सूरजमुखी लगायें

तिलहनी फसलों में सूरजमुखी का प्रमुख स्थान है। इसकी व्यवसायिक खेती का श्री गणेश जुलाई 1969 में गोव.पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक वि.वि. में हुआ था। बाद में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की प्रेरणा से सन् 1960-70 के रबी मौसम में अ.भा. स्तर पर इस फसल का परीक्षण प्रारंभ किया गया। इस फसल को सभी मौसमों की फसल की संज्ञा दी जाती है। पुष्पन अवस्था में यह फसल खेती के अधीन सारे क्षेत्र को दर्शनीय एवं आकर्षक बना देती है एवं परिपक्व होने पर यह उच्चकोटि का खाद्य तेल प्रदान करती है।

भूमि
सूरजमुखी को विभिन्न प्रकार की मृदाओं में उगाया जा सकता है। सूरजमुखी के पौधे सिंचित रेतीली मृदाओं से लेकर उच्च नमी अंश बनाए रखने वाली मटियार मृदाओं तक और हल्की अम्लीय से लेकर 8.5 पी.एच.मान. वालीर मृदाओं तक विविध प्रकार की मृदाओं में अच्छे पनपते हैं। अच्छे परिणाम प्राप्त करने हेतु यह नितान्त आवश्यक है कि बोआई हेतु गहरी, उर्वर एवं उदासीन अभिक्रिया वालीन मृदाओं को प्राथमिकता दी जाए। बरसात में जल निकास की समुचित व्यवस्थाएं अनिवार्य है। सूरजमुखी अस्थायी सूखे की दशाओं का मुकाबला कर सकती है और इसलिये इसे बारानी क्षेत्रों में भी सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है, तमिलनाडु एवं कर्नाटक की काली कपासीय मृदाओं में सूरजमुखी, मूंगफली से अच्छी उपज देती है।
खेत की तैयारी
हल्की रेतीली मृदाओं 1 या 2 बार 25-30 से.मी.। यही जुताई करनी चाहिए प्रत्येक जुताई के उपरांत पाटा लगाना चाहिए, जबकि मध्यम एवं भारी संरचना वाली मृदाओं में 1 या 2 बार जुताई करनी चाहिए। जुताई के उपरांत समतलीकरण करना चाहिए।
उन्नत किस्में
केबीएसएच-41 (संकर), डी.आर.एल.एच.-1(संकर), के.बी.एस.एच.531 (संकर), के.बी.एस. एच.-44 (संकर)
खाद एवं उर्वरक
सूरजमुखी उत्पादन हेतु मध्यम कोटि की उर्वर मृदाएं अनुकूल होती है। इसके पौधे भूमि से पोटेशियम की भारी मात्राएं ग्रहण करते हैं, परंतु उनकी नाइट्रोजन एवं फास्फोरस संबंधी आवश्यकताएं साधारण होती है। इसके परिपक्व बीजों में पौधों द्वारा अवशोषित फास्फोरिक एसिड का 3/4 भाग होता है। फास्फोरस की कमी से शिरा का विकास नहीं हो पाता है। मृदा में फास्फोरस उपलब्ध होने पर जड़ों का विकास भली-भांति हो जाता है और उससे परिप्कव प्रक्रिया तीव्र गति से हो जाती है। पोटेशियम की कमी के लक्षण सर्वप्रथम पत्तियों के पीले पडऩे के रूप में प्रकट होते है, जिसके बाद संपूर्ण पत्ती में जले जैसे भूरे धब्बे पड़ जाते हैं। ये धब्बे सर्वप्रथम मुख्य शिरा के साथ और बाद में अन्य शिराओं के साथ-साथ फैलते हैं। पोटेशियम की अधिक कमी से बीज खाली रह जाते हैं। प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अंत: बीज की उपज में भारी कमी हो जाती है।
बोआई समय
सूरजमुखी की बुआई जुलाई माह के अंत तक करें।
बीज दर
सूरजमुखी के बीज भार में हल्के (55 से 70 ग्राम प्रति 1000 बीज होते हैं।) 8-10 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होते हैंं।
बीज की गहराई
सूरजमुखी के बीजों का अंकुरण धान्य फसलों की अपेक्षा अधिक देर से होता है, क्योंकि सूरजमुखी के बीजों का छिलका मोटा होता है, जिसके कारण जल का अवशोषण धीमी गति से होता है और अंकुरण भी उपरिभूमिक होता है। इसके अतिरिक्त मृदा की पपड़ी अंकुरण की गति को और अधिक धीमी कर सकती है।
बीजोपचार
बीज को बोने से पूर्व 0.3 प्रति कैप्टान से उपचारित कर लेना चाहिए, ताकि फसल का फफूंदीजनक रोगों से बचाव हो सके।
सिंचाई एवं जल निकास
यद्यपि इस फसल को बारानी क्षेत्रों में उगाया जा सकता है। परंतु सिंचाई का फसल के ऊपर अच्छा प्रभाव पड़ता है। हल्की संरचना वाली मृदाओं में 8-10 के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए, जबकि भारी संरचना वाली मृदाओं में 15-25 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए। सूरजमुखी की फसल की निम्न तीन क्रान्तिक अवस्था से होती है, जिन में सिंचाई निम्नानुसार करनी चाहिए।
कलिका बनने की अवस्था में: इस अवस्था में बीज बोने के 35-40 दिन बाद सिंचाई करनी चाहिए।
फूल खिलने की अवस्था में: यह अवस्था बीज बोने के 55-65 दिन बाद सिंचाई करनी चाहिए।
बीज भरने की अवस्था में
यह अवस्था बीज बोने के 65-80 दिन बाद आती है।
उपरोक्त तीन अवस्थाओं में सिंचाई करनी चाहिए।
शुष्क मौसम में जल निकास की आवश्यकता नहीं होती है, जबकि खरीफ की फसल में जल निकास की ओर पर्याप्त ध्यान देना अनिवार्य है।

  • गंगा शरण सैनी, email : writergssaini@gmail.com

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