गन्ने के कीट एवं रोकथाम

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गन्ने की विभिन्न अवस्थाओं एवं मौसम के आधार पर देश में लगभग 275 से अधिक प्रकार के कीट इस प्रमुख नगद फसल को नुकसान पहुंचाते हैं।
इनमें से प्रदेश में सक्रिय भूमिगत, बेधक एवं चूसक कीटों के बारे में आवश्यक जानकारी यहां दी जा रही है। यह अनुमान है कि गन्ना फसल में 20 प्रतिशत से अधिक औसत उपज व शक्कर रिकबरी में भी कीटों द्वारा नुकसान होता है। वैज्ञानिक अनुशंसा है कि सावधानी अपनाकर एवं समय पर उपचार कर अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती है।
भूमिगत कीट
दीमक (टरमाईट)- यह शुष्क जलवायु, हल्की भूमियों एवं सिंचाई की कमी वाले इलाकों में अधिक नुकसान पहुंचाता है। गन्ने की बोई हुई आंखों को पहले असर कर अंकुरण प्रभावित करता है। बाद में पोरियों में सुरंग जैसी बनाकर मिट्टी भरी दिखाई देती है। हालांकि रानी दीमक तो बांबी में रहती है पर खेत में सफेद से चीटी आकार के श्रमिक दीमक मिट्टी में दिखाई देते हैं। फसल को 30 से 40 प्रतिशत तक नुकसान पहुंचाते हैं। इसका प्रकोप वैसे तो सारा साल रहता है। पर गर्मी में तीव्रता बढ़ जाती है।
व्हाईट ग्रब (कुन्डल कीट)- इस कीट से विभिन्न फसलें जिनकी जड़ों को नुकसान पहुंचा कर यह कीट 20 से 42 प्रतिशत एवं कभी-कभी पूरी फसल को चौपट करता है। खेत में कच्चा खाद डालने से इसका प्रकोप अधिक होता है। ग्रब द्वारा जड़ों को खाने के कारण गन्ने की पत्तियां पीली पड़ कर सूखने लगती है। खेत में यत्र -तत्र सूखे पौधे नजर आने लगते हैं। मई से अगस्त माह तक इसका नियंत्रण आवश्यक है।
भूमिगत कीटों की रोकथाम

  • दीमक के बांबियों को आसपास की पड़त भूमियों में तलाश कर उसमें रानी दीमक को नष्ट करें। बांबी में क्विकफॉस /सल्फास या अन्य धूम्र विनासक पतली पाईप से डालें।
  • दीमक एवं ग्रब हेतु 20 से 25 किलो क्लोरोपायरीफॉस डालकर नमी बनाएं रखें। अथवा इमिडाक्लोप्रिड 17.8 प्रतिशत 400 मि.मी./हे. 1750 लीटर पानी में मिला कर छिड़कें।
  • अधिक प्रकोप की दशा में बाईफेन्थ्रिन (मारकर) 400 मिली को 2-3 लीटर पानी में घोल कर रेत में मिलाकर पौधों के पास भुरकें व सिंचाई करें।
  • वर्षा पूर्व कीटनाशक क्लोथियानीडीन 50 डब्ल्यू डीजी का 250 ग्राम 1800 लीटर पानी में मिलाकर पौधों का छिड़कें व नमी बनाये रखें।
  • जैविक रोकथाम हेतु फफूंद बेविरिया/बेसियाना या मेटाटाइजियम एनासोपलाई 5 कि.ग्रा. पके खाद या प्रेसमड में मिलाकर पौधों के पास डाल कर मिलाएं।
  • दीमक के खेत में घूमते कीटों को नष्ट करने हेतु मटकों में मक्का के छूंछ (दाना निकला भुट्टा) एवं थोड़ा पानी डालें। ऐसे मटकों को खेत में 5-6 स्थानों पर रखें। यह भुट्टों की सड़ांध वाली महक दीमक को आकर्षित करेगी। जब पर्याप्त दीमक अंदर दिखे तब मटकों के मुंह पर कपड़ा बांध कर अंगारों पर थोड़ी देर रखें, इससे दीमक नष्ट हो जायेगी। ऐसा दो-तीन बार करें।
  • ट्रेप फसलें ढेंचा की जड़ों के पास या गन्ने के खेत के आसपास नीम, जामुन, बबूल की टहनियां जगह-जगह गाडें़। इन पर इल्लियां आकर्षित होंगी। उनको कीटनाशकों से मारें।

चूसक कीट
पपड़ी कीड़ा –यह बोरियों पर पपड़ी की तरह चिपका रहकर रस चूसता है। पौंधों की बढऩ को काफी नुकसान होता है। बीज के साथ, कृषि कार्यों के उपकरणों के साथ, पुराने ठूटों के माध्यम से स्वस्थ फसल में इधर-उधर फैलता है। जड़ी फसल में अधिक प्रकोप पाया जाता है। इसका प्रकोप गांठें बनने के बाद से अंत तक बना रहता है। वर्षाऋतु में अधिक फैलता है।
रोकथाम

  • कीट मुक्त बीज का उपयोग करें। जड़ी फसल से बीज न लें।
  • बीजोपचार के घोल में 1 मिली/लीटर पानी के मान से मेलाथियान (50 ई.सी.) का अवश्य उपयोग करें।
  • निचली पत्तियों को निकाल पर पोरियों पर डायमिथिएट (30 ई.सी.) या क्विनालफास दवा 2.5 लीटर प्रति हेक्टर का छिड़काव करें।
  • जैविक उपचार में गौमूत्र व नीम का घोल पोरियों पर छिड़कें। फाक्सीनिलिड परभक्षियों के 1500 व्यस्क बीटल/हे. फसल पर छोड़ें। इस दशा में रसायनिक उपचार न करें।

पाईरिल्ला – पत्तियों से रस चूसकर नुकसान करने वाला प्रमुख कीट है। इसका प्रकोप अप्रैल से अक्टूबर तक रहता है। व्यस्क कीट भूरे रंग का व सिर के आगे चोंच जैसा होता है। निम्फ या शिशु के पीछे दो पूंछ जैसी संरचना होती है। शिशु एवं व्यस्क दोनों नुकसान करते हैं व इसके कारण पत्तियों का रंग पीला पडऩे लगता है। यह कीट पत्तियों पर लसलसा पदार्थ छोड़ता है जिस पर काली फफूंद का असर होने लगता है। हरीतिमा में कमी के कारण बढऩ रुक जाती है। उपज में 15 से 20 प्रतिशत कमी एवं साथ ही चीनी की मात्रा पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है। अंडों के हल्के पीले रंग के गुच्छे नजर आते ही नियंत्रण उपाय शुरू कर देना चाहिये।
नियंत्रण

  • पाईरिल्ला का सफल प्रबंधन जैविक उपायों से संभव है। इस हेतु एपीरिकेनिया परजीवी के 4-5 लाख अंडे या 5 हजार संखिया/हेक्टर प्रकोपित फसल पर छोड़ें। खेत में, अगर वर्षा न हो तो, सिंचाई कर नमी बनाएं रखें।
  • मेटाराईझियम एनीसोपलाई फफूंद ग्रसित 250-400 पाईरिल्ला प्रति हेक्टर छोड़ें या इस फफूंद के 10 विषाणु (स्पोर) प्रति मि.ली. पानी में घोलकर छिड़कें। इसी तरह ग्रेनिकोसिस विषाणु के प्रयोग भी संतोष जनक रहे हैं।
  • पायरिल्ला अंडों पर परजीवी टेट्रास्टिकस पाईरिल्ली के ग्रसित अंडों के समूहयुक्त पत्तों को काटकर अगर परजीवी प्रभावित फसल में नजर न आये तो क्विनालफॉस 25 प्रतिशत 800 मि.ली. /हे. या अन्य स्पर्श प्रभावी कीटनाशक का छिड़काव करें।
  • सफेद मक्खी -पत्तियों पर सफेद काले कीड़े (कोष) चिपके नजर आते हैं। निचली सतह से रस चूसकर नुकसान पहुंचाते हैं जिससे पत्तियां पीली पड़कर सूखने लगती हैं। जिन खेतों में पानी का भराव हो या नत्रजन की कमी से कमजोर फसल में प्रकोप अधिक होता है। जड़ी फसल में प्रभाव पहले नजर आता है। उपज में 20-25 प्रतिशत एवं रिकवरी में 1 से 3 प्रतिशत की कमी आती है।

रोकथाम

  • प्रभाव दिखते ही क्राईसोपर्ला के 2500 अंडे या लारर्वा जो प्रयोगशालाओं या बाजार में उपलब्ध हैं को ग्रसित पत्रों पर छोड़ें।
  • जल निकासी करें व नत्रजन की कमी न होने दें। प्रारंभिक अवस्था में ग्रसित पत्तियों को निकाल कर नष्ट करें।
  • रसायनिक उपायों में क्विनालफॉस या क्लोरोपायरीफॉस 2 मि.ली./लीटर पानी में मिलाकर छिड़कें। फुहार पत्तियों के नीचे की तरफ अवश्य पड़ें। अधिक प्रकोप की दशा में इमीडाक्लोप्रिड (17.8 प्रतिशत) 200 मि.ली./हे. छिड़कें।

मिली बग – यह गुलाबी रंग का कीट गन्ने की गठानों के पास चिपका नजर आता है। गन्ने पर लसलसा पदार्थ जिसमें बाद में काले रंग की मोल्ड का प्रभाव हो जाता है। सूखे की दशा में अधिक प्रकोप होता है। तेज वर्षा में एसपरजिलस फफूंद का प्रभाव बढऩे से प्रकोप में कमी आती है। दूर से गन्ने में ऊपर-नीचे चढ़ते उतरते चीटें इसका लक्षण हैं। यह 15-20 प्रतिशत उपज में व 1-2 प्रतिशत रिकबरी का नुकसान कर देते हैं।
रोकथाम
स्वच्छ बीज के टुकड़ों को पानी में रात भर भिगोकर उपचारित करें। बाविस्टीन के साथ मेलाथियान या अन्य कीटनाशक डालें। गन्नों के तनों पर पपड़ी कीट की तरह कीटनाशी का छिड़काव करें। इस हेतु क्विनालफॉस या क्लोरोपायरीफास का 2 मिली दवा प्रति लीटर पानी या इमिडाक्लोप्रिड 200 मि.ली. 800 ली. पानी में मिलाकर गन्नों पर छिड़कें। परजीवी क्राईसोपर्ला अगर मौजूद हो तो वह इस कीट का भक्षण करता है।
छेदक कीट
अग्रतना छेदक – बुआई उपरांत अंकुरण के बाद बढ़ते तापक्रम के साथ अग्रतना छेदक का प्रकोप ऊपर की पोई सूखने के लक्षण से दिखाई देने लगता है। बसंत कालीन एवं गर्मी की बुआई में इसका प्रकोप अधिक होता है।
इसकी इल्ली मुलायम तने में सतह के पास से छेदकर प्रवेश करती है एवं गोफ को खाने के कारण ऊपर निकलती पोई सूख जाती है। इसे जरा सा खींचने से बाहर निकल आती हैं। इस छेदक का प्रकोप उपज और शक्कर की मात्रा पर घातक सिद्ध होता है।
रोकथाम

  • अग्रतना छेदक ग्रसित पौधों को सतह से काटकर निकालें। इसके उपरांत जो कल्ले आयेंगे वे गन्ना बनेगें।
  • पलवार बिछे खेत में नाजुक इल्ली तने तक पहुंचने के पहले ही नष्ट होने की संभावना अधिक रहती है।
  • देर की बोनी में अंकुरण के समय ही फोरेट दानेदार 25 किलो/हेक्टर डालकर पानी देते रहें। मेलाथियान/ कार्बोरिल डस्ट भी पौधों के पास भुरकी जा सकती है। स्पर्श कीटनाशी का जैसे क्विनालफॉस/क्लोरोपाईरीफॉस का छिड़काव भी प्रकोप को रोकता है।
  • अंडों के परजीवी ट्राईकोग्रामा किलोनिस 5000 व्यस्क मार्च माह में छोड़ें। असर कम हो तो दुबारा छोड़ें।

शीर्ष तना छेदक – यह प्राय: भरपूर बढऩ होने के बाद प्रकोप करता है। अगर तीव्रता अधिक हो तो किसी भी अवस्था में इसका असर देखा जा सकता है। यह ऊपरी अधखुली पत्ती की शिरा से प्रवेश कर नीचे की ओर सुरंग बनाते हुए गोफ तक पहुंच कर बढ़वार बिन्दु को नष्ट कर देता है। बढ़वार रुक जाने से ऊपरी गांठों पर अंकुरित शाखाएं दिखने लगती हैं। ऊपरी खुलती पत्तियों को देखें तो उन पर एक लाईन में कई छेद नजर आते हैं। यह इस छेदक की मुख्य पहचान है। विभिन्न अवस्थाओं में इस कीट की 5 पीढिय़ां मार्च माह से वर्षाकाल में नुकसान पहुंचाती है। औसतन 20-25 प्रतिशत उपज में कमी आ जाती है। शक्कर की गुणवत्ता एवं मात्रा में भी नुकसान होता है।
रोकथाम

  • जैविक उपचार हेतु अन्डे परजीवी ट्राईकोग्रामा के 50000 व्यस्क/हे. 15-20 दिन के अंतराल पर छोड़ें। ट्राईकोकार्ड अच्छी प्रयोगशाला से ही लें। लाईट ट्रेप का प्रयोग करते रहें।
  • गन्ने में मिट्टी अवश्य चढ़ायें।
  • कार्बोफ्यूरान (3 जी) वर्षा शुरू होते ही नमी में गन्नों के पास डालें या सिंचाई करें या फ्यूराडान (3 जी) 33 किलो का प्रयोग करें।

जड़ छेदक – यह बेधक कीट भूमि के अंदर से तनों में छेद कर प्रवेश करता है। इसकी इल्ली पत्तियों पर से रेंगती हुई नीचे तक आकर नुकसान पहुंचाती है। अगर इसका प्रकोप प्रारंभिक अवस्था में होता है तो मध्य पोई सूख जाती है पर खींचने से निकलती नहीं है ना ही दुर्गन्ध आती हैं जैसी अग्रतना छेदक के ग्रसित पौधों में आती है। बाद की अवस्था में लक्षण बाहर से नहीं दिखते पौधा सूखता जाता है। इसकी इल्ली का रंग सफेद, सिर का रंग भूरा व पीठ पर कोई धारी नहीं होती है। जबकि अग्र तना छेदक इल्ली के सिर का रंग काला व पीठ पर पांच जामुनी रंग के पट्टे दिखते हैं। प्रकोपित पौधों में अधिकतर कल्ले नहीं फूटते या अपेक्षाकृत कम फूटते हैं।
रोकथाम

  • ट्राईकोग्रामा परजीवी कीट 3 लाख प्रति हेक्टर मान से छोड़ें यह अंडों को नष्ट करेगा।
  • क्लोरोपाईरीफॉस 20 ईसी) का 5 लीटर/हे. का 1000 ली. पानी में मिलाकर जड़ों के पास ड्रेन्चिग करें।
  • क्विनालफॉस (5 प्रतिशत) या कार्बोफ्यूरान 25 से 30 किलो/हे. जड़ों के पास हलका छिड़काव करें।

तना छेदक – इस कीट की भी इल्लियां हानि पहुंचाती हैं। इस कीट का प्रकोप वर्षाऋतु में ही होता है। पत्तियों पर अंडों से निकलकर इल्ली तने पर आंखों के सहारे गन्ने में छेद कर प्रवेश करती है। पोरियों पर छोटे-छोटे छेद पाये जाते हैं जहां से यह बाहर निकलती है। आंखें अंकुरित हो जाती हैं। गन्ना सूखने लगता है। अगोला पहले सूखता है। उपज में 15-20 प्रतिशत की कमी एवं गुणवत्ता में 1 से 1.5 प्रतिशत रिकवरी का नुकसान हो जाता है।
रोकथाम

  • अन्य बेधक कीटों की तरह ट्राइकोकार्ड लगायें। कोटेशियाफेलिपस इस इल्ली का परजीवी है। 500 व्यस्क/हे. या 2 या 3 बार छोड़ें।
  • स्पर्श कीटनाशी क्लोरोपाईरीफॉस/ क्विनालफॉस आदि का छिड़काव करें।
  • निचली पत्तियों को निकाल कर नष्ट करें।
  • गन्ना गिरने से बचायें।
  • खेतों में लाईट ट्रेप एवं फेरोमेन ट्रेप अवश्य लगायें।

सफेद ऊनी माहू – महाराष्ट्र में इसका प्रकोप होता रहता है। इस हेतु सावधानी आवश्यक है। शिशु पीले हरे रंग के होते हैं जिनकी पीठ पर सफेद रोयें ऊन की तरह दिखाई देते हैं। पत्तियों की पिछली सतह पर मुख्य शिरा के दोनों ओर दिखाई देते हैं।
रस चूसकर एवं उत्सर्जित शहद नुमा पदार्थ जिस पर काली फफूंद होने से बढऩ रुक जाती है। उपज व रिकवरी पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है।
रोकथाम
इसका जैविक नियंत्रण हेतु कोनोवाथ्रा (डीफा एफीडोव्होरा) परजीवी की इल्लियां माहू को चट कर जाती हैं। इसके अलावा मावक्रोसम इगोरोट्स एवं सिरफिड मक्खी भी प्रभावी सिद्ध हुई हैं। क्राईसोपर्ला परजीवी भी अगर फसल में हो तो इल्लियों को नष्ट करने में सहायक है। रसायनिक नियंत्रण हेतु स्पर्श कीटनाशियों का छिड़काव करें।

  • डॉ. साधुराम शर्मा, पूर्व गन्ना आयुक्त म.प्र.
    मो. : 9425478203
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