दलहनी फसल मसूर उपजायें

भूमि की तैयारी
मसूर की खेती डोरसा तथा कन्हार भूमि में सफलतापूर्वक की जा सकती है अधिक पैदावार प्राप्त करने के लिए खेत की दो से तीन बार अच्छी तरह गहरी जुताई करना चाहिए। इसके बाद पाटा चलाकर गोबर की खाद अथवा नाडेप विधि से प्राप्त कम्पोस्ट उपलब्ध होने पर प्रति हेक्टेयर पर पांच से छ: गाड़ी जुताई के समय खेत में मिला लेना चाहिए। यदि भूमि मध्यम अम्लीय हो तो 500 किलोग्राम से लेकर 1000 किलोग्राम चूना प्रति हेक्टेयर की दर से अंतिम जुताई के पूर्व मिलाकर तीन दिन इंतजार करना चाहिए।
उन्नत किस्में
जे.एल.3, पी.एल. 406, आईपीएल 326, मल्लिका।

रबी की दलहनी फसलों में मसूर का प्रमुख स्थान है। इसकी खेती आमतौर पर सम शीतोष्ण जलवायु में की जाती है। फसल पर अधिक ठंड एवं कोहरे के कारण फूल एवं फली प्रभावित होती है। मसूर की खेती प्राय: धान की फसल की कटाई के बाद की जाती है। भूमि की उर्वराशक्ति को बनाये रखने में भी यह फसल बहुत सहायक होती है। मसूर का उपयोग मुख्य रूप से दाल एवं नमकीन बनाने में किया जाता है। इस फसल से प्राप्त दाल स्वास्थ्य के लिए अन्य दालों की तुलना में अधिक लाभप्रद है। इसमें प्रोटीन 24 प्रतिशत, कार्बोहाइड्रेट 60.8 प्रतिशत, कैल्शियम 5 प्रतिशत तथा लोहा 6 प्रतिशत पाया जाता है।

बुवाई समय
मसूर की उन्नत प्रजातियों को 15 अक्टूबर से 25 नवम्बर तक बोनी कर देना चाहिए। बुवाई नारी हल या ड्रिल से कतारों में 20-25 से.मी. की दूरी पर करें।
बीज दर
उन्नत किस्मों के 30-35 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से बोना चाहिए। देरी से बुवाई करने की स्थिति में 40 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई करना चाहिए। यदि उतेरा बुवाई करना हो तो 50 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से बोना चाहिए।
बीजोपचार
स्वस्थ बीजों को बुवाई के पूर्व थायरम 3 ग्राम अथवा बाविस्टीन 1.5-2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें। इसके उपरांत बीजों को मसूर के राइजोबियम कल्चर तथा स्फुर घोलक जीवाणु कल्चर प्रत्येक का 5 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित कर तुरन्त बुवाई करें। उपचारित बीज को हमेशा छायादार स्थान में ही रखें।
उर्वरक की मात्रा
असिंचित अवस्था में 15:30:10 किलोग्राम नत्रजन, स्फुर, पोटाश तथा सिंचित अवस्था में 20:40:2-:20 किलोग्राम नत्रजन, स्फुर, पोटाश, गंधक प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई करते समय डालना चाहिए।
निंदाई-गुड़ाई
फसल को प्रारंभिक अवस्था से लेकर 45 दिन तक खेत नींदा मुक्त रखना चाहिए। नींदा के प्रकोप से फसल की उपज में काफी कमी आ जाती है। यदि खरपतवार का प्रकोप ज्यादा दिखे तो 20-30 दिन में निंदाई अवश्य करें। जिससे खरपतवार द्वारा होने वाले नुकसान से बचा जा सके। मसूर की फसल में अधिकतर मोथा, दूब, बथुआ आदि खरपतवार का प्रकोप होता है। इसके नियंत्रण के लिए 2 लीटर फ्लूक्लोरीन की 600-700 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हेक्टेयर की दर से अंतिम जुताई के बाद मिला दें अथवा पेण्डीमिथालीन एक किलोग्राम 1000 लीटर पानी में घोलकर बुवाई के 48 घंटे के अंदर छिड़काव करना चाहिए। सिंचाई उपलब्ध होने की स्थिति में पहली सिंचाई शाखा निकलते समय अर्थात् बुवाई के 30-35 दिन बाद करें। दूसरी सिंचाई आवश्यकतानुसार बुवाई के 70-75 दिन बाद करना चाहिए। यथा संभव स्प्रिंकलर से ही सिंचाई करें। स्प्रिंकलर से सिंचाई के दौरान उपवाह शून्य हो अर्थात जल प्रयोग की दर अवशरण दर से कम होना चाहिए।

  • प्रियांक सिंह बनाफर

www.krishakjagat.org

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