मूंग की खेती के लिए उपयुक्त सुझाव

जलवायु एवं मिट्टी – मूंग जायद एवं खरीफ ऋतु में उगाई जाती है। इसके लिए उपयुक्त तापमान 27 से 33 डिग्री है। यह सामान्यतया अधिक तापमान एवं सूखे हेतु सहनशील फसल है एवं दिन की लंबाई हेतु संवेदनशील फसल है। इसके उत्पादन हेतु गर्म एवं नमी वाला मौसम उपयुक्त होता है। मूंग हेतु उपजाऊ दोमट मिट्टी जिसकी पीएच 6.3 से 7.2 हो तथा जिसमें पानी का बहाव सही हो एवं पानी इक्कठा लवणीय व क्षारीय भूमि में क्रमश: सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी होती है जिससे पत्तियां पीली (क्लोरोसिस) पड़ जाती है। अधिक चिकनी मिट्टी में जड़ों की वृद्धि रुक जाती है।
उपयुक्त किस्मों का चयन- यह सबसे मुख्य होता है। यह फसल क्रम, बिजाई का समय एवं पानी के स्रोत पर निर्भर करता है। जायद फसलों हेतु वह किस्म लाभकारी होती है जो 60 से 65 दिनों में पक जाती है। कुछ किस्में निम्नानुसार है। पूसा विशाल,आई. पी. एम. 02-3, एम. एच. 421, आई.पी. एम. 410-3,आर. एम. जी. 492,आर. एम. जी. 975 एवं एम. एस. जे. 118 आदि।
जायद ऋतु में मूंग की उपयुक्त किस्में प्रारंभिक तौर पर जुस्से से उठती है ताकि यह प्रथम 20 से 35 दिनों में ही अपने आप को ठीक से स्थापित कर सकें।
खेत की तैयारी – मूंग के अच्छे उत्पादन हेतु खेत की तैयारी अच्छे से करनी चाहिए। रबी फसलों की कटाई के बाद खेत को दो से तीन बार जोतना चाहिए तथा इसके बाद डिस्क हैरो से जुताई कर के खेत को भुरभुरा, समतल एवं खरपतवार रहित बना लेना चाहिए। यदि खेत में दीमक की समस्या है तो कार्बोरिल 15 प्रतिशत पाउडर को खेत तैयार करते समय मिट्टी में मिलाकर प्रयुक्त करते हैं।
बीज की मात्रा – लगभग 4 लाख पौधे प्रति हेक्टेयर के घनत्व के हिसाब से रखने हेतु लगभग 15 से 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बीज की बुवाई करते हैं।
बीज का चयन – बीज कीट, बीमारी, अनावश्यक धूल के कण एवं खरपतवार के बीजों से रहित होने चाहिए। बीज की गुणवत्ता सुनिश्चित करने हेतु इन्हें किसी कृषि विज्ञान केंद्र, कृषि विश्वविद्यालय एवं रजिस्टर्ड बीज कंपनियों से ही खरीदें।

भारत के लगभग 34.4 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में लगभग 14 लाख टन मूंग का उत्पादन होता है तथा इसकी उत्पादकता लगभग 407 किलोग्राम/हेक्टेयर है। मूंग की फसल जलवायु की अनुकूलता के कारण यहां एक उत्तम फसल है। यह खरीफ एवं जायद दोनों ही ऋतुओं में उगाई जाती है। मूंग दाल पोषक तत्वों से भरपूर होती है । यह साबूत, धुली हुई एवं अंकुरित होने के बाद कैल्शियम, आयरन, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट एवं विटामिंस का बहुत अच्छा स्रोत होती है। प्रोटीन की अधिक मात्रा होने के कारण बढ़ते हुए बच्चों को यह दाल अधिक से अधिक खानी चाहिए। अधिक आयरन होने की वजह से एनीमिया का खतरा दूर करती है। दाल में कई एंटीऑक्सीडेंट्स होने के कारण यह स्किन कैंसर जैसी बीमारियों से भी रक्षा करती है। खाली खेतों में मूंग की फसल उगाकर उत्तम रूप से जमीन को उपयोग में ले सकते हैं। मूंग की फसल के प्रबंधन हेतु कुछ सुझाव निम्नानुसार है जो कि किसानों के लिए एक लाभकारी सौदा साबित हो सकता है। इन सभी सुझावों को अपनाकर किसान मूंग की अच्छी उपज ले सकते हैं।

उर्वरक प्रयोग – उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण के बाद आवश्यकतानुसार करना चाहिए। सामान्यतया नाइट्रोजन का उपयोग नहीं करते हैं परंतु फास्फोरस, पोटेशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम एवं सल्फर आवश्यक होता है। फास्फोरस अधिक मात्रा में आवश्यक होता है सामान्यत: 10 किलोग्राम नाइट्रोजन एवं 35 किलोग्राम फास्फोरस बिजाई के समय आवश्यक होता है। कैल्शियम एवं सल्फर की आपूर्ति हेतु 200 किलोग्राम जिप्सम प्रति हेक्टेयर की दर से मिलाते हैं। सामान्यत: 70 किलोग्राम डीएपी प्रति हेक्टेयर पर्याप्त रहता हैं। जायद दलहन फसलों में लगभग 60 किलोग्राम गोबर की खाद को ट्राइकोडर्मा पाउडर के साथ मिलाकर बुआई करने से लगभग 10 दिन पहले खेत में डाल देते हैं।
खरपतवार नियंत्रण – शुरू के 20 से 25 दिन फसल हेतु अत्यधिक नाजुक होते हैं अत: इस समय फसल खरपतवार रहित होनी चाहिए यदि इन्हें नहीं हटाया जाये तो यह लगभग 50 प्रतिशत तक उपज को कम कर देती है । फसल बोने के बाद लगभग 48 घंटों के अंदर पेंडीमिथालीन 30 ई. सी. (3.75 मिलीलीटर/लीटर ) दवा को लगभग 600 से 700 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करते हैं।
सिंचाई – यदि सिंचाई का साधन हो तो ही हम जायद फसलों से उत्पादन ले सकते हैं। पूरी फसल के दौरान जमीन में उपयुक्त मात्रा में नमी बने रहना आवश्यक है। जायद फसलों में कुल तीन से चार बार पानी देना पड़ता है। प्रथम सिंचाई बुवाई के लगभग 20 से 25 दिन बाद करनी चाहिए क्योंकि जल्दी कर देने पर जायद फसलों में जमीन के नीचे बनने वाली राइजोबियम की गाठों की संख्या पर विपरीत असर पड़ता है। बाकी सिंचाईयां 12 से 15 दिन के अंतराल पर करनी चाहिए। फूल लगने से पहले एवं फलियों में दानों के भराव के समय सिंचाई अत्यंत आवश्यक है।
कटाई – फसल लगभग 60 से 65 दिनों में परिपक्व हो जाती है। सभी फलियां एक समय पर नहीं पकती है इसलिए दो से तीन बार में तोडऩी पड़ती है। फलियों की तुड़ाई में ना तो ज्यादा जल्दी नहीं करनी चाहिए क्योंकि इस समय बहुत सी फलियां अपरिपक्व होती है एवं ना ही ज्यादा देरी करनी चाहिए क्योंकि देरी से फलियां फट सकती है एवं दाने जमीन पर बिखर सकते हैं। मूंग में फलियां गुच्छों में लगती है तथा जब यें फलियां काली पड़ती है तो इन्हें दो से तीन बार में तोड़ लिया जाता है तथा बाद में इन फलियों के दानों को निकाल लिया जाता है ।

 मूंग में लगने वाले रोग एवं कीटों के नाम, लक्षण तथा उनके नियंत्रण के उपाय    
 बीमारी एवं कीट लक्षण नियंत्रण
पीला चितेरी रोग  इस रोग में पोधे पीले पड़ जाते है। यह विषाणुओं द्वारा होता है तथा सफेद मक्खी इसे फैलाती है । अधिक प्र्रकोप होने पर फसल पूरी पीली पड़ जाती है। जायद फसलें अधिक तापमान मे होने की वजह से ज्यादा संवेदनशील होती है।  इस रोग को नियत्रिंत करने हेतु सफेद मक्खी को नियत्रिंत करना पड़ता है। इसके नियन्त्रण हेतु कीटनाशी रसायन डाइमिथियेट (750 मिली/हैक्टेयर) का छिड़काव पानी में मिलाकर  बुआई के 30 दिन पश्चात किया जाता है ।
– प्रभावित पौधो को उखाड़कर जला देना चाहिए।
– प्रतिरोधी किस्मों को उगाना चाहिए।
मेक्रोफोनिया रोग  कत्थई भूरे रंग के विभिन्न आकार के धब्बे पत्तियों के निचले भाग पर बनते हैं।  रोकथाम हेतु 0.5 प्रतिशत कार्बेंडाजिम या डायथेन जेड 78, 2.5 ग्राम/लीटर की दर से पानी में घोलकर छिड़काव करें।
सूखा मूल गलन रोग पौधा प्रारम्भ मे पीला पडऩे लगता है  एवं पत्तियां मुरझा जाती हैं। फिर क्रमश: वो सूख जाता है  तथा पौधा उखाडऩे पर वह आसानी से उखड़ जाता है  तथा उसके साथ कोई भी द्वितीय मूल नहीं उखड़ती।  इसके लिए बीजोपचार करते हैं। (थाइरम 4 ग्राम/किग्रा बीज) बीजों में ट्राइकोडर्मा पाउडर 4 ग्राम/किग्रा बीज की दर से मिलाते है।
तम्बाकू की इल्ली इल्ली में कीट शुरू में समूह में रहते है तथा पत्तियों में पाये जाने वाले पर्ण हरित को खाते है जिसके फलस्वरूप पत्तिया सफेद जालीनुमा दिखाई देती है। लार्वा पत्तियों को खाता हैं तथा वयस्क पत्तियों पर समूह मे अण्डे देता हैं । अण्डे के समूह वाली पत्तियों व लार्वा को नष्ट कर देते हैं।
– रसायन ट्राइजोफॉस 40 (800 मिली) या क्विनालफास (1.5 लीटर) को 750 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।
फलीभेदक यह कई फसलों पर आक्रमण करता हैं लार्वा
पत्तियों फूलों फलियों व हरे दानो को खाते है।
यह कई फसलों पर आक्रमण करता हैं लार्वा
पत्तियों फूलों फलियों व हरे दानो को खाते है।
सफेद मक्खी यह बहुत छोटी (1-2 मि मी) आकार की मक्खी होती है जिसके पंखों पर सफेद मोमयुक्त परत होती हैै। दिन मे यह पत्तियो की निचली सतह पर मिलती है। व्यस्क एव शिशु पत्तियों की निचली सतह से रस चूसते है फलस्वरूप पत्तियां पीली होकर गिरने लगती है । – क्विनालफास 25 (1.5 लीटर/हे.) को 600-800 लीटर
  • शीतल राज शर्मा
  • नितिन वाष्र्णेय
  • विवेक शर्मा
    मो.: 09478150941

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