रबी के लिए वरदान कुसुम

भूमि – कुसुम के अच्छे उत्पादन के लिये मिट्टी का चयन बहुत ही महत्वपूर्ण है, इसकी जड़े जमीन में अन्य फसल की तुलना में गहराई तक जाती है इसलिये कुसुम के लिये मध्यम काली भूमि, भारी काली भूमि एवं गहरी काली भूमि ज्यादा उपयुक्त है।
किस्में– मुख्यत: दो प्रकार की होती हैं-
1. ओलिक, 2. लिओनिक
ओलिक – आईएसएफ-1, आईएसएफ-2,आईएसएफ-3
लिओनिक -एसएसएफ 708, परभनी, नारी 52, नारी 57, भीमा इत्यादि
बीजोपचार– फसल बुवाई पूर्व बीज उपचार करना चाहिए।
बीजों को 2 ग्राम थायरम तथा 1 ग्राम बाविस्टीन के मिश्रण से 1 कि.ग्रा. बीज के हिसाब से उपचारित करें।

प्रत्येक फसल की अपनी एक विशिष्ट पहचान होती है जिससे वह किसानों के मन में स्थान बनाकर धीरे-धीरे लोकप्रिय होने लगता है आज के युग में किसान भाई भी अपने उत्पादन में वृद्धि के साथ लागत में नियंत्रण पर भी विशेष ध्यान दे रहे हैं क्योंकि किसान के आमदनी का 80 प्रतिशत हिस्सा उसके लागत में निकल जाता है लागत नियंत्रण और बेहतर उत्पादन की बात की जाये तो कुसुम की रबी फसल में एक अलग ही पहचान है।

बुवाई समय– खरीफ फसल जैसे सोयाबीन, उड़द, मूंग, मक्का आदि के कटाई पश्चात कुसुम की बुआई की जानी चाहिये।
शीघ्र पकने वाले धान में कुसुम/ की खेती की जा सकती है। 15 नवम्बर तक बुवाई का समय उपयुक्त है। समयानुसार 30 नवम्बर तक भी बुवाई कर सकते हैं।
बीज की मात्रा – 4 से 6 किग्रा. प्रति एकड़ से बुवाई करें। ध्यान रहे दो पौधों के बीच की दूरी 8 से 10 इंच होनी चाहिए।
बुवाई विधि – कुसुम/ को सीड ड्रिल से एवं छिड़काव पद्धति से बुवाई कर सकते है। सीड से बुवाई करते समय ध्यान रहे बीज की गहराई 3 से 5 से.मी. से अधिक नहीं होनी चाहिए।
खाद- सिंचित भूमि में यूरिया 52 कि.ग्रा., एसएसपी 100 कि.ग्रा. एवं 20 कि.ग्रा. पोटेशियम प्रति एकड़ से दें तथा असिंचित में 17 से 26 कि.ग्रा. यूरिया, 38 से 50 कि.ग्रा. एसएसपी एवं 7 से 10 कि.ग्रा. पोटेशियम क्लोराइड देनी चाहिए। असिंचित अवस्था में उर्वरक की संपूर्ण मात्रा बोनी के समय दे तथा सिंचित में आधी यूरिया प्रथम सिंचाई पर दे।
सिंचाई-कुसुम में प्रथम सिंचाई बीज अंकुरण के लिए
दूसरी सिंचाई बुवाई के 30 से 35 दिन पश्चात्।
तीसरी सिंचाई से 60 से 65 दिन में सिंचाई में स्प्रिन्कलर का प्रयोग करें।
निंदाई – गुड़ाई – निंदाई गुड़ाई की प्रक्रिया बुवाई के 15 से 20 दिन पश्चात करें इसके साथ-साथ थिनिंग करें। थिंनिंग से तात्पर्य एक जगह में एक ही पौधा रखे। यह कार्य सावधानीपूर्वक होनी चाहिए।
कीट नियंत्रण – अन्य फसलों के तुलना में कुसुम/ में कीट कम आता है फिर भी सामान्यत: देखने को मिलता है वह निम्न है-
माहो इसे मैनी के नाम से जाना जाता है। इसके लिए रोगर (डाईमिथियेट) 30 एम.एल. प्रति स्प्रेयर से छिड़काव करें। यह रोग प्राय: किसी एक किनारे से लगता है इसलिये लक्षण दिखते ही किनारे में दवाई स्प्रे कर देने से रोग वहीं नष्ट हो जाता है।
चबाने वाली इल्ली- इसके लिए क्विनालफॉस 25 ए.एफ.प्रति स्प्रेयर से छिड़काव करें।
फसल कटाई- कुसुम फसल लगभग 135-140 दिन में काटने योग्य हो जाते है। आकलन करने के लिये किसान एक फल तोड़कर उसे जूता से रगड़ कर देखें यदि 80 प्रतिशत दाना बाहर आ जाता है तो फसल का हार्वेस्टिंग कराये। इसी प्रकार यदि अनुकूल वातावरण में कुसुम की खेती करे तो प्रति एकड़ असिंचित में 4 से 5 क्विंटल एवं सिंचित खेती में 6 से 8 क्विं. प्रति एकड़ उपज प्राप्त किया जा सकता है।

                                      मुख्य बातें
1. बुवाई समय पर करें तथा असिंचित अवस्था में पर्याप्त नमी रहने पर ही बुवाई करें।
2. सिंचित में स्प्रिंकलर का प्रयोग करें या ध्यान रहे खुला पानी देने की स्थिति में पानी जमने न दें।
3. पथरीली एवं मुरम वाले भूमि पर खेती न करें।
4. जिस भूमि पर लगातार चना बुवाई कर रहे हैं वह पर फसल चक्र की दृष्टि से कुसुम बुवाई कर सकते हैं।
5. य्दि किसी भूमि पर अधिक खरपतवार होता है तो पहले खरपतवारनाशक का प्रयोग करें तत्पश्चात बुवाई करें। क्योंकि कुसुम फसल में खरपतवारनाशक का प्रयोग अंकुरण पश्चात नहीं कर सकते।
  • गिरधर वैष्णव
    मो. : 9907421089

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