भंवर में डूबता किसान, घूमती सरकार

किसानों की सन् 2022 तक आय दुगनी करने का आश्वासन देते केन्द्र सरकार में विराजित ‘नानाजी’ और खेती को लाभ का धंधा बनाने वाले प्रदेश सरकार में ‘मामाजी’ दोनों ही जमकर अपनी-अपनी मार्केटिंग कर रहे हैं और किसान दिनो-ंदिन बेहाल और अधमरा हुआ जा रहा है।किसानों की सन् 2022 तक आय दुगनी करने का आश्वासन देते केन्द्र सरकार में विराजित ‘नानाजी’ और खेती को लाभ का धंधा बनाने वाले प्रदेश सरकार में ‘मामाजी’ दोनों ही जमकर अपनी-अपनी मार्केटिंग कर रहे हैं और किसान दिनो-ंदिन बेहाल और अधमरा हुआ जा रहा है।’कृषक जगत’ के विगत अंकों में प्रकाशित आलेख ‘भावांतर के भंवर में किसान’ और ‘किसानों की फीकी दीपावली’ में प्रस्तुत विवरण अक्षरश: साकार हो रहा है। भावांतर योजना में सुधार के नाम पर फसलों की गुणवत्ता जांचने के लिये ‘ग्रेडिंग’ जोड़कर योजना को और जटिल किया जाना प्रस्तावित है ताकि अधिकांश किसानों को इस योजना का लाभ कम से कम मिले, सरकार का रुपया बचे और कृषक कल्याण का ढिंढोरा पूरी ताकत से पीटा जा सके। अंत -पंत दो महीने की खरीद पूरी होने के बाद भावांतर योजना में भाव निर्धारण का स्वरूप ऐसा चतुराई भरा होगा जैसे सट्टे का नंबर घोषित करने में ‘मटका किंग’ करता है। यही सच्चाई है।पूरे प्रदेश में भावांतर योजना लागू होने के बाद कृषि उपज मंडियों में औने-पौने दामों में व्यापारी किसान का माल खरीद रहे हैं, भोपाल मंडी में तो पिछले सप्ताह में उड़द का एक भी दाना व्यापारियों ने नहीं खरीदा। पूरे प्रदेश में उड़द समर्थन मूल्य के आधे दामों में भी नहीं बिक रही है। निराश होकर किसान अपनी उड़द वापिस घर ले गये, किसानों के असंतोष को जिन लोगों ने मुखर स्वर दिया उन लोगों को शांतिभंग के आरोप लगाकर थाने में बैठा लिया।

जमीनी हकीकतों से अनजान सरकार

फसल बेचने के लिये मंडी में आये किसानों को जैसे-तैसे घर वापिस जाने के लिए उधार की जुगाड़ कर ट्रैक्टरों में डीजल भरवाकर घर लौटाना पड़ रहा है। उन्हें कृषि उपज विक्रय करने पर नकद भुगतान नहीं किया जा रहा।
खेती की बढ़ती लागत व निर्बाध आयात के चलते कृषि मंडियों में समर्थन मूल्य मिलने की कौन कहे, किसानों को अपनी उपज औने-पौने दामों में भी बेचने में कठिनाई हो रही है।
सामान्यत: पूर्व में कृषि उपज के भुगतान का संव्यवहार नकद राशि के रूप में होता था व ब्याज बट्टे पर चलने वाली नकद राशि के दम पर ही व्यापारी अनाज की खरीद और संग्रहण कर लाभ का धंधा करता था। ‘नानाजी’ द्वारा नोटबंदी के बाद नकद का प्रवाह सूख चुका है, व्यापारी भी बेबस हैं और परिणामत: किसान लुट रहा है।
अच्छे दाम हेतु बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक व्यवसाय करने के लिये बड़ी पूंजी धारक व्यवसायियों की उपस्थिति भी आवश्यक है। प्रदेश में अनाज -तिलहन क्रय के लिए कारगिल, आई.टी.सी. जैसी बड़ी अंतर्राष्ट्रीय कंपनियां भी व्यवसायरत थीं और इनके द्वारा कृषि उपज की बड़ी मात्रा में खरीद के चलते किसानों को भी उनकी उपज के ठीक-ठाक दाम मिल रहे थे परंतु प्रदेश सरकार ने इन बड़े व्यवसायी कंपनियों पर अतिरिक्त करारोपण लादकर इन्हें प्रदेश से बाहर जाने पर विवश कर दिया। वर्तमान में शासन स्वयं विभिन्न एजेंसियों के माध्यम से की जाने वाली खरीद प्रक्रिया से पीछे हट गया। इसके परिणामस्वरूप बाजार में प्रतिस्पर्धा और पूंजी के प्रवाह में कमी आ गई। नोटबंदी-जीएसटी ने आग में घी डालने का काम किया और इसके दुष्परिणाम प्रदेश किसान भुगत रहे हैं। प्रदेश में किसान पुत्रों को कृषि प्रसंस्करण उद्योग लगाने के लिए दो करोड़ रु. तक की अनुदान सहायता देने का प्रलोभन दिया जा रहा हैं। क्या प्रदेश में किसान पुत्र इतने समर्थ हो गये हैं अथवा झूठे किसान बनकर बड़े उद्यमी इस योजना का लाभ लेंगे?

प्रदेश सरकार की अव्यावहारिक नीतियों के चलते दलहन से दाल बनाने वाली अधिकांश मिलें बंद हो चुकी हैं, सोयाबीन से तेल निकालने वाले बड़े आधे से अधिक साल्वेंट एक्सट्रेक्शन प्लांट बंद हो चुके हैं, अबाध आयात के कारण तेल मिलों में तालाबंदी हो गई है। इन सब जमीनी हकीकतों से अनजान सरकार देश-विदेश में उद्यमियों को प्रदेश में उद्योग स्थापित करने के लिये मार्केटिंग करते पर्यटन कर रहे हैं।

वर्तमान में प्रदेश का अधिकांश क्षेत्र सूखाग्रस्त है, जलस्रोतों में पानी कम है, जल स्तर गिरा हुआ है। परंतु विद्युत कंपनियां तीन माह से कम के लिये किसानों को अस्थाई विद्युत कनेक्शन सिंचाई के लिए नहीं दे रही है और अस्थाई कनेक्शन लेने के लिये विद्युत शुल्क की राशि एक तिहाई से अधिक की वृद्धि कर दी है। दीपावली के बाद जैसे-तैसे कृषि मंडियां खुली हैं लेकिन दीपावली के 5-6 दिन के बाद ही सिंचाई पम्प के विद्युत बिलों की जमा करने की आखिरी तारीख निर्धारित कर दी है। अवर्षा और अनियमित वर्षा से प्रभावित कम उपज के चलते किसान भाई इन बिलों का भुगतान कैसे करेंगे इसकी कोई परवाह ही नहीं है। एक कहावत है कि जब रोम जल रहा था तब बेफ्रिक नीरो बाँसुरी बजा रहा था, क्या अमेरिका घूमते मामाजी और उनकी सरकार के बारे में यह समझना भूल होगी!
फसलों के केवल समर्थन मूल्य घोषित कर देना अथवा उन्हें बढ़ा देना ही पर्याप्त नहीं है, शासन का यह दायित्व भी है कि किसानों की फसलों का विक्रय समर्थन मूल्य से कम पर न हो इसके अभाव में समर्थन मूल्य की घोषणा केवल दिखावा और किसानों को भ्रमित करने का प्रयास मात्र है। इस खेल का नानाजी और मामाजी दोनों ही जमकर आनंद ले रहे हैं किसान ‘मामू’ बन रहा है।

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