फल बगीचों को सुरक्षित रखें कीटों से

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कीट
फल मक्खी- वर्षा ऋतु में फल वृक्षों का सबसे भयंकर कीट फल मक्खी है। इस कीट का प्रकोप सर्वाधिक जून से सितंबर माह में रहता है इस दौरान 80 प्रतिशत नुकसान हो जाता है। पकते हुए फलों की कोमल त्वचा में यह मक्खी अंडे देती है। अंडे फूटने पर मेगट (कीट की एक अवस्था) फलों में छेद कर फलों के कोमल गूदे को खाने लगते हैं। ऐसे अधिकांश फल झड़ जाते हैं, प्रभावित फल गहरे हरे वह छिद्रित हो जाते हैं। जब प्रभावित फलों को काट कर देखा जाता है तब विषाद पूर्ण फलों के अंदर हिलते हुए मेगट नजर आते हैं, प्रभावित फल सडऩे लगते हैं एवं जमीन पर गिर जाते हैं। इस तरह के फल खाने योग्य नहीं रह जाते।
नियंत्रण – इस कीट के नियंत्रण के लिए वर्षा ऋतु की फसल नहीं लेनी चाहिए, क्योंकि यह कीट वर्षा ऋतु के फलों को भयंकर हानि पहुंचाते हैं और इस ऋतु के फल स्वाद में फीके भी होते हैं। गर्मी की ऋतु (जून-जुलाई) में खेत की मिट्टी को पलट दें। जिससे कीट की प्यूपा अवस्था ऊपर आ जाएगी और गर्मी से नष्ट हो जाएगी। जमीन पर पड़े हुए फलों को एकत्रित कर बगीचे से दूर गड्ढे में दबा दें। रसायनिक नियंत्रण में डाइमिथिएट 0.03 प्रतिशत का छिड़काव फल मक्खी के अंडे देने से पूर्व ही कर दें। प्रौढ़ फल मक्खी को मारने के लिए मिथाइल यूजेनॉल ट्रेप (25 ट्रेप प्रति हेक्टर)का प्रयोग करें।
अमरूद व आम का छाल भक्षक कीट – इस कीट के प्रकोप से नवीन पौधे मर जाते हैं, इस कीट का कैटरपिलर तने या शाखाओं के जुड़ाव बिंदु पर छेद कर उसमें रेशमी कीट मल भर देते हैं। कीट दिन में सुरंग में रहते हैं तथा रात्रि में सुरंग से बाहर निकल कर छाल को खाते हैं।
नियंत्रण – पेड़ की सूखी और अत्यधिक प्रभावित शाखाओं को काटकर अलग कर देना चाहिए एवं नष्ट कर देना चाहिए। ढीली छाल को खुरचकर अलग कर दें जिससे युवा कीट को अंडे देने से रोका जा सके। भयंकर प्रकोप होने पर कॉपर आक्सी क्लोराइड का लेप पेड़ों के तने पर करना चाहिए। छिद्र से ग्रब (कीट की एक अवस्था) को निकालने के लिए नुकीले हुक का प्रयोग करें। कोलतार एवं केरोसिन 1:2 के अनुपात की पट्टी आधार से 3 फुट ऊंचाई तक बांधे। लोहे के तार से छिद्र को साफ करें। छिद्र में केरोसिन तेल डालकर छिद्र को मिट्टी के गारे से बंद करें।
नींबू का सिट्रस साईला – इस कीट के निम्फ एवं प्रौढ़ अवस्था दोनों ही पत्तियों, कोमल शाखाओं एवं फूलों की कोशिकाओं का रस चूस कर हानि पहुंचाते हैं। परिणामस्वरुप पत्तियां मुड़ जाती हैं और पत्तियां गिरने लगती हैं तथा शाखाएं सूखने लगती है। निम्फ सफेदी लिए हुए क्रिस्टलिये हनीड्यू स्रावित करता है जिससे फफूंद की वृद्धि होती जाती है एवं प्रकाश संश्लेषण प्रभावित होता है।
नियंत्रण – सिट्रस सायला कीट का प्रकोप अम्बे बहार (फरवरी-मार्च) एवं मृग बहार (जून-जुलाई) यानी वर्षा ऋतु में अत्यधिक होता है। थाइमेथाक्सेम 25 डब्ल्यूजी/ 0.32 ग्राम प्रति लीटर पानी का छिड़काव कली फूटते समय करें। आवश्यकता होने पर 15 दिन बाद पुन: इस छिड़काव को दोहराया जा सकता है।
नींबू की काली एवं सफेद मक्खी – निम्फ एवं प्रोड दोनों पौधों का रस चूसते हैं जिससे पत्तियां मुड़ जाती है व समय से पहले फूल झड़ जाते हैं, और पौधा ओज खो देता है। कीट के मल (हनीड्यू) स्त्रावित करने से बीमारी का प्रकोप भी बढ़ जाता है।
नियंत्रण – नींबू की फसल के साथ अमरूद, अनार व चीकू की फसल ना लगाएं। सघन पौधा रोपण ना करें एवं खेत में पानी खड़ा न रहने दें। अत्यधिक सिंचाई एवं नत्रजन का प्रयोग नहीं करें। इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस एल 0.5 मिली लीटर प्रति लीटर का पर्णीय छिड़काव करना चाहिए। आवश्यकता होने पर 15 दिन बाद 10 मिलीलीटर प्रति लीटर नीम का तेल का छिड़काव करें।
नींबू की तितली – यह कीट पौधों की पत्तियों पर अंडे देता है इससे लार्वा निकलकर नयी पत्तियों को खाते हैं। इस कीट द्वारा मार्च-अप्रैल तथा अगस्त से अक्टूबर में बहुत हानि होती है। कीट पत्तियों को खाकर शाखा को पत्ती रहित कर देता है। फलों पर आक्रमण होने पर यह फलों का डंठल खाकर नुकसान पहुंचाते हैं जिससे प्रभावित फल झड़ जाते हैं।
नियंत्रण – इसके नियंत्रण के लिए लार्वा को पकड़ कर नष्ट कर देना चाहिए। पौधों पर 0.1 प्रतिशत कार्बोरिल का छिड़काव करें।
अनार का रस चूसने वाला पतंगा – यह कीट रात्रि के समय (सांय 7:00 बजे से प्रात: 2:00 तक) हानि पहुंचाता है तथा अगस्त से अक्टूबर तक सक्रिय रहता है।
नियंत्रण – पतंगा बगीचे की बाहर वाली कतारों से आक्रमण करना शुरू करता है। अत: लंबी कतारें न रखकर चतुर्भुजाकार खंडों में लगाया जाए। अधिक प्रभावित क्षेत्रों में मृग बहार लेने से बचना चाहिए क्योंकि अगस्त से अक्टूबर के मध्य पतंगे अधिक सक्रिय रहते हैं। आवरण सामग्री की उपलब्धता अनुसार फलों को बटर पेपर, अखबार, पॉलीमर बैग आदि से ढक देना चाहिए। शाम के समय खरपतवार, फसल अवश्य आदि से बगीचे में धुआँ करना चाहिए। ऐसा करने से पके फलों की गंध को धुआँ छिपा लेता है जिसे पतंगा फल को खोज नहीं पाता और वह बगीचे में नहीं जा पाता। जहरीला दाना (95 प्रतिशत शीरा या गुड व 5 प्रतिशत मेलाथियान) बनाकर मिट्टी के बड़े बर्तन में रखकर ऊपर बल्ब जला दें।
चीकू मॉथ – यह चीकू को नुकसान पहुंचाने वाला एक प्रमुख कीट है। कीट नए प्ररोह के प्रस्फुटित होने के समय अप्रैल माह से फल को नुकसान करना प्रारंभ कर देता है। जुलाई से अक्टूबर तक कीट बहुत अधिक सक्रिय रहता है। कीट नई अग्रस्त पत्तियों, कलियों एवं छोटे फलों पर आक्रमण करता है। यह कीट पत्तियों पर जाल बनाते हैं तथा पत्तियों को खुरचकर खाते हैं। परिणामस्वरुप पत्तियां पतली कागज के रूप में अवशेष रह जाती है। कीट कलियों व फलों को छेदकर नुकसान भी पहुंचाता है। ऐसे पेड़ पर फूल व फल कम आते हैं। उपज बुरी तरह से प्रभावित होती है। इस कीट का प्रकोप काली पत्ती किस्म पर क्रिकेट बॉल की अपेक्षा अधिक होता है।
नियंत्रण – इस कीट के नियंत्रण के लिए मिथाइल पैराथियान के 0.2 प्रतिशत घोल का छिड़काव करना चाहिए। छिड़काव जुलाई से अगस्त में 2 से 3 सप्ताह के अंतर पर करें।

तीनों ऋतुओं में से वर्षा ऋतु में कीट एवं बीमारियों का प्रकोप अधिक होता है,क्योंकि इस ऋतु में तापमान कम एवं आद्र्रता अधिक होती है। इस तरह का मौसम कीट एवं बीमारियों के प्रकोप के लिए अनुकूल रहता है, और फल बगीचों को अत्यधिक नुकसान पहँुचता है। जिससे फलों की गुणवत्ता में कमी आती है, और बाजार में किसानों को उचित कीमत नहीं मिल पाती है। अत: वर्षा ऋतु में कीट एवं बीमारियों का समय रहते नियंत्रण करना आवश्यक हो जाता है। इस ऋतु में मुख्यतया अमरूद, अनार, आम, नींबू, पपीता, आंवला, खजूर, फालसा, कटहल आदि फसलों में फलन होता है। उपरोक्त फसलों में हानि पहुंचाने वाले कीट एवं बीमारियों का नियत्रंण किया जा सकता है।
  • डॉ. राकेश कुमार यादव
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