अनार से आए बहार

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मिट्टी :
अनार विभिन्न प्रकार की मिट्टियंो में उगाया जा सकता है। परन्तु अच्छे जल विकास वाली रेतीली दोमट मिट्टी सर्वोतम होती है। फलों की गुणवत्ता एवं रंग भारी मृदाओं की अपेक्षा हल्की मृदाओं में अच्छा होता है। अनार मृदा लवणीयता 9.00 ई.सी./मि.ली. एवं क्षारीयता 6.78 ई.एस.पी. तक सहन कर सकता है।
उन्नत किस्में :
भगवा, मृदुला, अरक्ता।
प्रवर्धन :
कलम द्वारा- एक वर्ष पुरानी शाखाओं से 20-30 से.मी.लम्बी कलमें काटकर पौध शाला में लगा दी जाती हैं। इन्डोल ब्यूटारिक अम्ल (आई.बी.ए.) 3000 पी.पी.एम. से कलमों को उपचारित करने से जड़ें शीघ्र एवं अधिक संख्या में निकलती हैं। गूटी द्वारा-अनार का व्यावसायिक प्रर्वधन गूटीद्वारा किया जाता है। इस विधि में जुलाई-अगस्त में एक वर्ष पुरानी पेन्सिल समान मोटाई वाली स्वस्थ, ओजस्वी, परिपक्व, 45-60 से.मी. लम्बाई की शाखा का चयन करें । चुनी गई शाखा से कलिका के नीचे 3 से.मी. चौड़ी गोलाई में छाल पूर्णरूप से अलग कर दें। छाल निकाली गई शाखा के ऊपरी भाग में आईबीए 5,000 पी.पी.एम. का लेप लगाकर नमी युक्त स्फेगनम मास चारों और लगाकर पॉलीथिन शीट से ढंककर सुतली से बाँध दें। जब पालीथिन से जड़े दिखाई देने लगें उस समय शाखा को स्केटियर से काटकर क्यारी या गमलो में लगा दें।
रोपण दूरी :
पौध रोपण की आपसी दूरी मृदा का प्रकार एवं जलवायु पर निर्भर करती है। सामान्यत: 4-5 मीटर की दूरी पर अनार का रोपण किया जाता है। सघन रोपण पद्धति 4.5&3 मीटर (740 पौधे प्रति हेक्टेयर) पंक्ति से पंक्ति एवं पौधे से पौधे की दूरी पर रोपण करें।
गड्ढों की खुदाई:
पौध रोपण के एक माह पूर्व 60& 60 & 60 सेमी. लम्बाई & चौड़ाई & गहराई आकार के गड्ढे खोद कर 15 दिनों के लिए खुला छोड़ दें। जिन स्थानों पर बैक्टीरिल ब्लाइट की समस्या हो वहाँ प्रति गड्डे में 100 ग्राम कैल्शियम हाइपोक्लोराइट से भी उपचार करना चाहिए। ऊपरी उपजाऊ मिट्टी में 10 कि.ग्रा. सड़ी गोबर, 2 कि.ग्रा. वर्मीकम्पोस्ट, 2 कि.ग्रा. नीम की खली तथा 25 ग्राम ट्राइकोडरमा विरडी को मिलाकर गड्डों को ऊपर तक देना चाहिए। गड्ढे भरने के बाद सिंचाई करें ताकि मिट्टी अच्छी तरह से जम जाए तदुपरान्त पौधों का रोपण करें एवं रोपण पश्चात तुरन्त सिचाई करें।

अनार भारत की एक महत्वपूर्ण फल फसल है । घरेलू और विदेशी बाजार में अनार के अच्छे मूल्य की प्राप्ति को देखते हुए देश के काश्तकारों का रूझान अनार की खेती करने की ओर तेजी से बढ़ रहा है भारत में अनार की खेती मुख्य रूप से महाराष्ट्र में की जाती है। राजस्थान, उत्तरप्रदेश, आंध्रप्रदेश, हरियाणा, पंजाब, कर्नाटक, गुजरात में छोटे स्तर में इसके बगीचे देखे जा सकते हैं। इसका रस स्वादिष्ट तथा औषधीय गुणों से भरपूर होता है।

रोपण:


पौध रोपण के लिए जुलाई-अगस्त का समय अच्छा रहता है । परन्तु पर्याप्त सिंचाई सुविधा उपलब्ध होने पर फरवरी-मार्च में भी पौधे लगाये जा सकते हैं।
खाद एवं उर्वरक:
अनार से भरपूर उपज लेने के लिए खाद एवं उर्वरकों का उपयोग मृदा परीक्षण के आधार पर करें। सामान्य मृदा में 10 कि.ग्रा. सड़ी गोबर की खाद, 500 ग्राम यूरिया, 500 ग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट तथा 200 ग्राम मयूरेट ऑफ पोटाश प्रतिवर्ष प्रति पेड़ देना चाहिए । प्रत्येक वर्ष इसकी मात्रा इस प्रकार बढ़ाते रहना चाहिए कि पांच वर्ष बाद प्रत्येक पौधों को क्रमश: 1500 ग्राम यूरिया, 2 किलोग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट तथा 500 ग्राम मयूरेट ऑफ पोटाश दें। । शुरू में दो वर्ष तक जब पौधों में फल नहीं आ रहे हों, उर्वरकों को तीन बार में जनवरी, जून तथा सितम्बर में देना चाहिए तथा तीसरे वर्ष में जब फल आने लगे तो मौसम ( बहार ) के अनुसार दो बार में देना चाहिए। नाइट्रोजन एवं पोटाश युक्त उर्वरकों को तीन हिस्सों में बांट कर पहली खुराक सिंचाई के समय या बहार प्रबंधन के बाद और दूसरी खुराक पहली खुराक के 3-4 सप्ताह बाद दें, फॉस्फोरस की पूरी खाद को पहली सिंचाई के समय दें। खाद एवं उर्वरकों का उपयोग केनोपी के नीचे चारों ओर 8-10 सेमी.गहरी खाई बनाकर देना चाहिए। नत्रजन की आपूर्ति के लिए काली मिट्टी में यूरिया एवं लाल मिट्टी में कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट का प्रयोग करें, फॉस्फोरस की आपूर्ति के लिए सिंगल सुपर फास्फेट एवं पोटाश की आपूर्ति के लिए म्यूरेट ऑफ पोटाश का प्रयोग करें। जिंक, आयरन, मैगनीज तथा बोरेक्स की 15 ग्राम मात्रा प्रति पौधे में पकी गोबर की खाद के साथ मिलाकर डालें, सूक्ष्म पोषक तत्व की मात्रा का निर्धारण मृदा तथा पत्ती परीक्षण द्वारा करें।
सिंचाई :
अनार के पौधे सूखा सहनशील होते हैं। परन्तु अच्छे उत्पादन के लिए सिंचाई आवश्यक है। मृग बहार की फसल लेने के लिए सिंचाई मई के मध्य से शुरु करके मानसून आने तक नियमित रूप से करना चाहिए। वर्षा ऋतु के बाद फलों के अच्छे विकास हेतु नियमित सिंचाई 10-12 दिन के अन्तराल पर करना चाहिए। ड्रिप सिंचाई अनार के लिए उपयोगी साबित हुई है। इसमें 43 प्रतिशत पानी की बचत एवं 30-35 प्रतिशत उपज में वृद्धि पाई गई है। ड्रिप द्वारा सिंचाई विभिन्न मौसम में उनकी आवश्यकता के अनुसार करें।
सधाई :
अनार मे सधाई का बहुत महत्व है। अनार की दो प्रकार से सधाई की जा सकती है।
एक तना पद्धति – इस पद्धति में एक तने को छोडकर बाकी सभी बाहरी टहनियों को काट दिया जाता है। इस पद्धति में जमीन की सतह से अधिक सकर निकलते हैं।जिससे पौधा झाड़ीनुमा हो जाता है। इस विधि में तना छेदक का अधिक प्रकोप होता है। यह पद्धति व्यावसायिक उत्पादन के लिए उपयुक्त नही हैं।
बहु तना पद्धति – इस पद्धति में अनार को इस प्रकार साधा जाता है कि इसमे तीन से चार तने छूटे हों,बाकी टहनियों को काट दिया जाता है। इस तरह साधे हुए तनें में प्रकाश अच्छी तरह से पहुंचता है। जिससे फूल व फल अच्छी तरह आते हैं।
काट-छांट :

  • ऐसे बगीचे जहाँ पर ऑइली स्पाट का प्रकोप ज्यादा दिखाई दे रहा हो वहाँ पर फल की तुड़ाई के तुरन्त बाद गहरी छँटाई करनी चाहिए तथा ऑइली स्पाट संक्रमित सभी शाखों को काट देना चाहिए।
  • संक्रमित भाग के 2 इंच नीचे तक छँटाई करें तथा तनों पर बने सभी कैंकर को गहराई से छिल कर निकाल देना चाहिए। छँटाई के बाद 10 प्रतिशत बोर्डो पेस्ट को कटे हुऐ भाग पर लगायें।
  • बारिश के समय में छँटाई के बाद तेल युक्त कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (500 ग्राम कॉपर ऑक्सीक्लोराइड + 1 लीटर अलसी का तेल) का उपयोग करें।
  • अतिसंक्रमित पौधों को जड़ से उखाड़ कर जला दें और उनकी जगह नये स्वस्थ पौधों का रोपण करें या संक्रमित पौधों को जमीन से 2-3 इंच छोड़कर काट दें तथा उसके बाद आए फुटानों को प्रबंधित करें।
  • रोगमुक्त बगीचे में सिथिल अवस्था के बाद जरूरत के अनुसार छँटाई करें।
  • छँटाई के तुरन्त बाद बोर्डो मिश्रण (1प्रतिशत) का छिड़काव करें।
  • रेस्ट पीरियड के बाद पौधों से पत्तों को गिराने के लिए इथरैल (39 प्रतिशत एस.सी.) 2-2.5 मि.ली./ली. की दर से मृदा में नमी के आधार पर उपयोग करें।
  • ब्लीचिंग पावडर के घोल (25 कि.ग्रा./ 1000 लीटर/हेक्टेयर) से पौधे के नीचे की मृदा को तर कर दें।

बहार नियंत्रण :
अनार में वर्ष मे तीन बार जून-जुलाई (मृग बहार), सितम्बर-अक्टूबर (हस्त बहार) एवं जनवरी-फरवरी (अम्बे बहार) में फूल आते हैं। व्यवसायिक रूप से केवल एक बार की फसल ली जाती है। और इसका निर्धारण पानी की उपलब्धता एवं बाजार की मांग के अनुसार किया जाता है। जिन क्षेत्रों मे सिंचाई की सुविधा नही होती है,वहाँ मृग बहार से फल लिये जाते हैं। तथा जिन क्षेत्रों में सिचाई की सुविधा होती है वहॉ फल अम्बें बहार से लिए जाते हैं। बहार नियंत्रण के लिए जिस बहार से फल लेने हो उसके फूल आने से 45 दिन पूर्व सिचाई बन्द कर देनी चाहिये।

फर्टिगेशन:
  • जब पौधों पर पुष्प आना शुरू हो जाएं तो उसमें नत्रजन: फॉस्फोरस: पोटाश: 12:61:00 को 3 किलो/एकड़ की दर से एक दिन के अन्तराल पर एक महीने तक दें।
  • जब पौधों में फल लगने शुरू हो जाएं तो नत्रजन: फॉस्फोरस: पोटाश: 19:19:19 को ड्रिप की सहायता से 3 कि.ग्रा./एकड़ की दर से एक दिन के अंतराल पर एक महीने तक दें।
  • जब पौधों पर शत प्रतिशत फल आ जाएं तो नत्रजन: फॉस्फोरस: पोटाश: 00:52:34 उर्वरक 2.5 किलो/एकड़ की मात्रा को एक दिन के अन्तराल पर एक महीने तक दें।
  • फल की तुड़ाई के एक महीने पहले कैल्शियम नाइट्रेट की 5 किलो ग्राम/एकड़ की मात्रा ड्रिप की सहायता से 15 दिनों के अंतराल पर दो बार दें।

तुड़ाई :
अनार नान-क्लामेट्रिक फल है जब फल पूर्ण रूप से पक जाये तभी पौंधे से तोडऩा चाहिए। पौधों में फल सेट होने के बाद 120-130 दिन बाद तुड़ाई के तैयार हो जाते हैं। पके फल पीलापन लिए लाल हो जाते हैं।
उपज :
पौधे रोपण के 2-3 वर्ष पश्चात फलना प्रारम्भ कर देते हैं। अच्छी तरह से विकसित पौधा 60-80 फल प्रति वर्ष 25-30 वर्षो तक देता है।

  • एस. के. त्यागी
    email : suniltyagikvk75@gmail.com
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