मूंगफली का न्यूनतम समर्थन मूल्य रुपये 4890

मूंगफली लगायें

हमारे देश में मूंगफली का कुल उत्पादन 371 लाख मीट्रिक टन और उत्पादकता 14 क्विं. प्रति हेक्टर है। इसकी खेती विश्व में 100 से अधिक देशों में की जाती है। विश्व में मूंगफली का 97 प्रतिशत क्षेत्र व 94 प्रतिशत उत्पादन में विकासशील देशों का योगदान है। मूंगफली के कुल उत्पादन 56 प्रतिशत क्षेत्रफल एशिया से व 40 प्रतिशत अफ्रीका एवं उत्पादन का 68 प्रतिशत एशिया और 25 प्रतिशत अफ्रीका के देशों का योगदान है। विश्व में मूंगफली का क्षेत्रफल और उत्पादन में चीन, भारत, नाइजीरिया, सेनेगल, सूडान, बर्मा और संयुक्त राज्य अमेरिका प्रमुख उत्पादक देश हैं। विश्व में कुल 189 लाख हेक्टेयर क्षेत्र सें 178 लाख टन का उत्पादन इन देशों से प्राप्त होता हैं। भारत विश्व में क्षेत्र और उत्पादन में लगभग 75 लाख हेक्टेयर से लगभग 60 लाख टन उत्पादन के साथ द्वितीय स्थान पर है। क्षेत्र के 70 प्रतिशत से 75 प्रतिशत उत्पादन गुजरात, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और कर्नाटक राज्यों से होता हैं एवं मूंगफली का लगभग 6 प्रतिशत सिंचित क्षेत्र आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और उड़ीसा में रबी मौसम के दौरान उगाई जाती है। बाकी राज्यों में मूंगफली का उत्पादन मुख्य रूप से वर्षा पर निर्भर करती है भारत में मूंगफली का उत्पादन वर्ष 2016-17 में 75.646 लाख टन एवं वर्ष 2015-16 में 67.33 लाख टन की तुलना में 8.32 लाख टन अधिक हुआ। मूंगफली का मुख्य उत्पादन इन गुजरात, राजस्थान, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और तेलंगाना राज्यों से होता है।

भूमि का चयन व तैयारी
मूंगफली की खेती के लिये अच्छे जल निकास वाली, भुरभुरी दोमट व बलुई दोमट भूमि सर्वोत्तम रहती है। पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करने के बाद दो जुताई कल्टीवेटर से करके खेत को पाटा लगाकर समतल कर लेना चाहिए। जमीन में दीमक व विभिन्न प्रकार के कीड़ों से फसल के बचाव हेतु क्विनालफॉस 1.5 प्रतिशत 25 कि.ग्रा. प्रति हेक्टर की दर से अंतिम जुताई के साथ जमीन में मिला देना चाहिए। तथा 2.5 किलोग्राम ट्राइकोडरमा पावडर को 500 किलोग्राम सड़ी हुई गोबर की खाद (बारीक की हुई) में मिलाकर, 8-10 दिन तक छायादार स्थान पर रखकर गीली बोरी के टाट से ढक दें एवं 2 से 3 दिन के अन्तराल पर उलट-फेर करते रहे। बुवाई पूर्व तैयार खाद को एक हेक्टेयर भूमि में मिलाये।
बीज एवं बुवाई
मूंगफली की बुवाई प्राय: मानसून शुरू होने के साथ ही हो जाती है। उत्तर भारत में यह समय सामान्य रूप से 15 जून से 15 जुलाई के मध्य का होता है। कम फैलने वाली किस्मों के लिये बीज की मात्रा 90-100 कि.ग्राम. प्रति हेक्टर एवं फैलने वाली किस्मों के लिये लगभग 80 कि.ग्रा. प्रति हेक्टर उपयोग में लेना चाहिए। बीज की मात्रा बीज के आकार पर भी निर्भर करती हैं, बुवाई हेतु बीज निकालने के लिये स्वस्थ फलियों का चयन करना चाहिए। बोने से 10-15 दिन पहले दाना को फलीयों से अलग कर लेना चाहिए। बीज को बोने से पहले 3 ग्राम थाइरम या 2 ग्राम मेन्कोजेब या कार्बेण्डिजिम दवा प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचारित कर लेना चाहिए। इससे बीजों का अंकुरण अच्छा होता है तथा प्रारम्भिक अवस्था में लगने वाले विभिन्न प्रकार के रोगों जैंसे -गलगट, जड़ गलन से बचाया जा सकता है। दीमक और सफेद लट से बचाव के लिये क्लोरोपायरीफॉस (20 ई.सी.) का 12.50 मि.ली. प्रति किलो बीज का उपचार बुवाई से पहले कर लेना चाहिए। मूंगफली को कतार में बोना चाहिए। गुच्छे वाली / कम फैलने वाली किस्मों के लिये कतार से कतार की दूरी 30 से.मी. तथा फैलने वाली किस्मों के लिये 40-45 से.मी.रखें। पौधों से पौधों की दूरी 10-15 से.मी. रखनी चाहिए। बुवाई हल के पीछे, हाथ से या सीडड्रिल द्वारा की जा सकती है। भूमि की किस्म एवं नमी की मात्रा के अनुसार बीज जमीन में 5-6 से.मी. की गहराई पर बोना चाहिए।
किस्में
अधिक उपज देने वाली किस्में (॥ङ्घङ्क बीज) सामान्य बीजों की अपेक्षा गुणवत्ता एंव उत्पादन में अच्छी पाई जाती है। अधिक उपज देने वाली किस्में या बीज में विभिन्न कीटों एंव बीमारियों के प्रति विशेष सहनशक्ति के साथ अपेक्षाकृत अच्छी गुणवत्ता एवं अधिक उपज देने कि सक्ष्मता होती है और दानों के आकार एवं प्रकार में जल्दी पकने कारण बाजार भाव भी अधिक मिलता है। ये किस्में खाद एवं उर्वरक अधिक दक्षता से उपयोग व ग्रीन हाउस के लिए भी उपयुक्त मानी जाती है।
बुवाई हेतु किस्मों का चयन भूमि के प्रकार तथा बुवाई के समय के अनुसार करना चाहिए। हल्की व दोमट मि़टटी के लिए विस्तारी एवं अद्र्ध- विस्तारी किस्मों का चयन करना चाहिए तथा भारी मिट्टी हेतु गुच्छे वाली किस्मों का चयन करना चाहिए। गुच्छे वाली किस्में जल्दी पकती हैं। प्ररन्तु इनकें बीजों में सुषुप्तावस्था नहीं होती इसलिए बीज खडी फसल में ही उगने लग जाती हैं इससे बचाव के लिए 70 प्रतिशत पकाव के समय फसल की खुदाई करने से बीज अकुंरण से बचाया जा सकता हैं।
विस्तारी किस्में
एच.एन.जी.10, एच.एन.जी.69, राज मूंगफली-3 (आर.जी.559-3),गिरनार-2, राज दुर्गा (आर. जी. 425), दुर्गा (आर. जी. 382), जी.जी.20,राज. मूंगफली -1 (आर.जी. 510)
झुमका किस्में
टी.बी.जी.39, टी.जी. 37 ए, जी.जी.7 (जे. 38), टी.ए.जी. 24, प्रताप राज. मूंगफली (यू.जी. 5), प्रताप मूंगफली-2,
खाद एवं उर्वरक
उर्वरकों का प्रयोग भूमि की किस्म, उसकी उर्वराशक्ति, मूंगफली की किस्म, सिंचाई की सुविधा आदि के अनुसार होता है। मूंगफली दलहन परिवार की तिलहनी फसल होने के नाते इसको सामान्य रूप से नाइट्रोजनधारी उर्वरक की आवश्यकता कम होती, फिर भी हल्की मिट्टी में शुरूआत की बढ़वार के लिये 15-20 किग्रा नाइट्रोजन तथा 50-60 कि.ग्रा. फास्फोरस प्रति हैक्टर के हिसाब से देना लाभप्रद होता है। उर्वरकों की पूरी मात्रा खेत की तैयारी के समय ही भूमि में मिला देना चाहिए। यदि कम्पोस्ट या गोबर की खाद उपलब्ध हो तो उसे बुवाई के 20-25 दिन पहले 5 से 10 टन प्रति हेक्टर खेत मे बिखेर कर अच्छी तरह मिला देनी चाहिए। अधिक उत्पादन के लिए अंतिम जुताई से पूर्व भूमि में 250 कि.ग्रा.जिप्सम प्रति हेक्टर के हिसाब से मिला देना चाहिए। मोटी मूंगफली की प्रजातियों कें लिए 500 कि.ग्रा. प्रति हेक्टर के हिसाब से मिला देना चाहिए।
जिप्सम का रसायनिक नाम कैल्शियम सल्फेट है। साधारणतया महीन जिप्सम (2 मि. मी.) का उपयोग अधिक सफल तथा लाभदायक पाया गया है। जिप्सम गंधक तथा कैल्सियम का अच्छा स्त्रोत है जिसमें 13 प्रतिशत गंधक और 16-19 प्रतिशत कैल्शियम होता है। जिप्सम जल में 0.25 प्रतिशत घुलनशील है। घुलनशील जिप्सम कैल्सियम का सीधा स्त्रोत है। जिप्सम में गंधक व कैल्सियम होने के कारण इसे उसर भूमि सुधारक के साथ-साथ खाद के रूप में भी प्रयोग किया जाता है। जिप्सम की आवश्यकता मिट्टी परीक्षण के बाद प्रयोगशाला द्वारा ज्ञात कराना सर्वथा उचित रहता है।
जिप्सम को प्रयोग में लेने से दो अतिरिक्त लाभ मिलते हैं, सल्फर उर्वरक रूप में इनका काम स्वतंत्र रूप में (बिना किसी तत्व के बंधे) उपयोग किया जा सकता है और साथ ही इसमें कैल्शियम भी उपलब्ध है जिसका मूंगफली की फसल में फली बनाने में खास महत्व रहता है। मूंगफली की फसल में सूईया आने से पहले जिप्सम देना चाहिये जिससे कि फसल को पर्याप्त कैल्शियम मिल सके, पर्याप्त कैल्शियम न मिलने पर गुली कमजोर रह जाती है और उपज भी कम होती है। जिप्सम से प्राप्त गंधक (सल्फर) से तेल की मात्रा व गुणवत्ता पर अच्छा असर देखने में आया है। जिप्सम बुवाई से पूर्व डालने से उत्साहवर्धक परिणाम प्राप्त हुए हैं जिन खेतों में मूंगफली की फसल को पीलिया रोग है वहां हरा कसीस 0.5 प्रतिशत या गंधक के अम्ल के 0.1 प्रतिशत धोल का फसल में फूल आने से पहले एक बार तथा पूरे फूल आने के बाद दूसरी बार छिड़काव करके पीलिये का निंयंत्रण किया जा सकता है। इस घोल में चिपकना पदार्थ जैसे साबुन आदि अवश्य मिलाइये।


नत्रजन स्थिरीकारक जैव-उर्वरक राइजोबियम – यह जीवाणु मिट्टी में स्वतंत्र रूप में निवास करता है, तथा वायुमंडलीय नत्रजन को अवशोषित कर पौधों के जड़ों को प्रदान सहजीवन कराता है जिससे पौधों के विकास में सहायता मिलती है। यह जीवाणु नत्रजन की सबसे अधिक मात्रा उपलब्ध कराने के साथ-साथ सबसे कुशल जैव-उर्वरक भी है। इसका लेग्युम कुल के पोधों के साथ विशिष्टता तथा सह जीविता के कारण उपयोग दलहनी फसलों जैस चना, मटर, अरहर, लोबिया, मुंग, उडद, मसूर, फलीदार सब्जियों जैस सेम, इत्यादि तथा तिलहनी फसलों जैस मुंगफली तथा सोयाबीन में ही अधिक उपयोगी हैं।
सिंचाई
मूंगफली खरीफ फसल होने के कारण इसमें सिंचाई की प्राय: आवश्यकता नहीं पड़ती। सिंचाई देना सामान्य रूप से वर्षा के वितरण पर निर्भर करता हैं फसल की बुवाई यदि जल्दी करनी हो तो एक पलेवा की आवश्यकता पड़ती है। यदि पौधों में फूल आते समय सूखे की स्थिति हो तो उस समय सिंचाई करना आवश्यक होता है। फलियों के विकास एवं गिरी बनने के समय भी भूमि में पर्याप्त नमी की आवश्यकता होती है। जिससे फलियाँ बड़ी तथा खूब भरी हुई बनें। अत: वर्षा की मात्रा के अनुरूप सिंचाई की जरूरत पड़ सकती है। मूंगफली की फलियों का विकास जमीन के अन्दर होता है।
निराई-गुड़ाई एवं खरपतवार नियंत्रण
निराई गुड़ाई एवं खरपतवार नियंत्रण का इस फसल के उत्पादन में बड़ा ही महत्व है। मूंगफली के पौधे छोटे होते हैं। अत: वर्षा के मौसम में सामान्य रूप से खरपतवार से ढक जाते हैं। ये खरपतवार पौधों को बढऩे नहीं देते। खरपतवारों से बचने के लिये कम से कम दो बार निराई-गुड़ाई की आवश्यकता पड़ती है। पहली बार फूल आने के समय दूसरी बार 2-3 सप्ताह बाद जबकि पेग (नस्से) जमीन में जाने लगते हैं। इसके बाद निराई गुड़ाई नहीं करनी चाहिए। जिन खेतों में खरपतवारों की ज्यादा समस्या हो तो बुवाई के 2 दिन बाद तक पेन्डीमिथालिन नामक खरपतवारनाशी की 3 लीटर मात्रा को 500 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हैक्टर छिड़काव कर देना चाहिए। मूंगफली की फसल में खरपतवारों द्वारा प्रतियोगिता की सबसे क्रांतिक अवस्था बुवाई के 3 से 6 सप्ताह तक अनुमानित की गयी है। बाद की अवस्था में जबकि मूंगफली की फसल पूरी तरह सें आच्छादित हो जाती है। खरपतवारों का प्रभाव अपेक्षाकृत कम हो जाता है।
सिंचित फसल में खरपतवार नियंत्रण के लिए खरपतवारनाशी दवाई ईमेजोथाईपर 50 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति हैक्टेयर की दर से पानी में मिलाकर अकुंरण के 15 से 20 दिन बाद तक जमीन पर स्प्रे करने पर खरपतवार नियंत्रित हो जाते हैं।

  • डॉ. वेद प्रकाश यादव
  • डॉ. रणवीर सिंह
  • डॉ. वेद प्रकाश
    email :yadavbreeding@gmail.com

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One thought on “मूंगफली लगायें

  • July 17, 2018 at 1:41 PM
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    Nice डिटेल्स

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