चावल की एसआरआई पद्धति

भारतीय किसानों ने उन्नत किस्मों का चुनाव, खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग तथा पौध संरक्षण उपायों को अपनाकर धान की उपज बढ़ाने में सफलता हासिल की है परंतु बीते कुछ वर्षों से धान की उत्पादकता में संतोषजनक वृद्धि नहीं हो पा रही है। शोध संस्थानों तथा प्रदर्शन प्रक्षेत्रों पर 50-60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर धान की उपज प्राप्त की जा रही है। बढ़ती जनसंख्या और घटते संसाधन को देखते हुए वर्तमान समय में संकर किस्मों को अपनाते हुए नई तकनीक से खेती कर प्रति इकाई उत्पादन बढ़ाने के अलावा हमारे पास उपज बढ़ाने के और कोई विकल्प शेष नहीं है। उपलब्ध संसाधनों के बेहतर प्रबंधन से, जिसमें उर्वरक तथा जल उपयोग क्षमता बढ़ाना शामिल है। धान की उत्पादन लागत भी कम की जा सकती है।

चावल सघनीकरण पद्धति क्या है?

प्रति इकाई क्षेत्र से कम -से-कम लागत में धान का अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने मेडागास्कर में फादर हेनरी डी लौलनी ने धान उत्पादन तकनीक विकसित की, जो सघनीकरण पद्धति अर्थात् मेडागास्कर तकनीक के नाम से लोकप्रिय हो रही है। भूमि, श्रम, पूंजी और पानी के समक्ष उपयोग से धान उत्पादन में अच्छी वृद्धि की जा सकती हैं। श्री पद्धति में कम दूरी पर कम उम्र का पौधा रोपा जाता है जिसमें उर्वरक एवं जल का न्यूनतम एवं सक्षम उपयोग करते हुए प्रति इकाई अधिकतम उत्पादन लेने की रणनीति अपनाई जाती है। इस पद्धति में धान के पौधे से अधिक कंसे निकलते हैं तथा दाने पुष्ट होते हैं। भारत में भी अनेक स्थानों पर इस पद्धति में धान के पौधे से अधिक कंसे निकलते हैं तथा दाने पुष्ट होते हैं। भारत में भी अनेक स्थानों पर इस पद्धति से 7-10 टन प्रति हेक्टेयर उत्पादन लिया जा चुका है। भारत के दक्षिणी राज्यों में श्री पद्धति से धान उगाने का प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है। इस तकनीक को अपनाने से सिंचित अवस्था में धान की औसत उत्पादकता कम से कम 6-7 टन प्रति हेक्टेयर तक ली जा सकती है।

पौध रोपणी एवं खेत की तैयारी

संकर अथवा अधिक कल्ले देने वाली उन्नत किस्मों का प्रयोग करें। रोपणी हेतु चुने गये खेत की दो तीन बार जुताई कर मिट्टी भुरभुरी कर लें। एक मीटर चौड़ी एवं आवश्यकतानुसार लंबी तथा 15-30 सेमी. ऊंची क्यारी बनायें। क्यारी के दोनों और सिंचाई नाली बनाना आवश्यक है। एक हेक्टर क्षेत्र के लिए 100 वर्ग मीटर की रोपणी पर्याप्त है। क्यारी में 50 किलोग्राम कम्पोस्ट मिलाकर समतल कर दें। प्रति हेक्टेयर 7-8 किग्रा. बीज का प्रयोग करें। उपचारित बीज को (प्रति क्यारी 90-100 ग्राम बीज या 9-10 ग्राम प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से) समान रूप से छिड़क कर पुन: कंपोस्ट या गोबर खाद से बीज ढंक दें। रोपणी पर धान के पैरा की तह बिछाने से बीज सुरक्षित रहते हैं। क्यारियों में 1-2 दिन के अंतराल से फब्बारा से सिंचाई करें। बोने के 3 दिन बाद रोपणी में बिछाई गई धान के पैरा की परत हटा दें।

पौध रोपाई

रोपाई हेतु पारंपरिक धान की खेती के समान खेती के समान खेत की जुताई करें एवं समुचित मात्रा में गोबर की खाद मिलाएं। खेत में पानी भर कर अच्छी तरह से मचाई पश्चात पाटा चलाकर खेत को समतल कर लेना चाहिए। प्रत्येक 3-4 मीटर की दूरी पर क्यारी का निर्माण करें जिससे जल निकासी संभव हो सके। रोपाई पूर्व खेत से जल निकाल देना चाहिये। मार्कर की सहायता से दोनों और 25&25 से.मी. कतार (लाइन) बनायें और दोनों कतारों के जोड़ पर पौधा लगायें।

चटाई युक्त रोपणी
इसमें अंकुरित बीज बोये जाते हैं। समतल स्थान पर प्लास्टिक शीट बिछायें। इसके ऊपर 1 मीटर लम्बा, आधा मीटर चौड़ा तथा 4 सेमी गहरा लकड़ी का फ्रेम रखें। इस फ्रेम में मिट्टी का मिश्रण (70 प्रतिशत मृदा, 20 प्रतिशत गोबर की सड़ी हुई खाद व 10 प्रतिशत धान की भूसी) तथा 1.5 कि.ग्रा. डायअमोनियम फास्फेट (डीएपी) मिलाकर भर दिया जाता है। बीज की निर्धारित मात्रा को 24 घंटे पानी में भिगोकर रखने के बाद पानी निथार देते है। अब 90-100 ग्राम बीज प्रति वर्ग मीटर की दर से समान रूप से बोकर सूखी मिट्टी की पतली तह (5 मिमी) से ढंक देते हैं। अब इस पर झारे की सहायता से पानी का छिड़काव करें जब तक कि फेम की पूरी मिट्टी तर न हो जाए। अब लकड़ी का फ्रेम हटाकर उपर्युक्तानुसार अन्य क्यारियां तैयार करें। इन क्यारियों में 2-3 दिन के अंतराल से सिंचाई करें। बोआई के 6 दिन बाद क्यारियों में पानी की पतली तह बनाएं रखे तथा रोपाई के 2 दिन पूर्व पानी निकाल दें। बोने के के 8-10 दिन में चटाई युक्त रोपणी तैयार हो जाएगी।

 

कम उम्र की रोपणी

धान की पौध 15 दिन से अधिक की होने पर पौधों की वृद्धि को कम कर देती है। सामान्यतौर पर 12-14 दिन के पौधे इस पद्धति से रोपाई हेतु उपयुक्त रहते हैं। दो पत्ती अवस्था या 8-10 दिन के धान के पौधे के कंसे व जड़ दोनों में सामान्यत: 30-40 दिन की रोपणी की तुलना में ज्यादा वृद्धि देखी गई है, जिससे पौधे नमी व पोषक तत्वों को अच्छे से ग्रहण करते हैं, फलस्वरूप अधिक पैदावार प्राप्त होती है। पौधे उखाडऩे के बाद शीघ्र रोपाई करना आवश्यक है। रोपाई वाले खेत में पानी भरा नहीं होना चाहिए।

एक स्थान पर एक पौध की रोपाई

परम्परागत रूप से एक स्थान पर 2-3 पौधों की रोपाई की जाती है, जबकि इस विधि में एक स्थान पर केवल एक ही पौधा 2 सेमी. की गहराई पर सीधा लगाया जाता है। एक पौधे को बीज व मिट्टी सहित अंगूठे व कनिष्का अंगुली की सहायता से दोनों कतार के जोड़ पर रोपित करना चाहिए।

पौधे से पौधे की समान दूरी

कतारों में रोपाई की तुलना में चैकोर विधि से धान की रोपाई करने से पौदे को पर्याप्त प्रकाश मिलता है व जड़ों की वृद्धि होती है। कतार तथा पौधे से पौध की दूरी 25ङ्ग25 सेमी. रखते हैं। मिट्टी के प्रकार व उर्वरकता के आधार पर यह दूरी घटाई-बढ़ाई जा सकती है। पौधों की दूरी अधिक रखने से जड़ों की वृद्धि ज्यादा होती है तथा कंसे भी अधिक बनते हैं, साथ ही वायु का आगमन व प्रकाश संश्लेषण भी अच्छा होगा जिससे पौधे स्वस्थ व मजबूत कंसे अधिक संख्या में निकलेंगे जिनमें दानों का भराव भी अधिक होगा। रोपणी से पौधे इस प्रकार उखाड़े जिससे उनके साथ मिट्टी, बीज और जड़े बिना धक्का के यथास्थिति में बाहर आ जाएं तथा इन्हें उखाडऩे के तुरन्त बाद मुख्य खेत में इस प्रकार रोपित करें कि उनकी जड़े अधिक गहराई में न जाएं। ऐसा करने से पौधे शीघ्र ही स्थापित हो जाते हैं।

जल प्रबंधन

श्री पद्धति में खेत को नम रखा जाता है। खेत में प्रत्येक 3-4 मीटर के अंतराल से जल निकास हेतु एक फीट गहरी नाली बनाएं जिससे खेत से जल निकासी होती रहे। वानस्पतिक वृद्धि की अवस्था में जड़ों को आद्र्र रखने लायक पानी दिया जाता है, जिससे खेत में बहुत पतली दरारें उत्पन्न हो जाती हैं। ये दरारें पौधे की जड़ों को आक्सीजन कराती हैं, जिससे जड़ों का फैलाव व वृद्धि अच्छी होती है एवं जड़ें पोषक तत्वों को मृदा ग्रहण कर पौधे के विभिन्न भागों में पहुंचाने में अधिक सक्षम होती है। वानस्पतिक अवस्था के पश्चात फूल आने के समय खेत को 2.5-3 सेमी. पानी से भर दिया जाता है और कटाई से 25 दिन पूर्व पानी को खेत से निकाल देते हैं।

खाद एवं उर्वरक उपयोग

किसी भी स्रोत द्वारा तैयार जैविक खाद या हरी खाद का उपयोग करने से पोषक तत्वों की उपलब्धता में बढ़ोत्तरी के साथ-साथ भूमि में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा भी बढ़ती है, जो पौधे को अच्छी बढ़वार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मिट्टी परीक्षण कर पोषक तत्वों की मात्रा का निर्धारण करें। प्रारंभिक वर्षों में 10-12 टन हेक्टेयर गोबर की खाद देना चाहिए। गोबर की खाद की उपलब्धता कम होने पर 120:60:40 किग्रा. क्रमश: नत्रजन, स्फुर एवं पोटाश प्रति हेक्टेयर देना चाहिये। स्फुर व पोटाश की सम्पूर्ण मात्रा रोपाई से पहले तथा नत्रजन को तीन किस्तों में (25 प्रतिशत रोपाई के एक सप्ताह बाद, कंसे फूटते समय 50 प्रतिशत तथा शेष मात्रा गभोट प्रारंभ होते समय) देना चाहिये।

खरपतवार नियंत्रण एवं निंदाई

खेत में पानी भरा नहीं रहने से खरपतवार प्रकोप अधिक हो सकता है। अत: रोपाई के 10-15 दिन बाद हस्तचलित निंदाई यंत्र ताउची गुरमा (कोनो वीडर) द्वारा 15 दिन के अंदर से 2-3 बार निंदाई करते हैं, जिससे न केवल नींदा समाप्त होते हैं, वरन जड़ों में वायु का प्रवाह भी बढ़ता है, जो जड़ों की वृद्धि व पौधों के पोषक तत्वों को ग्रहण करने की क्षमता में भी वृद्धि करता है।

चावल सघनीकरण पद्धति (एसआरआई) के प्रमुख लाभ-

1. श्री पद्धति में बीज कम (5-6 किग्रा.) लगता है जबकि पारंपरिक विधि में 50-60 किग्रा. बीज लगता है।

2. इस पद्धति में धान की फसल से कम पानी में अधिकतम उपज ली जा सकती है।

3. उर्वरक और रसायनिक दवाओं (कीटनाशक) का कम प्रयोग किया जाता है।

4. प्रति इकाई अधिकतम कंसे (30-50) जिनमें पूर्ण रूप से भरे हुए एवं उच्चतर वजन वाले पुष्पगुच्छ (पेनिकल्स) प्राप्त होते हैं।

5. फसल में कीट-रोग प्रमुख की न्यूनतम संभावना होती है।

6. समय पर रोपाई और संसाधनों की बचत होती है।

7. अधिक उपज प्राप्त होती है।

  • निधि वर्मा
  • डॉ. प्रणय भारती
  • डॉ. सत्येंद्र कुमार
    email:kvkdindori@rediffmail.com

www.krishakjagat.org

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