‘समर्थन’ से ‘सम्पन्न’ नहीं होगा अन्नदाता

(सुनील गंगराड़े)
केन्द्र सरकार ने खरीफ 2018 के लिये 14 फसलों के समर्थन मूल्य की घोषणा 56 इंच का सीना फुला कर की। समर्थन मूल्यों की ऐलानी का ये ‘कर्मकांडÓ 1 माह की देरी से हुआ है। बुवाई के समय ही किसान को पता हो जाना चाहिए कि उसकी फसल की क्या कीमत मिलेगी? हालांकि विभिन्न फसलों की उत्पादन लागत पर 50 प्रतिशत से लेकर 97 प्रतिशत तक बढ़ौत्री हुई है। हालांकि ये उत्पादन लागत की गणना कैसे की गई, ये सरकार ने स्पष्ट नहीं किया।

तीन बड़े राज्यों के जल्द होने वाले विधानसभा चुनावों के परिप्रेक्ष्य में सरकार ने दांव मजबूत खेला है। समर्थन मूल्यों की इस बढ़ौत्री से किसान की आर्थिक सेहत पर कितना प्रभाव पड़ेगा, ये सरकार द्वारा समय पर की जाने वाली खरीदी से आकलन होगा।
राजनीतिक दृष्टि से समर्थन मूल्य में ये बढ़ौत्री प्रमुख रूप से मध्यप्रदेश (सोयाबीन), छत्तीसगढ़ (धान) और राजस्थान (बाजरा) की भाजपा सरकारों को आने वाले विधानसभा चुनावों में लाभ पहुंचा सकती है। वैसे राजस्थान में बाजरा की सरकारी खरीद कम होती है। देश के सोयाबीन उत्पादन में मध्यप्रदेश और राजस्थान की हिस्सेदारी 60 प्रतिशत से अधिक है वहीं धान छत्तीसगढ़ की मुख्य फसल है। इस साल के केन्द्रीय बजट में ये ख्वाब दिखाया गया था कि सरकार फसलों की एमएसपी उनके लागत मूल्य के आधार पर 50 प्रतिशत जोड़ कर करेगी। लेकिन फसल उत्पादन की लागत का आकलन करने का तरीका कृषि मंत्रालय के मुताबिक दशकों पुराना है। वहीं नीति आयोग ने इसे बदलने की भी सलाह दी है।
हालांकि समर्थन मूल्य की इस घोषणा में रागी, बाजरा जैसी नामालूम सी फसलों ने जरूर अपनी खोई चमक दुबारा हासिल की है। कम पानी पियू और कम खाद खाऊं ये मोटे अनाज की फसलें पौष्टिक आहार के रूप में महानगरीय घरों की डाइनिंग टेबल पर इठलाती हैं। वैसे पूरे खरीफ की उपज में इनका योगदान नगण्य सा है और सरकार इन भूली-बिसरी फसलों का समर्थन मूल्य पर कैसे खरीद करेगी ये स्पष्ट नहीं है। ये अर्थशास्त्रियों और वित्त मंत्रालय के लिये चिंता का मुद्दा हो सकता है कि समर्थन मूल्य पर इस प्रकार की बढ़ौत्री से सरकार पर कितना वित्तीय भार आएगा।
बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ के लघु, सीमांत, कृषकों को तो एमएसपी की एबीसीडी ही नहीं पता होगी क्योंकि उन्होंने कभी अपना धान एमएसपी पर बेचा ही नहीं। ये छोटे किसान तो अपनी फसल व्यापारियों को पहले ही समर्थन मूल्य से आधे दामों पर बेच चुके होते हैं। बाद में तो व्यापारी और सरकार मिलकर भावान्तर का भांगड़ा मना रहे होते हैं।

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