आधे-अधूरे सदस्यों की गैर मौजूदगी में हुई राज्य कृषक सलाहकार मण्डल की रस्मी बैठक

म.प्र. में किसानों की आय पांच वर्षों में दोगुना करने के लिए मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान नित नई घोषणाएं करते हैं, उपाय खोजते हैं परन्तु उनकी घोषणाओं और क्रियान्वयन के बीच कच्छप गति आड़े आ जाती है। इसकी बानगी देखिए, राज्य कृषक सलाहकार मण्डल का गठन। मुख्यमंत्री ने 31 जनवरी 2016 को खेती को लाभ का धंधा बनाने, कृषि सम्बन्धी नीति पर सुझाव देने तथा विस्तार के लिए राज्य कृषक सलाहकार मण्डल का गठन करने की घोषणा की थी। इसके पूरे एक साल के बाद 20 जनवरी 2017 को राज्य कृषक सलाहकार मण्डल के गठन का आदेश हुआ। इसके बाद भी सरकार में किसी ने भी किसानों की सुध नहीं ली।
प्याज के गिरते दामों पर किसानों का उग्र आंदोलन, इसके बाद भावांतर के उठते बवंडर ने सरकार की चूलें हिला दी। तब सरकार होश में आई और किसानों को मनाने का प्रयास प्रारंभ हुआ। इसी कड़ी में लगभग 11 माह पूर्व गठन किये गये सलाहकार मण्डल की सरकार को याद आई और आनन-फानन में गत 27 नवम्बर को बैठक बुला ली गई, जबकि राज्य कृषक सलाहकार मण्डल की बैठक प्रत्येक तीन माह में होनी चाहिए थी। इस प्रकार देखें तो अब तक तीन बैठकें हो जानी चाहिए थी और उनके सुझाव अनुसार योजनाओं का क्रियान्वयन होना चाहिए था। अगर ऐसा होता तो शायद प्रदेश किसानों के गुस्से का शिकार होने से बच जाता और किसानों को भी उनकी उपज का उचित दाम मिल पाता। गत दिनों बैठक भी हुई वह भी आधी-अधूरी। क्योंकि 51 जिलों में से 22 जिलों के सदस्य अनुपस्थित रहे। इसके अलावा उद्यानिकी विभाग को छोड़कर कृषि से सम्बद्ध अन्य विभागों के अधिकारियों ने भी भाग नहीं लिया। इससे जाहिर होता है कि मुख्यमंत्री की घोषणाओं के प्रति तथा कृषक हितैषी योजनाओं के प्रति क्रियान्वयन की गति कितनी तेज है तथा सरकार कितनी गम्भीर है।

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