अतिरिक्त आमदनी का जरिया ‘खीरा’

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भूमि की तैयारी –
खीरे के लिए कोई खास तैयारी नहीं करनी पड़ती क्योंकि तैयारी भूमि की किस्म के ऊपर निर्भर होती है। बलुई भूमि के लिये अधिक जुताई की आवश्यकता नहीं होती। इसलिये 2-3 जुताई करनी चाहिए तथा पाटा लगाकर क्यारियां बना लेनी चाहिए। भारी-भूमि की तैयारी के लिये अधिक जुताई की भी आवश्यकता पड़ती है ।
खाद तथा उर्वरक – खीरे की अच्छी फसल के लिए खेत की तैयारी करते समय ही 6 टन गोबर की अच्छी तरह सड़ी खाद खेत में जुताई के समय मिला दें। इसके अलावा अच्छे उत्पादन के लिये नत्रजन 40-50 किग्रा., 20-30 किग्रा. फास्फेट तथा 20 किग्रा. पोटाश की मात्रा प्रति हेक्टर की दर से डालना चाहिए तथा नत्रजन की आधी मात्रा फास्फेट व पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई से पहले तैयारी के समय मिट्टी में मिला देनी चाहिए । शेष नत्रजन की मात्रा बुवाई के 30-45 दिन के बीच पौधों में छिटकना चाहिए या फिर फूल आने पर खेत की नालियों में डाल कर मिट्टी चढ़ा दें। खीरा के पौधे के लिये यदि हो सकता है तो राख की मात्रा पौधों पर व भूमि में डालनी चाहिए । पौधों की पत्तियों पर राख भुरकने से कीड़े आदि नहीं लगते हैं।
उन्नतशील किस्में –
विदेशी किस्में –पोइन्सेट, स्ट्रैट एइट, जापानी लौंग ग्रीन।
भारतीय किस्में – पंजाब नवीन, चयन।
संकर किस्में-प्रिया
नवीनतम किस्में – पूसा उदय, स्वर्ण पूर्णा, स्वर्ण शीतल
अन्य किस्में- हिमांगी, जापानी लॉन्ग ग्रीन, पंजाब सेलेक्शन, जोवईंट सेट, पूना खीरा, पूसा संयोग, शीतल, खीरा 90, खीरा 75, हाईब्रिड 1, हाईब्रिड 2, कल्यानपुर हरा खीरा इत्यादि
खीरे की अगेती पैदावार के लिए इसे सुरंग में भी बीज सकते हैं। इस से कोहरे से बचाया जा सकता है। अगर बिजाई के लिए सुरंग बनानी है तो दो मीटर के सरिये को दोनों साइड में जमीन में गाड़ दें। इसके बाद दोनों अर्ध गोलों पर सौ गेज की प्लास्टिक की शीट डाल दें। और दोनों साइड से मिटटी से ढंक दें। और फरवरी माह में इन शीटों को हटा दें।
सिंचाई –
जायद व खरीफ फसल दोनों के लिए सिंचाई की आवश्यकता होती है अर्थात भूमि में नमी बनी रहनी चाहिए। जायद में उच्च तापमान के कारण अपेक्षाकृत अधिक नमी की जरूरत होती है। अत: ग्रीष्मऋतु की फसल के लिये 5-6 दिन के बाद सिंचाई करते रहना चाहिए । वर्षा ऋतु में वर्षा के आधार पर पानी देना चाहिए। पहली सिंचाई बोने से 10-15 दिन के बाद करनी चाहिए। बेलों पर फल लगते समय नमी का रहना बहुत ज़रूरी है। अगर खेत में नमी की कमी हो तो फल कड़वे भी हो सकते हैं।
निराई-गुड़ाई –
किसी भी फसल की अच्छी पैदावार लेने की लिए खेत में खरपतवारों का नियंत्रण करना बहुत जरुरी है। लता की वृद्धि की प्रारंभिक अवस्था निराई-गुड़ाई करने से पौधों का अच्छा विकास होता है और फलन भी अधिक होता है सिंचाई के बाद या लता की पूर्व वृद्धि हो जाने पर लगभग 5-6 दिन के अन्तर से खेत से खुरपी, हो या हाथ द्वारा घास व अन्य खरपतवार निकालना चाहिए तथा साथ-साथ थीनिंग भी कर देना चाहिए। वर्षाकालीन फसल के लिए जडों में मिट्टी चढा देना चाहिए।

सलाद की फसल के रूप में खीरा महत्वपूर्ण स्थान रखता हैै। इसकी खेती भारतवर्ष के सभी भागों में की जाती है । सलाद के साथ-साथ सब्जी के लिये भी खीरे का प्रयोग किया जाता हैै। खीरे की फसल बसन्त तथा ग्रीष्म ऋतु में बोई जाती है। पेट की गड़बड़ी तथा कब्ज़ में भी खीरा को औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता है। बाजार में अधिक मांग बने रहने के कारण खीरे की खेती किसान भाइयों के लिए बहुत ही लाभदायक है।

 

बुवाई का समय एवं विधि
बुवाई समय बीज दर बुवाई का ढंग या विधि फसल की दूरी
जायद/ग्रीष्म ऋतु के लिए : 2.5 से 3.5 किग्रा. बीज को ढाई मीटर की चौड़ी बेड पर दो-दो फुट के फासले  पर बीज सकते  हैं। बीज दोनों साइड लगाएं। एक जगह पर दो बीज लगाये। बीज से बीज 75 सेमी. पर तथा कतारों या कूड़ से कूड़ की दूरी 120 सेमी.
फरवरी-मार्च खरीफ/वर्षा ऋतु के लिए : 2 से 2.5 किग्रा. बीज को ढाई मीटर की चौड़ी बेड पर  दो-दो फुटके फासले  पर बीज सकते  हैं।  बीज दोनों साइड  लगाएं। एक जगह पर दो बीज लगाये। बीज से बीज की 90 सेमी. तथा कूड़ से कूड़ की दूरी 150 सेमी.
जून-जुलाई पर्वतीय के लिए मार्च – अप्रैल 2 से 3.0 किग्रा. बीज को ढाई मीटर की चौड़ी बेड पर  दो-दो फुट के फासले  पर बीज सकते  हैं। खीरे की बिजाई उठी हुई मेढ़ों के ऊपर करना ज्यादा अच्छा हैं। बिजाई करते समय एक जगह पर कम से कम दो बीज लगाएं। मेढ़ से मेढ़ की दूरी 1 से 1.5 मीटर रखते हैं। जबकि पौधे से पौधे की दूरी 60 सें.मी.

 

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