पर्यावरण को बचाने के लिए हैप्पी सीडर

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खाद्यान्न फसलों में धान-गेहूं भारत का एक प्रमुख फसल प्रणाली है। यह फसल प्रणाली देश की खाद्यान्न सुरक्षा के लिए रीढ़ की हड्डी है। हमारे देश के उत्तर-पश्चिम और उत्तर-पूर्व में लगभग 12.3 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र धान-गेहूं फसल चक्र के अंतर्गत आता है। यह फसल प्रणाली उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा, मध्यप्रदेश और उत्तरांचल में बहुतायत में अपनायी जाती है। इन प्रदेशों में कुल कृषि क्षेत्रों का अधिकांश भाग इस फसल चक्र के अंतर्गत आता है। आज किसानों को ऊर्जा संकट, विशेष आर्थिक क्षेत्रों कृषि मदों की बढ़ती कीमतों और ग्लोबल वार्मिंग जैसी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। ये समस्याएं स्वत: ही विभिन्न समस्याओं को जन्म देती हैं। पिछले चार दशकों में खेती में बहुत-सी समस्याएं आई हैं। इन समस्याओं को कम करने के लिए भारत अब दूसरी हरितक्रान्ति की ओर अग्रसर है।
फसल अवशेषों के खेत में जलने से हो रहे वायु प्रदूषण के इस बढ़ते स्तर पर गौर करें तो हम सीधी बुआई तकनीक को अपनाकर कम कर सकते हैं इस तकनीक द्वारा खेतों की बिना जुताई किए एक विशेष प्रकार के यंत्रों द्वारा फसलों की बुवाई की जाती है जहां बीज की बुवाई करनी हो, उसी जगह से मिट्टी को न्यूनतम खोदा जाता है। इसमें दो लाइनों के बीच की जगह बिना जुती ही रहती है। बुवाई के समय ही आवश्यक उर्वरकों की मात्रा बीज के नीचे डाल दी जाती है। इस तरह की बुवाई मुख्यत: धान-गेहूं फसल चक्र के अंतर्गत ज्यादा कामयाब सिद्ध हुई है। जैसे कि जीरो टिल ड्रिल, स्ट्रिप टिल ड्रिल तथा हैप्पी सीडर इनमे से जीरो टिल ड्रिल तथा स्ट्रिप टिल ड्रिल खेत में कम अवशेष की अवस्था में ही अच्छा कार्य करते हैं

भारत में आजकल अधिकतर किसान हार्वेस्टर से फसल की कटाई करते हैं, जिससे उन क्षेत्रों में फसल के अधिकतर भाग अवशेष के रूप में खेत में ही रह जाते हैं। किसान फसल की कटाई के बाद अवशेषों का उचित प्रबंधन न करके उसे खेत में ही जला देते हैं। इन अवशेषों को जलाने से जहरीली गैसों का उत्सर्जन होता है, और इससे होने वाले वायु प्रदूषण से मनुष्य के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है तथा इसके अलावा पशुओं के लिए चारे की कमी, खेत की उपजाऊ शक्ति में भी कमी होती जा रही है। क्योंकि मिट्टी में विद्यमान मित्र कीटों में कमी होने के कारण जमीन में उपजाऊ शक्ति घटने लगती है।

लेकिन कंबाइन हार्वेस्टिंग के बाद  खेत में इनके द्वारा सीधी बुआई नहीं कर सकते। अत: कंबाइन हार्वेस्टर द्वारा फसल कटाई उपरांत खड़े एवं बिखरे (लूज़) फसल अवशेषों वाले खेत में सही ढंग से सीधी बुआई करने में हैप्पी सीडर एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।
कैसे काम करता है हैप्पी सीडर
यह यन्त्र खेत में उपस्थित 5 टन से भी अधिक फसल अवशेष की अवस्था में भी आसानी से बुआई कर सकता है। हैप्पी सीडर के नए रूप जिसे टर्बो हैप्पी सीडर के नाम से जाना जाता है की क्षमता लगभग 0.25-0.35 हेक्टेयर प्रति घंटा है तथा इसको 45-55 एच. पी. ट्रैक्टर द्वारा संचालित किया जा सकता है। अगर हम बात करे इस मशीन की बनावट की तो इसमें अवशेष कटाई एंड मल्चिंग इकाई है, जो कि अवशेषों को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर खेत में फैला देती है तथा इसके पीछे लगी इन्वर्टेड टाइप के फरो ओपनर द्वारा आसानी से बिना भूमि को ज्यादा खोदे हुए ही सीधी बुआई हो जाती है।
खेती की लागत में कमी
धान-गेहूं की फसल प्रणाली में बिना जुताई के ही धान के अवशेषों के साथ गेहूं बिजाई करने से जुताई व मजदूर के खर्च को बचाया जा सकता है। अवशेष प्रबंधन करने से खेत में खरपतवारों पर नियंत्रण रहता है इसका कारण यह है कि इस तकनीक में मिट्टी की ज्यादा उलट-पुलट नहीं करते हैं। अत: जिन खरपतवारों के बीज मिट्टी की गहरी सतह में होते हैं उन्हें अंकुरण के लिए उपयुक्त वातावरण नहीं मिल पाता है। इस तरह मृदा की उपजाऊ शक्ति को बनाए रखने में भी यह तकनीक सार्थक मानी गई है।
सिंचाई की बचत
सीधी बिजाई से धान में 30 प्रतिशत तक पानी की बचत होती है। जबकि गेहूं की फसल में एक सिंचाई की बचत होती है। इस मशीन के उपयोग से किसानों की परंपरागत कृषि पद्धतियों की अपेक्षा लगभग 3 से 5 प्रतिशत अधिक अनाज की उपज होती है। इस तकनीक में जहां एक ओर खेत तैयार करने में लगे समय, धन और र्इंधन की बचत होती है तो वहीं दूसरी तरफ यह पर्यावरण हितैषी भी है।

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