किसान हितैषी बजट में लागत गणना का पेंच ?

इसमें कोई दो राय नहीं कि नरेंद्र मोदी सरकार का यह पहला और अंतिम ऐसा पूर्ण बजट है, जो गांव किसान, किसानी और गरीब पर ध्यान केंद्रित करता है। इसमें सबसे अधिक घोषणाएं कृषि और किसान पर हैं। साथ ही 2019 के आम चुनाव और इसी साल होने वाले आठ राज्यों के विधानसभा चुनाव को भी ध्यान में रखा गया है। इसीलिए थोड़ा जोखिम उठाते हुए शहरी मध्य वर्ग और वेतनभोगियों की परवाह न करते हुए सीधे ग्रामीण महिला और पुरूष मतदाताओं को साधने की कोशिश की गई है। उच्च या मध्य वर्ग को दरकिनार कर निचले तबके की आमदनी बढ़ाने और बुनियादी संसाधन उपलब्ध कराना ही ऐसे उपाय है, जो समावेशी विकास के लक्ष्य को पूरा करने में सहायक हो सकते हैं। इस नजरिए से किसान की आय डेढ़ गुनी करना गरीबों को स्वास्थ्य बीमा, महिलाओं को उज्ज्वला के विस्तार का उपहार देना और ग्रामीणों को 51 लाख आवास देना नि:संदेह ऐसे उपाय हैं, जो लाचार को सशक्त बनाने का मार्ग प्रशस्त करेंगे। ग्राम आधारित इस बजट से उद्योग जगत प्रसन्न दिखाई दे रहा है, साफ है कि जमीनी विकास से ही आर्थिक विकास में समृद्धि आएगी। बावजूद यदि वित्त मंत्री अरुण जेटली अपने बजट भाषण में यह स्पष्ट कर देते कि उपज का लागत मूल्य स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट में की गई सिफारिशों के अनुसार दिया जाएगा, तो न्यूनतम समर्थन मूल्य की गणना को लेकर जो आशंकाएं उठ रही हैं, उन पर विराम लग गया होता ?

इस समय देश में कृषि उत्पादन चरम पर है। वित्त मंत्री द्वारा पेश आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2016-17 में करीब 275 मिलियन टन खाद्यान्न और करीब 300 मिलियन टन फलों व सब्जियों का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ है। बावजूद किसान सड़कों पर उपज फेंकते हुए आंदोलित हैं और आत्महत्या भी कर रहे हैं, तो यह केंद्र की संवेदनशील सरकार के लिए चिंतनीय पहलू है। इस लिहाज से बजट यदि कृषि, किसान और गरीब को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहा है, तो यह सरकार की कृपा नहीं बल्कि दायित्व है, क्योंकि देश की आबादी की आजीविका और कृषि आधारित उद्योग अंतत: किसान द्वारा खून-पसीने से उगाई फसल से ही गतिमान रहते हैं। यदि ग्रामीण भारत पर फोकस नहीं किया गया होता तो जिस आर्थिक विकास दर को 7 से 7.8 प्रतिशत तक ले जाने की उम्मीद जताई जा रही है, वह संभव ही नहीं थी। इस समय पूरे देश में ग्रामों से मांग की कमी दर्ज की गई है। निसंदेह गांव और कृशि क्षेत्र से जुड़ी जिन योजनाओं की श्रृंखला को जमीन पर उतारने के लिए 14.3 लाख करोड़ रुपए का बजट प्रावधान किया गया है, वह वाकई ईमानदारी से खर्च होता है तो गांव से शहर तक खुशहाली आना तय है।
किसान और किसानी को समृद्धशाली बनाने के लिए जेटली ने 2022 तक किसानी से जुड़े लोगों की आय दोगुनी करने की रूपरेखा प्रस्तुत की है। इस हेतु फसलों का उत्पादन बढ़ाने, कृषि की लागत कम करने, खाद्य प्रसंस्करण और कृषि आधारित वस्तुओं का निर्यात बढ़ाने के बजट-प्रावधान हैं। कृषि के परिप्रेक्ष्य में बुनियादी ढांचा विकसित करने की दृष्टि से कृषि उपज बेचने के लिए देशभर में 22 हजार हाटों को कृषि बाजार में बदलने की बात भी कही गई है। मौजूदा मंडियों में फसल बेचने के लिए जो कतारें लगती हैं, उससे किसान को राहत मिलेगी। खरीदारों की संख्या बढ़ेगी। इस हेतु नए व्यापारियों को लायसेंस के सरलीकरण की भी जरूरत है। पासपोर्ट की तरह तीन दिन में कृषि उपज खरीद संबंधी लायसेंस देने का प्रबंध राज्य सरकारों को करने की जरूरत है। इन कृषि बाजारों के निर्माण के समय यह ख्याल रखा जाए कि इनकी इतिश्री महज चारदीवारी खींचकर पूरी न कर ली जाए ? इनमें फसल को बेमौसम बरसात से बचाने, इलेक्ट्रॉनिक तौल – कांटे लगाने और किसान को पेयजल व शौच के प्रबंध भी लाजिमी हैं। वैसे देश में फसल का जिस मात्रा में उत्पादन हो रहा है, उसे सुगमता से बेचने के लिए 40 हजार कृषि मंडियों की जरूरत है।
बड़े उद्योगपतियों के साथ प्रसिद्ध कृषि विज्ञानी स्वामीनाथन ने भी ग्राम व कृषि आधारित इस बजट की महत्ता दी है। उन्होंने मौसम प्रबंधन के उपाय और मंडियों की चुनौती को स्वीकार करना अहम् माना है। इस दृष्टि से इस बजट को किसान हितैषी माना हैं। बावजूद एक तो बजट में फसलों का लागत मूल्य निर्धारित करने का तरीका स्पष्ट नहीं है, दूसरे निर्धारण के बाद जो डेढ़-गुना समर्थन मूल्य दिया जाएगा, वह हाल ही में आने वाली रबी की फसल पर नहीं, बल्कि जून-जुलाई में बोई जाने वाली खरीफ की फसलों पर दिया जाएगा। ये फसलें अक्टूबर से मंडियों में विक्रय के लिए पहुंचना शुरू होती हैं। अक्टूबर-नवंबर ही वह समय है, जब राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक जैसे बड़े राज्यों में विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। हाल ही में आने वाली उपज को एमएसपी मिलना इसलिए भी मुश्किल है, क्योंकि जेटली ने बजट भाषण में स्पष्ट कर दिया है कि एमएसपी वितरण के नियम राज्य सरकारों के प्रतिनिधियों से विचार-विमर्श करके तय किए जाएंगे। जाहिर है, इस प्रक्रिया में वक्त लगेगा।
लागत और समर्थन मूल्य की गणना के तरीके का स्पष्ट होना इसलिए जरूरी हैं, क्योंकि कहने को तो सरकार अभी भी एमएसपी दे रही है। लेकिन इसमें विसंगति इतनी है कि यह मूल्य किसानों के लिए कतई लाभदायी नहीं है। भारतीय खाद्य निगम के आंकड़ों के अनुसार 2015-16 में गेहूं पर उत्पादन लागत 2408 रुपए प्रति क्विंटल आई थी, जबकि एमएसपी का निर्धारण 1735 रुपए प्रति क्विंटल किया गया। इसी तरह धान पर लागत 3264 रुपए प्रति क्विंटल थी, जबकि समर्थन मूल्य महज 1590 रुपए प्रति क्विंटल ही दिया गया। केंद्र सरकार फिलहाल एमएसपी तय करने के तरीके में ‘ए-2’ फार्मूला अपनाती है। यानी फसल उपजाने की लागत में केवल बीज, खाद, सिंचाई और परिवार के श्रम का मूल्य जोड़ा जाता है। इसके अनुसार जो लागत बैठती है, उसमें 50 फीसदी धनराशि जोड़कर समर्थन मूल्य तय कर दिया जाता है। जबकि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश है कि इस उत्पादन लागत में कृषि भूमि का किराया भी जोड़ा जाए। इसके बाद सरकार द्वारा दी जाने वाली 50 प्रतिशत धनराशि जोड़कर समर्थन मुल्य सुनिश्चित किया जाना चाहिए। फसल का अंतरराष्ट्रीय भाव तय करने का मानक भी यही है। यदि ये मानक तय कर दिए जाते हैं तो संभव यह किसान आत्महत्याओं का सिलसिला थम जाए। क्योंकि जमीन का किराया जोड़े बिना पंजाब में धान और गेहूं की फसलों पर समर्थन मूल्य हर साल दिया जा रहा है, बावजूद पिछले 17 साल में पंजाब में 16 हजार किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। इससे स्पष्ट होता है कि स्वामीनाथन आयोग की समर्थन मूल्य संबंधी सिफारिशों को ज्यों की त्यों अमल में लाने की जरूरत है। राज्य सरकारों के प्रतिनिधियों का धर्म और दायित्व बनता है कि जब एमएसपी के नियम निर्धारण की बैठक हो तो वे केंद्र सरकार को आयोग की अक्षरश: अनुशंसा मानने को बाध्य करें।

  • प्रमोद भार्गव

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