ग्वालियर की चना, मसूर एवं तोरिया की चार किस्में प्रदेश के लिए अनुशंसित

ग्वालियर। राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय, ग्वालियर द्वारा विकसित चना, मसूर एवं तोरिया फसलों की 4 किस्मों को मध्यप्रदेश के लिये विमोचित करने की अनुशंसा की गई है। प्रमुख सचिव, मध्यप्रदेश शासन, किसान कल्याण तथा कृषि विभाग, मंत्रालय, भोपाल की अध्यक्षता में संपन्न राज्य बीज उपसमिति की बैठक में चना (काबुली) किस्म राज विजय काबुली चना-111, चना (काबुली) किस्म राज विजय काबुली चना-151, मसूर किस्म राज विजय मसूर -13-7 तथा तोरिया किस्म राज विजय तोरिया-3 को प्रदेश के किसानों के लिये जारी किया गया है।

संचालक अनुसंधान सेवायें डॉ. बी.एस. बघेल ने बताया कि किस्म राज विजय काबुली चना-111 की परिपक्वता- अवधि 117 दिवस (मध्यम अवधि), औसत उपज 2000-2200 कि.ग्रा./हे. है। यह रोग व्याधि-उकठा प्रतिरोधी रोगी, कीट व्याधि और फली छेदक कीट के प्रति सहनशील, अद्र्ध सिंचित एवं सिंचित क्षेत्र के लिए उपयुक्त है। इस प्रजाति का दाना मध्यम बड़ा होता है, जिसमें प्रोटीन प्रतिशत 18.50 प्रतिशत है। यह किस्म बेकरी के लिए उत्तम है।
काबुली चने की दूसरी किस्म राज विजय काबुली चना-151 की परिपक्वता- अवधि 113 दिवस (मध्यम अवधि), औसत उपज- 1850-2100 कि.ग्रा./हे. है। यह रोग व्याधि- उकठा प्रतिरोधी रोगी, कीट व्याधि- फली छेदक कीट के प्रति सहनशील, अद्र्ध सिंचित एवं सिंचित क्षेत्र के लिए उपयुक्त है। इस प्रजाति का दाना अति बड़ा होने के साथ प्रोटीन प्रतिशत 19.10 है। यह किस्म निर्यात के लिए उपयुक्त होने से प्रदेश के कृषकों की आय बढ़ाने में उपयोगी सिद्ध होगी। इन किस्मों का विकास कृषि महाविद्यालय, सीहोर के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. एम. यासीन द्वारा किया गया है।
अनुशंसित मसूर किस्म राज विजय मसूर -13-7 की परिपक्वता- अवधि 102 दिवस (शीघ्र अवधि), औसत उपज- 1200 कि.ग्रा./हे. है। यह रोग व्याधि- उकठा सहनशील, अद्र्ध सिंचित (आवश्यकता पडऩे पर 35 से 40 दिवस पर एक सिंचाई) के लिए उपयुक्त है। यह प्रजाति उकठा सहनशील होने से उकठा से ग्रसित मसूर की अन्य प्रजाति के विकल्प के रूप में तथा अंतरवर्तीय प्रणाली के लिये उपयोगी सिद्ध होगी। इस किस्म का विकास कृषि महाविद्यालय सीहोर के वैज्ञानिक डॉ. अशोक सक्सेना द्वारा किया गया है।
प्रो. बघेल ने बताया कि तोरिया किस्म राज विजय तोरिया-3/की परिपक्वता- अवधि 93-99 दिवस (मध्यम अवधि), औसत उपज- 1351-1432 कि.ग्रा./हे. है। दाने में तेल का प्रतिशत 41.30 प्रतिशत है। यह रोग व्याधि- श्वेत कीट, पत्ती एवं फल्ली झुलसन, मृदुरोमिल आसिता, भभूतिया एवं तना सडऩ रोगों के प्रति उच्च स्तर की प्रतिरोधी है।
इस पर कीट व्याधि- माहू का असर कम होता है तथा यह सिंचित एवं अद्र्ध सिंचित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। यह प्रजाति सूखा सहनशील होने से खरीफ में अंतरवर्तीय प्रणाली के लिए उपयुक्त है। एवं प्रदेश की कृषि आकस्मिक कार्य योजना में एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हुये प्रदेश की फसल सघनता बढ़ाने में उपयोगी सिद्ध होगी। इस किस्म का विकास आंचलिक कृषि अनुसंधान, मुरैना के वैज्ञानिक डॉ. वी.के. तिवारी द्वारा किया गया है।

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