गेंदा लगायें बहार लायें

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वर्तमान में इसका उपयोग सूत्रकृमि एवं इल्लियों के रोकथाम के लिये रक्षक फसल के रूप में भी किया जाने लगा है खासतौर पर टमाटर, बैगन , मिर्च आदि फसलों में इसे मिश्रित तौर पर अंतरवर्तीय फसलों या बार्डर फसलों के रूप मे उगाया जाता है। गेंदा एक ऐसा पुष्पीय फसल है जिसमे कीट व रोगों का प्रकोप कम होता है एवं इसे आसानी से उगाया जा सकता है इसलिये व्यावसायिक दृष्टि से भी इसकी खेती करना बड़ा लाभदायक सिद्ध हो सकता है।
आर्थिक लाभ : गेंदे की खेती में भूमि की तैयारी से लेकर फूलो को बेचने तक लगभग 45000-50000 रूपये तक प्रति हेक्टेयर खर्च आता है एवं प्रति हेक्टेयर उत्पादन से लगभग 100000-150000 तक आय प्राप्त होती है अत: प्रति हेक्टेयर लगभग 60000-100000 तक शुद्ध लाभ मिल जाता है।

मौसमी पुष्पों मे गेंदे का विशेष एवं महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि इसके फूल वर्ष भर मिलते रहते हैं। इसके फूल विभिन्न रंगों व आकारों में आते हैं  व वर्ष भर खेती की जा सकने के कारण इससे नियमित रूप से आय प्राप्त होते रहती है। फूलों के साथ-साथ इसके तने व पत्तियों से उपयोगी तेल निकाला जाता है, जिससे सुगंधित पदार्थ, कीटनाशक आदि बनाये जाते हैं।

भूमि एवं भूमि की तैयारी:- जलनिकास युक्त बलुई दोमट मिट्टी सर्वोत्तम होती है। भूमि की तैयारी के लिये भूमि को अच्छी तरह 3-4 जुताई करके पाटे की सहायता से समतल एवं भुरभुरी बना लेना चाहिये।
अफ्रीकन गेंदा:- इस प्रजाति के पौधे ऊँचे होते हैं जो लगभग 2 मी. तक लंबे होते हैं। इनके फूल आकार में बड़े एवं अनेक रंगो के होते हैं ।
प्रमुख किस्में:- क्रेकर जैक, क्लाइमेक्स, ग़ोल्डन एज़, क्राउन ऑफ गोल्ड, अफ्रीकन जायंट, डबल नारंगी, अफ्रीकन जायंट डबल पीला, पूसा नारंगी, गोल्डन जुबली, अलास्का, फस्र्ट लेडी, गोल्ड लेडी, ऑरेंज लेडी आदि।
फ्रेंच गेंदा:- इस प्रजाति के पौधे बौने होते हैं जो लगभग 20-40 से.मी. तक लंबे होते हैं। इनके फूल आकार में छोटे एवं अनेक रंगों के होते हैं ।
प्रमुख किस्में:- सनराईज, पूसा बसंती, रस्टी रेड, जिप्सी, रेड हेड, बटर स्कॉच, फायरग्लो, वेलेन्सिया, रेड ब्रोकेड, टेंजेरिन आदि।
नर्सरी बुवाई एवं रोपाई:– गेंदे की नर्सरी के लिये भूमि से 15-20 से.मी. ऊॅंची क्यारियॉं तैयार करनी चाहिये। क्यारियों का आकार 3&1 मी. रखना चाहिये। बीज बुवाई से पहले क्यारियों को 0.2 प्रतिशत बाविस्टीन से उपचारित करें ताकि पौध मे फफूंदजनित रोग ना लगे। भूमि को 30 से.मी. गहराई तक खोदकर भुरभुरा एवं समतल बना लें एवं सड़ी गोबर खाद फैलाकर मिट्टी में मिला दें। बीजों को कतारों मे बोकर ऊपर से खाद एवं मिट्टी के मिश्रण से बीजों को ढंककर फव्वारे से हल्की सिंचाई कर दें।
बीज दर:- सामान्य किस्मों में 1-1.5 कि.ग्रा. एवं संकर किस्मों में 700-800 ग्राम बीज/हेक्टेयर के लिये पर्याप्त होता है।
पौध रोपण एवं दूरी:- जब पौधा 10-15 से.मी. एवं 3-4 पत्तियों का हो जाये तब मुख्य खेत में शाम के समय पौधे का रोपाई करना चाहिये। सामान्यत: 25-30 दिन में पौधा रोपाई के लायक हो जाता है। रोपाई के बाद जड़ों के चारो तरफ की मिट्टी को दबा दें एवं हल्की सिंचाई कर दें।
अफ्रीकन गेंदा को 45&45 से.मी. एवं फ्रेंच गेंदे को 25&25 से.मी. पौधे से पौधे एवं कतार से कतार की दूरी पर रोपाई करना चाहिये। एक हेक्टेयर मे रोपाई करने के लिये अफ्रीकन गेंदें मे 50000-60000 एवं फें्रच गेंदे मे 1.5-2.0 लाख पौधे की आवश्यकता होती है।
खाद एवं उर्वरक:- भूमि की अंतिम जुताई के समय 15-20 टन अच्छी सड़ी हुई गोबर खाद या कंपोस्ट खाद भूमि में मिला दें। 6 बोरी यूरिया, 10 बोरी सिंगल सुपर फॉस्फेट एवं 3 बोरी म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति हेक्टेयर पर्याप्त रहता है। यूरिया को तीन बराबर भागों मे बांटकर एक भाग एवं सिंगल सुपर फॉस्फेट व पोटाश की संपूर्ण मात्रा को रोपाई के समय देना चाहिये तथा यूरिया की दूसरी व तीसरी मात्रा को रोपाई के 30 दिन एवं 45 दिन बाद पौधो के आसपास कतारों के बीच मे देना चाहिये।
सिंचाई:- सामान्यत: 10-15 दिन के अंतराल पर सिंचाई करते रहना चाहिये। आवश्यकता से अधिक पानी देने से फसल को नुकसान होता है। यदि वर्षा के कारण खेत में पानी भर जाये तो जल निकास की व्यवस्था करनी चाहिये।

 बुवाई, रोपाई का समय एवं उपज:-    
फसल नर्सरी की बुवाई का समय  पौध रोपण का समय उपज (क्विंटल / हे.)
ग्रीष्मकालीन जनवरी-फरवरी फरवरी-मार्च 100-200
वर्षाकालीन मई-जून जून-जुलाई 200-225
शरदकालीन सितम्बर-अक्टूबर अक्टूबर-नवंबर 175-200

निंदाई-गुड़ाई:– गेंदे की खेती मे कम से कम दो निंदाई-गुड़ाई करनी चाहिये। पहली गुड़ाई पौध रोपाई के 25 एवं दूसरी 45 दिन बाद करनी चाहिये।
शीर्ष कर्तन:– पौधों में अधिक शाखाएं एवं फूल प्राप्त करने के लिये पौध की बढ़वार स्थिति में पौध रोपाई के 40 दिन बाद आवश्यक कृषि क्रियाओं में शीर्ष कलिका को तोडऩा चाहिये।
फूलों की तुड़ाई एवं पैकिंग:- फूलों की तुड़ाई सुबह या शाम के समय ही करनी चाहिये। ऐसे फूल जो पूरी तरह खिले हो उनको हाथ या कैंची की सहायता से तोडऩा चाहिये। सामान्यत: पौध रोपाई के लगभग 60-70 दिन बाद फूल तोडऩे लायक हो जाते हैं । तुड़ाई का कार्य नियमित रूप से करना चाहिये। तुड़ाई के तुरंत बाद फूलों को बांस के टोकरियों, पालीथिन के लिफाफे या थैलियों मे अच्छी तरह से पैक करके तुरंत बाजार भेजना चाहिये ताकि फूल मुरझाये नहीं एवं पेैकिंग पर थोड़ा-थोड़ा पानी छिड़कते रहें।

  • सीताराम देवांगन
  • घनश्याम दास साहू  मो.: 9826266601
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