रेशम एवं रेशम कीट पालन

Silkwormरेशम एक प्रकार का महीन चमकीला और दृढ़ तंतु या रेशा है जिससे कपड़े बुने जाते हैं। यह तंतु कोश में रहने वाले एक प्रकार के कीड़े तैयार करते हैं। कच्चा रेशम बनाने के लिए रेशम के कीटों का पालन सेरीकल्चर या रेशम कीट पालन कहलाता है। रेशम उद्योग भारत के एक प्रमुख कुटीर उद्योगों में से एक है। इसके अंतर्गत रेशम के कीड़े पालने के लिए शहतूत, गूलर, पलाश आदि के वृक्ष लगाना, कीड़े पालना, रेशम को साफ करना, सूत बनाना, कपड़ा बनाना आदि का कार्य शामिल है। रेशम उत्पादन का आशय बड़ी मात्रा में रेशम प्राप्त करने के लिए उत्पादक जीवों का पालन करना होता है। यह कृषि पर आधारित एक कुटीर उद्योग है। इसे बहुत कम कीमत पर ग्रामीण क्षेत्र में ही लगाया जा सकता है। कृषि कार्यों और अन्य घरेलू कार्यों के साथ इसे अपनाया जा सकता है। यह उद्योग पर्यावरण के लिए मित्रवत है। भारत रेशम का बड़ा उपभोक्ता देश होने के साथ-साथ पांच किस्म के रेशम- मलबरी, टसर, ओक टसर, एरि और मूंगा सिल्क का उत्पादन करने वाला अकेला देश है। मूंगा रेशम के उत्पादन में भारत का एकाधिकार है। यह कृषि क्षेत्र की एकमात्र नकदी फसल है, जो 30 दिन के भीतर प्रतिफल प्रदान करती है। रेशम का मूल्य बहुत अधिक होता है और इसके उत्पादन की मात्रा बहुत ही कम होती है। रेशम के कीड़े का कुल जीवन काल 50 दिन का होता है। लार्वा अवधि के पश्चात रेशम का कीड़ा मुंह से रेशम निकालता है और पाड़ बांधने पर कुकून बनाता है। कुकून को गर्म पानी में पकाकर कुकून से रेशम को अलग किया जाता है। शहतूत पेड़ की पत्तियां रेशम के कीड़ों का मुख्य भोजन होती है। शहतूत में यह पत्तियां एक निश्चित अनुपात में निरंतर उगती रहती हैं अत: कीड़ों के लिए भोजन की कोई समस्या नहीं रहती है। शहतूत के पौधों की खासियत यही है कि इन्हें कहीं भी लगाया जा सकता है।

रेशम उद्योग की विशेषताएं

  • कृषि पर आधारित कुटीर उद्योग है।
  • ग्रामीण क्षेत्र में ही कम लागत में इस उद्योग में शीघ्र उत्पादन प्रारंभ किया जा सकता है।
  • कृषि कार्य एवं अन्य घरेलू कार्यों के साथ-साथ इस उद्योग को अपनाया जा सकता है। श्रम जनित होने के कारण इस उद्योग में विभिन्न स्तरों पर रोजगार सृजन की भरपूर संभावनाएं निहित है, विशेषकर महिलाओं के खाली समय के सदुप्रयोग के साथ-साथ स्वावलम्बी बनाने में सहायक है।
  • इस उद्योग को सुखोनमुख क्षेत्रों में भी सफलता पूर्वक स्थापित करते हुए नियमित आय प्राप्त की जा सकती है।

रेशम की किस्में
उत्पादन की प्रक्रिया के परिपेक्ष्य में रेशम दो प्रकार का होता है- शहतूती रेशम (मलबरी सिल्क) और गैर शहतूती रेशम (नॉन मलबरी सिल्क)।
शहतूती रेशम : शहतूत (मलबरी) पौधों की पत्ती खा कर रेशम-कृमि (कीड़ा) जो रेशम बनानता है, उसे शहतूती रेशम कहा जाता है। शहतूती की पत्तियां प्राप्ति के लिए शहतूत के पौधों की खेती की जाती है। इस विधि में कृमि (कीड़ा) पालन घर के अन्दर किया जाता है।
गैर शहतूती रेशम : इसके अंतर्गत तसर (कोसा) तथा मूंगा और एरी (अरंडी) रेशम आते हैं।
तसर (कोसा) रेशम : इस कृमि के खाद्य वृक्ष साल, अर्जुन इत्यादि है। इन वृक्षों की पत्तियां खाकर रेशम कृमि जो रेशम बनाता है, वह तसर या कोसा रेशम कहलाता है। इस विधि में कृमि पालन खुले आकाश में किया जाता है।
ओक तसर रेशम : यह बीज आदि पौधों की पत्तियों पर आधारित है।
मूंगा रेशम : इस रेशम के कृमि के खाद्य वृक्ष सोम तथा सोलू है।
एरी या अरंडी रेशम : इस रेशम के कृमि का पालन अरंडी के पौधों पर किया जाता है।
रेशम कीटपालन
रेशम कीटपालन हेतु एक अलग गृह की आवश्यकता होती है। कीट पालन गृह में समुचित स्थानों पर खिड़कियां भी आवश्यक है कि कीटपालन गृह को विशुद्धीकरण हेतु एयरटाइट किया जा सके। प्रथम वर्ष में स्थापित शहतूत वृक्षारोपण में समुचित देखभाल में द्वितीय वर्ष में शहतूत पत्ती का उत्पादन समुचित मात्रा में हो जाता है। प्रदेश में विभिन्न स्थानों/ प्रक्षेत्रों में तापमान आद्र्रता को ध्यान में रखते हुए रेशम कीटपालन वर्ष में चार-पांच बार ही किया जा सकता है। एक बार का कीटपालन एक फसल कहलाता है। प्रत्येक कीटपालन फसल से पूर्व सभी कीटपालन उपकरण एवं कीटपालन गृह की अच्छी तरह सफाई धुलाई करते हुए फार्मलीन से विशुद्धीकरण किया जाता है। इसके अतिरिक्त कीटपालन उपकरणों को ब्लीचिंग पाउडर का प्रयोग कीटपालन गृह के आस-पास शहतूत वृक्षारोपण में विशुद्धीकरण के रूप में भी किया जाता है। रोगरहित रेशम कीटाण्डों को कीटपालन गृह में ट्रे में एक पतली तह के रूप में रखा जाता है। गृह में तापमान 25 डिग्री सेंटीग्रेड एवं आद्र्रता लगभग 80-90 सुनिश्चित की जाती है। आर्द्रता सुनिश्चित करते हुए पैराफिन पेपर एवं फोम पैड का प्रयोग किया जाता है। कीटाण्डों में जब पिन हेड स्टेज आती है, तो कीटाण्डों को अंधेरे में रखा जाता है। प्रस्फुटन की सम्भावित तिथि को प्रात:काल में कीटाण्डों को प्रकाश में रखा जाता है। जिसमें लगभग 90-95 प्रतिशत कीटाण्डों में प्रस्फुटन हो जाता है। कीटाण्डों में प्रस्फुटित लार्वो को अधिक समय तक भूखा नहीं रखा जाना चाहिए। लार्वा को शहतूत की मुलायम पत्तियां छोटे आकार (0.5 सेंटीमीटर से लेकर 1 सेंटीमीटर तक) की काटकर डाली जाती है। सभी लार्वा पत्तियों पर चड़ जाते हैं। 10-15 मिनट के पश्चात रेशम कीटों को एक मुलायम पंख से धीरे-धीरे कीटपालन ट्रे में पत्तियों के साथ झाड़ देते हैं एवं कीटपालन बेड तैयार कर लेते हैं। पत्तियों को सूखने के बचाने के लिए एवं कीटपालन बेड में आवश्यक आद्र्रता सुनिश्चित करने हेतु फोम पैड लगाते हुए कीटपालन ट्रे को पैराफिन पेपर से ढंक दिया जाता है। रेशम कीटपालन के समय कीटपालन बेड की सफाई आवश्यक है, क्योंकि उसमें रेशम, कीटों का मल एवं पुरानी बची हुई पत्तियां होती हैं।

प्रथम अवस्था में मोल्ट से एक दिन पूर्व मात्र एक सफाई की जाती है। द्वितीय अवस्था में दो सफाई की जाती है। पहली मोल्ट खुलने के बाद फीडिंग देने के बाद एवं दूसरी मोल्ट से एक दिन पूर्व सफाई की जाती है। द्वितीय अवस्था में दो सफाई की जाती है। 0.5-0.5 आकार वाली नेट को कीटपालन बेड के ऊपर डालते हुए ताजी शहतूत की पत्तियां नेट के ऊपर डाली जाती है। रेशम कीट नेट के छिद्रों से रेंगकर ताजी पत्तियों के ऊपर चढ़ जाते हैं। करीब आधा घंटे बाद नेट को कीटों सहित दूसरे कीटपालन ट्रे में स्थानांतरित कर दिया जाता है एवं बची हुई पत्तियों एवं रेशम कीट के मल (एक्सक्रीटा) को खेत में गड्ढा बनाकर दबा दिया जाता है।

मोल्ट एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें रेशम कीट अपने शरीर की त्वचा को बदलते हैं। इस प्रक्रिया में रेशम कीट पत्ती नहीं खाते हैं। रेशम कीटों में लार्वा की 5 अवस्था में 4 मोल्ट होते हैं। जब रेशम कीट मोल्ट में जाने की तैयारी करते हैं, तो कीटपालन बेड से फोम पेड एवं पैराफिन पेपर हटा दिया जाता है। इस अवस्था में कीटों को छोटी आकार की पत्तियां दी जाती है। मोल्ट के प्रारंभ से लेकर मोल्ट की समाप्ति तक सावधानी से सभी रेशमकीटों में समान विकास होता है। मोल्ट के प्रारंभ से लेकर मोल्ट की समाप्ति तक सावधानी से सभी रेशमकीटों में समान विकास होता है। मोल्ट के समय कीटपालन बेड पतला एवं सूखा होना चाहिए एवं गृह में हवा का आवागमन सुचारू होना चाहिए। मोल्ट की अवस्था में अधिक आद्र्रता रेशम कीट हेतु नुकसानदायक होती है। रेशम कीटों की तृतीय, चतुर्थ एवं पंचम अवस्था को उत्तरावस्था कीटपालन कहा जाता है। तापक्रम एवं आद्र्रता की आवश्यकता बढ़ती अवस्था के साथ होती जाती है। तृतीय एवं चतुर्थ अवस्था में कुछ बड़ी पत्तियां एवं पंचम अवस्था में पूर्ण पत्तियां रेशम कीट को दी जानी चाहिए। अधिक पुरानी एवं पीली पत्तियां रेशम कीटों को नहीं खिलाई जानी चाहिए। अंतिम अवस्था में जब रेशम कीट पूर्ण रूप से विकसित हो जाते हैं, तो वे पत्ती खाना बन्द कर देते हैं। ये कीट रेशम कोया निर्माण हेतु तैयार होते हैं। इस अवस्था में रेशम कीटों का शरीर थोड़ा पारदर्शी हो जाता है एवं कीट अपने सिर को ऊपर कर स्थान की तलाश करता है। इस अवस्था में रेशम कीटों को चुनकर माउण्टेज (चन्द्राकी) में रखा जाता है। परिपक्व रेशम कीटों को माउण्टेज में स्थानांतरित करने में विलम्ब से रेशम कीट रेशम की क्षति कर देते हैं। माउण्टेज में कीट रखने के पश्चात 48 से 72 घंटे में रेशमकीट कोया निर्माण कर लेते हैं, परन्तु इस अवस्था में कोयों को नहीं तोडऩा चाहिए, क्योंकि कीट अत्यंत नाजुक एवं मुलायम होते हैं। कोयों को माउण्ट करने की तिथि से पांचवे-छठवें दिन तोड़ा जाना चाहिए, जब रेशम कोयों के अन्दर प्यूपा का निर्माण हो जाये। माउण्टेज (चन्द्राकी) में रेशम कोयों को तोडऩे से पूर्व मरे हुए कीटों, खराब कोयों को पहले निकाल देते हैं एवं अच्छे कोयों को ग्रेड कर छांट लेते हैं।
रेशम उत्पादन के फायदे

  • रोजगार की पर्याप्त क्षमता
  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार
  • कम समय में अधिक आय
  • महिलाओं के अनुकूल व्यवसाय
  • समाज के कमजोर वर्ग के लिए आदर्श कार्यक्रम

 

  • विष्णु के सोलंकी
  • अमित सेन
  • विजय उपाध्याय
    email : drvishnu@hotmail.com

www.krishakjagat.org

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