बारहमास भरपूर टमाटर लगायें

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भूमि: टमाटर की खेती के लिए अच्छी जल निकास वाली चिकनी बलुई-दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है। भूमि का पीएच मान 6 से 7 होना उपयुक्त है। टमाटर की अगेती फसल के लिए हल्की मिट्टी उपयुक्त रहती है।
देशी किस्में: अर्का विशाल, अर्का वरदान।
संकर किस्में: पूसा रूबी, पूसा रोहिणी, पूसा सदाबहार, हिसार ललित, पूसा शीतल, पारकर फ्लेवर, सेवर, पूसा हाइब्रिड-2, पूसा गौरव, हिसार लालिमा, पूसा रेड प्लम।
बुवाई: मैदानी क्षेत्रों में टमाटर की बुवाई वर्ष में दो बार की जाती है।
द्य जून-जुलाई
द्य नवम्बर-दिसम्बर
बीजदर: संकर किस्मों के लिए 200-250 ग्राम बीज तथा देशी किस्मों के लिए 350-400 ग्राम बीज/हेक्टेयर पर्याप्त है।
बीजोपचार: बीजोपचार कैप्टान नामक रसायन से 4 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज दर से करना चाहिए।
नर्सरी (पौधशाला): एक हेक्टेयर फसल बुवाई के लिए सामान्यत: 250 वर्ग मीटर नर्सरी क्षेत्र पर्याप्त है। नर्सरी के लिए चयन किया गया स्थान साफ-सुथरा, कीट एंव रोग मुक्त होना चाहिए। पौधशाला भूमि में पर्याप्त मात्रा में गोबर की खाद डालकर उसकी भलीभांति जुताई करे ताकि मिट्टी भुरभूरी हो जाए। नर्सरी की मिट्टी को नीम कीटनाशी से उपचारित कर 10 सेमी ऊँची क्यारी बनाकर बीज नर्सरी में छिड़क कर या एक इंच की दूरी पर पंक्तियों में बोकर हल्की सिंचाई करे।
पोषण प्रबंधन: खेत तैयार करते समय (पौध रोपित करने के 20-25 दिन पहले) अच्छी सड़ी गोबर की खाद या कम्पोस्ट 200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से भूमि मे मिला देवें। इसके अलावा रसायनिक खाद के रूप में 100 नाइट्रोजन, 50 किलोग्राम फास्फोरस, 50 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर आवश्यकता होती है। नत्रजन की एक तिहाई मात्रा एवं फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा पौध रोपण से पहले तथा नत्रजन की शेष दो तिहाई मात्रा को बराबर दो भागों में बांटकर 25-30 दिनों के अंतराल पर दें।
पौध रोपण: जब पौधे 4-5 सप्ताह या 7-10 सेमी. के हो जाए तो 100 ग्राम/लीटर ट्राइकोडर्मा घोल से उपचारित कर रोपित करें। खरीफ फसल की रोपाई के लिए पंक्तियों और पौधों की आपस की दूरी 60 व 60 सेमी. और शरदकालीन के लिए 60 व 45 सेमी. रखते है। पौध रोपण के तुरन्त बाद हल्की सिंचाई कर दे।
तुड़ाई: टमाटर की फसल 75 से 100 दिनों में तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती है। टमाटर के फलों की तुड़ाई दूरस्थ बाजारों में भेजन के लिए हरी अवस्था, स्थानीय बाजारों में भेजने के लिए गुलाबी अवस्था, अचार और डिब्बाबंदी के लिए पूर्ण पकी अवस्था एवं तुरंत सब्जियों के उपयोग के लिए पकी अवस्था में की जाती है।

 

टमाटर सम्पूर्ण भारतवर्ष में व्यावसायिक रूप से उगाया जाता है। यह अत्यन्त लोकप्रिय एवं पोषक तत्वों जैसे विटामिन, आयरन, फास्फोरस आदि का धनी स्त्रोत होने के कारण मनुष्य के दैनिक भोजन का आवश्यक अंग होने के साथ-साथ किसानों की आय बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। टमाटर का प्रयोग ताजी अवस्था में सब्जी एवं सलाद के रूप में एवं सॉस, चटनी एवं जूस के रूप मे संरक्षित करके वर्षभर उपयोग किया जाता हैं। इसमें पाया जाने वाला लाइकोपिन (लाल रंग वर्णक) महत्वपूर्ण एन्टीआक्सीडेन्ट है जो हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधी क्षमता बढ़ाता है। टमाटर का वार्षिक सब्जी उत्पादन 0.46 मिलियन हेक्टेयर भूमि से 0.13 मिलियन टन है। हमारे देश के किसानों में वैश्विक टमाटर उत्पादन का नेतृत्व करने की पर्याप्त क्षमता है। किन्तु कई तरह की समस्याएं जैसे कीट, रोग, सूत्रकृमि इत्यादि के कारण उत्पादन में 20-25 प्रतिशत तक की हानि हो जाती है। कभी-कभी शत प्रतिशत फसल इनसे बर्बाद हो जाती है। टमाटर के मुलायम एवं कोमल होने की वजह से तथा सघन वानस्पतिक बढ़वार, नम वातावरण एवं अत्यधिक उर्वरकों का प्रयोग होने के कारण भी कीट व रोगों का आक्रमण अधिक होता है। किसान अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए एवं इन नाशीजीवों के प्रकोप के शीघ्र नियंत्रण हेतु ज़हरीले रसायनिकों का अंधाधुंध प्रयोग कर रहे हैं, जिसके कारण विषैले रसायनिकों का समावेश इस सब्जी के खाए जाने वाले भाग में हो जाने के कारण उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

  • कविता कुमावत
  • डॉ. सुरेश कुमार जाट
  • डॉ. जीवन राम जाट
  • डॉ. शंकर लाल गोलाडा
  • email : sandeeph64@gmail.com
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