टीबी और स्टिग्मा एक सिक्के के दो पहलू

  • प्रशांत कुमार दुबे

जब तक भारत जैसे देश में समाज में व्याप्त कुरीतियों और लांछन पर एक साथ चोट नहीं की जायेगी तब तक टीबी (क्षय रोग) से पार पाना एक बड़ी चुनौती है। टीबी सर्वाइवर और ऐसे टीबी मरीज जिन्हें लगातार देखभाल की जरूरत है, बड़े पैमाने पर फैले भेदभाव के कारण अक्सर उपचार तक पहुंच नहीं पाते या फिर टीबी के बारे में बोलने से डरते हैं। टीबी से हमारी लड़ाई की शुरूआत लोगों और समुदायों को सशक्त बनाने और इस बीमारी का स्टिग्मा कम करने से होनी चाहिए लेकिन दुर्भाग्यवश हमारे पास ऐसी कोई योजना अभी तक तो नहीं है। भारत को तत्काल सार्वजनिक जागरूकता, रोकथाम, सामुदायिक सहभागिता और लांछन कम करने के मुद्दों पर ध्यान देने की जरूरत है।
इंदौर में बहू नीरजा के टीबी की जद में आने का सुनते ही सभ्रांत परिवार ने उसे घर से अलग कर दिया। भोपाल की 70 साल की वृद्ध दंपत्ति को टीबी की बीमारी का पता चलते ही उनके अपने बेटों ने ही उन्हें एक बंद कमरे में रखा और जब स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी ने संपर्क करना चाहा तो उसे मार डालने की धमकी दी। जबलपुर में पत्नी ने पति मनोज का साथ केवल इसलिये छोड़ दिया कि उसे टीबी की बीमारी ने जकड़ा है। अपनों द्वारा इस तरह के भेदभाव के मामले उन लोगों के साथ हैं जिन्हें टीबी की बीमारी हुई। यह बात तो हुई महानगरों की, प्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में तो स्थिति और बदतर है। खंडवा के अलावा ब्लाक में कोरकू आदिवासी समुदाय में तो टीबी का पता चलते ही न केवल मरीज की झोपड़ी अलग कर दी जाती है बल्कि उसे लगभग निर्वासित जीवन जीना पड़ता है। यही नहीं इन मरीजों की झोपड़ी में ही बकरी के मल-मूत्र के संपर्क में रहने से टीबी जल्दी ठीक हो जाती है। खालवा के ही डाभिया गांव में एक मरीज तो इसी तरह की झोपड़ी में मर गया, लेकिन 3 दिन तक किसी ने उसकी सुध ही नहीं ली। स्टिग्मा के चलते यह भी सबसे बड़ी दिक्कत है कि पीडि़तों को अलग-थलग कर दिया जाता है और जिसके चलते मरीज या तो इलाज ही नहीं लेते हैं और या फिर पूरा इलाज नहीं लेते हैं।

तमाम प्रगति और विकास सूचकांकों की चकाचौंध में आज भी टीबी (क्षय रोग) को लेकर स्टिग्मा कायम है। देश के लिये चिंताजनक यह तथ्य है कि एक बड़ा आंकड़ा देश में छिपे हुए टीबी रोगियों का भी है। एक सरकारी अनुमान के मुताबिक हर साल देश में लगभग 10 लाख लोगों की मृत्यु टीबी की वजह से हो जाती है। इतनी विपरीत स्थिति होने के बावजूद इस कलंक या स्टिग्मा को लेकर भारत सरकार के पुनरीक्षित राष्ट्रीय तपेदिक नियंत्रण कार्यक्रम में कोई विशिष्ट व्यवस्था नहीं है। लेकिन बीमारी से भी बड़ी समस्या आमजनों में बीमारी के प्रति स्टिग्मा के साथ बीमार तंत्र और व्यवस्था से जुड़ी है, जिन्हें इस महामारी को मिटाना है।

उपरोक्त प्रकरण बताते हैं कि तमाम प्रगति और विकास सूचकांकों की चकाचौंध में आज भी टीबी को लेकर स्टिग्मा कायम है। देश के लिये चिंताजनक यह तथ्य है कि एक बड़ा आंकड़ा देश में छिपे हुए टीबी रोगियों का भी है। एक सरकारी अनुमान के मुताबिक हर साल देश में लगभग 10 लाख लोगों की मृत्यु टीबी की वजह से हो जाती है। इनमें से करीब आधे से ज्यादा वे लोग होते हैं जिनकी जांच नहीं हो पाती या जिनका इलाज निजी क्लीनिकों में चल रहा होता है या फिर इनकी मृत्यु की जानकारी सरकारी आंकड़ों में दर्ज नहीं हो पाती।
टीबी स्टिग्मा को लेकर मरीज की जानकारी छिपा दी जाती है। इसलिये नए मरीजों को खोजने में स्वास्थ्य विभाग को पसीना आ रहा है। ज्ञात हो कि मध्यप्रदेश में ऐसे 32 हजार टीबी मरीज हैं जिनकी जानकारी किसी के पास नहीं है लेकिन वे दूसरों को टीबी बांट रहे हैं। हम जानते हैं कि एक मरीज साल में 16 मरीजों को टीबी से संक्रमित कर सकता है। वजह कई बार उन्हें खुद पता नहीं है कि वे टीबी से ग्रसित हैं और कई बार उन्हें छिपा दिया जाता है। अनुमान के अनुसार प्रदेश में एक लाख की आबादी पर टीबी के 216 मरीज हैं। इस लिहाज से प्रदेश में हर साल 1 लाख 68 हजार नए मरीज मिलने चाहिए, लेकिन 2017 में 1 लाख 36 हजार मरीज ही खोजे गए। हालांकि लापता मरीजों की संख्या पिछले सालों की तुलना में कम हो रही है। चार साल पहले लापता मरीजों का आंकड़ा करीब 72 हजार तक था। जो अब घटकर लगभग आधा हो गया है।
दरअसल, टीबी से प्रदेश और देश को छुटकारा दिलाने के लिये सबसे जरूरी है कि टीबी के मरीजों की समय रहते पहचान हो जाए। पहचान नहीं हो पाने की एक वजह टीबी को लेकर जबरदस्त स्टिग्मा है जिससे मरीज को डर रहता है कि टीबी की बीमारी सामने आने के बाद लोग उनसे और उनके परिवार से दूरी न बनाने लगे वहीं दूसरी वजह अमले की कमी है। तीसरी बात यह कि अब फेफड़ें के अलावा अन्य अंगों की टीबी भी ज्यादा हो रही है, लेकिन इनके लक्षण देरी से पता चलते हैं। हालांकि मरीजों की जानकारी सामने न आने की एक वजह निजी चिकित्सकों द्वारा प्रकरणों का साझा न किया जाना भी है।
इतनी विपरीत स्थिति होने के बावजूद स्टिग्मा को लेकर भारत सरकार के पुनरीक्षित राष्ट्रीय तपेदिक नियंत्रण कार्यक्रम में कोई विशिष्ट व्यवस्था नहीं है। जबकि टीबी के जानकार मानते हैं कि टीबी होने पर या शुरूआती लक्षणों के पता चलते ही मरीज और परिजनों को परामर्श (काउंसिलिंग) की जरूरत है ताकि इस रोग के विषय में होने वाली भ्रांतियों, खतरों से आगाह करने तथा दवा का कोर्स पूरा करने तक मरीज की जीजिविषा बरकरार रखी जा सके। इस मसले पर राज्य टीबी अधिकारी अतुल खराटे कहते हैं कि स्टिग्मा आज भी एक सच्चाई तो है लेकिन हम उससे पार पाने की कोशिश में लगे हैं। स्टिग्मा से निबटने के लिए हमारे पास केवल प्रचार सामग्री (आईईसी) है। लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि यदि यह प्रचार सामग्री इतनी ही कारगर होती तो फिर आज स्टिग्मा को लेकर इतनी हायतौबा नहीं मचनी चाहिए?
जब तक भारत जैसे देश में समाज में व्याप्त कुरीतियों और लांछन पर एक साथ चोट नहीं की जायेगी तब तक टीबी से पार पाना एक बड़ी चुनौती है। टीबी सर्वाईवर और ऐसे टीबी मरीज जिन्हें लगातार देखभाल की जरूरत है, बड़े पैमाने पर फैले भेदभाव के कारण अक्सर उपचार तक पहुंच नहीं पाते या फिर टीबी के बारे में बोलने से डरते हैं। टीबी से हमारी लड़ाई की शुरूआत लोगों और समुदायों को सशक्त बनाने और इस बीमारी का स्टिग्मा कम करने से होनी चाहिए लेकिन दुर्भाग्यवश हमारे पास ऐसी कोई योजना अभी तक तो नहीं है। भारत को तत्काल सार्वजनिक जागरूकता, रोकथाम, सामुदायिक सहभागिता और लांछन कम करने के मुद्दों पर ध्यान देने की जरूरत है। टीबी कोई ऐसी लाइलाज बीमारी या महामारी नहीं है जिस पर काबू न पाया जा सके। जब पोलियो, चेचक जैसी महामारियों तक का सफाया हो सकता है तो फिर तपेदिक का क्यों नहीं? लेकिन बीमारी से भी बड़ी समस्या आमजनों ने बीमारी के प्रति स्टिग्मा के साथ बीमार तंत्र और व्यवस्था से जुड़ी है, जिन्हें इस महामारी को मिटाना है।
(सप्रेस)

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