीटनाशक
कीटनाशक  मात्रा (ग्राम या मि.ली. प्रति हे.)  प्रबंधित कीट प्रजाति
इमिडाक्लोपरिड 17.8% एसएल 100-125 मोयला, हरा तेला, सफेद मक्खी, पर्णजीवी
थायामिथाक्जैम 25% डब्ल्यूजी 500-750 मोयला, हरा तेला, सफेद मक्खी, पर्णजीवी
फेलवरेट 20% ईसी 300-325 मोयला, हरा तेला, सफेद मक्खी, पर्णजीवी फल छेदक कीट व तम्बाकू की सुण्डी
फिप्रोलिन 5%, एससी 800-1000 मोयला, हरा तेला, सफेद मक्खी, फल छेदक कीट व तम्बाकू की सुंडी
  • कविता कुमावत
  • डॉ. सुरेश जाट
  • डॉ. जीवन राम जाट
  • शंकरलाल गोलाडा, मो. : 8890003536

email : slagro_1967@yahoo.co.in

www.krishakjagat.org
Share
Share