खरीफ में लगायें प्याज

वर्तमान मे खरीफ प्याज की उत्पादकता बहुत कम है जिसका मुख्य कारण है।

  • उपयुक्त किस्मों के बीज की समय पर उपलब्धता न होना।
  • गर्मियों में पानी की कमी।
  • तेज धूप के कारण पौधों का मरना।
  • वर्षा ऋतु में बीमारियों का प्रकोप।
  • उपयुक्त जल निकास का अभाव
  • खरपतवारों की अधिक समस्या
  • कटाई उपरांत सुखाई की समस्या
  • सीधी बुआई में बीजों का कम अंकुरण

उपयुक्त बातों को ध्यान में रखते हुए निम्न तकनीकों को अपनाना आवश्यक है-
उचित किस्मों का चुनाव
कम अवधि की लाल रंग वाली किस्मों का चयन करना। जैसे एन-53, एग्रीफाइण्ड डार्क रेड, फुले समर्थ, बसवंत – 780, भीमा शुभ्रा।
स्वस्थ पौध उत्पादन
बीजों को बुआई पूर्व बीजोपचार अवश्य करें। थायरम, केप्टान, बाविस्टीन।

  • उठी हुई क्यारियों में 10-15 सें.मी. दूरी पर कतारों में बुआई।
  • मई के प्रथम सप्ताह में बुआई।
  • नर्सरी में टपक अथवा छोटे फववारों से पानी देना।
  • नर्सरी बेड में उचित अंकुरण हेतु 50 प्रतिशत घनत्व वाली शेड नेट का प्रयोग करें तथा 30-35 दिनों बाद शेड नेट को हटा दें।
भारत विश्व में प्याज उत्पादन में चीन के बाद दूसरे स्थान पर है। यहां 60 लाख टन प्याज उत्पादन प्रति वर्ष होता है। कुल उत्पादन का 60 प्रतिशत भाग रबी फसल में तथा शेष 40 खरीफ फसल के रूप में होता है। रबी फसल की कटाई अप्रैल-मई में होती है। वहीं खरीफ फसल की कटाई जनवरी तक होती है रबी सीजन की फसल को भण्डारित किया जाता है। इस भण्डारित उत्पाद की बाजार में आवक मई-अक्टूबर माह तक होती है। इस कारण देश में अक्टूबर से दिसंबर तक बाजार में प्याज की आवक नहीं होने के कारण बाजार भाव बढ़़ जाते हैं। ऐसे में यदि खराब मौसम के चलते खरीफ का उत्पादन प्रभावित होता है तो जनवरी-फरवरी माह में प्याज के भाव बहुत अधिक बढ़ जाते है। इस कारण खरीफ प्याज का उत्पादन बाजार भाव में स्थिरता के लिए बहुत ही आवश्यक है।

चौड़ी उठी हुई क्यारियों में रोपाई
समतल खेत मे वर्षा ऋतु में पानी भरने से पौधों के खराब होने की संभावना होती है। इसलिए ट्रैक्टर की सहायता से 4 फीट चौड़ी तथा 20 से 40 मीटर लंबी उठी हुई क्यारियों में ही पौधों की रोपाई करें। जिससे वर्षा ऋतु का अतिरिक्त पानी खेत के बाहर निकल जाये इससे पौधों एवं कंदों का अच्छा विकास होता है तथा पौधे जमीन में उपलब्ध पोषक तत्वों को भली-भांती ग्रहण कर पाते हैं। इस पद्धति से पौधों में फफूंद जनित रोगों का भी प्रकोप नहीं हो पाता है।

सिंचाई
खरीफ प्याज में सिंचाई हेतु टपक सिंचाई अथवा फव्वारा पद्धति का प्रयोग गुणवत्ता युक्त उत्पादन में सहायक होता है। इससे 50 प्रतिशत सिंचाई जल की बचत होती है।
पोषक तत्वों का उपयोग
अच्छे उत्पादन के लिए 10 किग्रा. नत्रजन, तथा स्फुर एवं पोटाश की पूरी मात्रा रोपाई से पूर्व खेत में मिला दें। शेष 50 प्रतिशत नत्रजन को दस भागों में बांटकर फर्टिगेशन विधि से फसल में दें। इसके अतिरिक्त 50 किग्रा. गंधक प्रति हेक्टर के मान से देना चाहिए। अच्छे कंदों के विकास के लिए जल में घुलनशील उर्वरक विशेषकर पाली फीड तथा मल्टी -के के दो पर्णीय छिड़काव 60 एवं 70 दिनों की फसल पर करना चाहिए।
खरपतवार नियंत्रण
नर्सरी में: पेंडीमिथालीन: 2 मिली/लीटर बीज की बोआई के बाद छिड़काव करें। खेत में: घोल: 1.6 मिली./लीटर रोपाई के तुरंत बाद छिड़काव।
अधिक वानस्पतिक वृद्धि का नियंत्रण
खरीफ फसल में अधिक वानस्पतिक वृद्धि होने से कंदो का आकार छोटा रह जाता है। इसलिए 60 एवं 75 दिन की फसल पर 6.0 मिली/लीटर की दर से लिहोसिन (पौध वृद्धि नियंत्रक हार्मोन) के दो छिड़काव करें।
रोग नियंत्रण
एंथ्रेक्नोज एवं पर्पल धब्बा मुख्य रोग है। रोग नियंत्रण हेतु मेंकोजेब-45 अथवा बाविस्टीन 2 ग्राम/लीटर की दर से आवश्यकतानुसार छिड़काव करें।
कीट नियंत्रण
थ्रिप्स के नियंत्रण हेतु इमीडाक्लोप्रिड 0.3 मिली/लीटर को स्टिकर मे मिलाकर छिड़काव करें।
कटाई
खरीफ फसल 90 से 110 दिनों में तैयार हो जाती है। लेकिन पौधों में इस अवधि में भी हरापन रहता है। कटाई से 4-5 दिन पूर्व खाली ड्रम को चलाने से पौधे जमीन पर गिर जाते हैं। इस प्रक्रिया से कटाई उपरांत प्याज भण्डारण अवधि में बढ़ोतरी होती है। खरीफ में अधिक नमी एवं बादलों के कारण कटाई उपरांत सुखाई में समस्या आती है। इसके लिए प्लास्टिक का प्रयोग उपयुक्त रहता है।
उत्पादन: 250 से 400 क्विं./ हेक्टर

  • डॉ. विजय अग्रवाल
    email : agrawal.kvk@gmail.com

www.krishakjagat.org
Share