वर्षा आधारित खेती में संभावनाएं

भूमि एवं जल प्रकृति द्वारा मनुष्य को दी गयी दो अनमोल सम्पदा है जिनका कृषि हेतु उपयोग मनुष्य प्राचीनकाल से करता आया है । परन्तु वर्तमान काल में इसका उपयोग इतनी लापरवाही से हो रहा है कि इनका संतुलन बिगड़ गया है तथा भविष्य में उनके संरक्षण के बिना मनुष्य का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जायेगा। हमारे देश में आर्थिक उन्नति में कृषि का बहुमूल्य योगदान है। देश में लगभग 70 प्रतिशत कृषि योग्य भूमि वर्षा पर निर्भर है । छत्तीसगढ़ में तो लगभग 80 प्रतिशत जनसंख्या कृषि पर निर्भर है तथा लगभग 90 प्रतिशत कृषि योग्य भूमि वर्षा पर निर्भर हैै। वर्षा पर निर्भर खेती में हमेशा अनिश्चितता बनी रहती है क्योंकि वर्षा की तीव्रता तथा मात्रा पर मनुष्य का कोई वश नहीं चलता है। इसलिये इस प्रकार की खेती में वर्षा ऋतु के आगमन से पूर्व ही कुछ व्यवस्थाएं करनी पड़ेगी जिससे वर्षा से होने वाले भूरक्षण को कम करके वर्षा जल का अधिकतम उपयोग खेती में किया जा सके। छत्तीसगढ़ के किसानों की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए ऐसी विधियों का उपयोग करना आवश्यक होगा जो कम खर्चिली तथा आर्थिक द्वष्टि से लाभप्रद हो। पर्वतीय भौगोलिक परिस्थितियों के कारण किसानों के खेत छोटे-छोटे तथा कई स्थानों में बंटे हुए है जिसके कारण भूमि एवं जल संरक्षण के उपाय पूरी तरह सफल नहीं हो पाते है। वर्षा आधारित संवहनीय कृषि हेतु विभिन्न प्रकार के संरचना का निर्माण किया जाता है जिससे कि वर्षा आधारित क्षेत्रों में वर्षा की एक-एक बूंदों को संरक्षित किया जा सके।

वर्षा आधारित संवहनीय कृषि हेतु विभिन्न संरचना का उपयोग कर वर्षा आधारित क्षेत्रों में कृषि किया जा सकता है साथ ही भूजल स्तर को भी बढ़ाया जा सकता है जैसे-
1. कन्जरवेटिव फरो।
2. खेत के चारों ओर गढ्ढा बनाना ।
3. डबरी या फार्म पॉन्ड।
संरक्षण कूड़ (कन्जरवेटिव फरो)
कन्जरवेटिव फरो एक प्रकार का गढ्ढा बनाने का संरचना है जो कि ढलान के विपरीत दिशा में प्रत्येक 4 मीटर के दूरी में बनाया जाता है यह 1.0 मीटर चौड़ा 0.5 मीटर गहरा एवं गहराई से 0.3 मीटर चौड़ा होता है।
कन्जरवेटिव फरो का महत्व-इस संरचना से कृषि क्षेत्रों में वर्षा की एक एक बूंदों को गढ्ढों में संरक्षित करके रखा जा सकता है। अक्सर वर्षा के बाद खेतों में पानी बहकर जाती है जिससे की मृदा का कटाव तो होता ही है साथ ही पानी का उपयोग भी नहीं हो पाता हैं लेकिन इस संरचना से वर्षा की जल मृदा से साथ जमीन के अंदर चली जाती है जिससे भुमि में नमी रहती है और भूजल स्तर बढ़ता है।
कन्जरवेटिव फरो संरचना में फसलों का उत्पादन
हमारे प्रदेश के ज्यादातर सीमांत किसान वर्षा आधारित खेती करते हैं ज्यादातर किसान धान, मक्का और अरहर जैसे फसल उत्पादन करते हैं धान की खेती में सिंचाई की पानी की आवश्यकता ज्यादा होती है फिर भी यहां के किसान जोखिम उठा कर वर्षा आधारित खेती करते हैं यह जान कर भी यदि बारिश नहीं हुई तो फसल बर्बाद होगी ही। आज के सफल किसान जोखिम को कम करने के कई उपाय करते हैं जैसे दोहरा खेती, मिश्रित खेती, बहु फसली करना इत्यादि कर जोखिम कम करते हैं। ऐसे गढ्ढे के किनारों में मूंग या उड़द दाल के साथ अरहर लगाया जा सकता है। एक एकड़ के लिये प्रत्येक 1000 मीटर लम्बी कतार के लिये लगभग रू.14000 खर्च आता है। ऐसे मेड़ों पर कई प्रकार के पेड़ों को भी लगाया जा सकता है यदि मिट्टी का ढलान पूर्वी-पश्चिमि दिशा में हो तो। यदि मिट्टी का ढलान उत्तर-दक्षिण दिशा में हो तो कम छायादार पेड़ों को लगाया जा सकता है जैसे चीकू, सीताफल इत्यादि। गढ्ढों के मेढ़ों पर पपीता, मीठा नीम को प्रत्येक 3 मीटर की दूरी पर लगाया जा सकता है या प्रत्येक 1.5 मीटर की दूरी पर बहुवर्षीय अरहर के साथ अरंडी लगाया जा सकता है। प्रत्येक 12 मीटर के दूरी पर आम, कटहल या अमरूद लगाया जा सकता है।

खेत के चारों ओर गढ्ढा बनाना
खेत के चारों ओर मेढ़ के नीचे गढ्ढा बनाना वर्षा जल की को संरक्षण करने का एक महत्वपूर्ण कार्य है । गढ्ढों से निकले मिट्टी को ढलान के विपरीत दिशा बाहर की ओर रखा जाता है जिससे के वर्षा होने से पुन: मिट्टी गढ्ढे में न भरे। यह गढ्ढा पानी को जमीन के जल स्तर बढ़ाने में भी मदद करता है। यह सोकता गढ्ढा के रूप में भी कार्य करता है। इस प्रकार के गढ्ढे 1 मीटर चौड़ा ऊपर और 1 मीटर चौड़ा नीचे भी रहता है जो 0.5 मीटर गहरी होती है। इस प्रकार के गढ्ढे करने के लिये जमीन के प्रकार के अनुसार 8 से 10000 रूपये प्रति 280 क्यिुबिक मीटर। यह गढ्ढे खेत के चारों ओर खोदा जाता हैं।

गढ्ढों के किनारों में फलदार वृक्ष लगाना
किनारोंं में कांटेदार लगा सकते हैं जिससे जीवित रक्षक फसल खेतों के चारों ओर रक्षा कर सके। हरी पत्ती खाद के लिये ग्लीरीसीडिया, सुबबूल इत्यादि भी लगाया जा सकता है। इस प्रकार के पौधे 40 से 50 किलो मीटर प्रति घंटा को भी रोक सकती है। पौधे के पत्ती नीचे गिर कर लाभदायक जीवाणुओं को आश्रय देती है जो खेत के लिये लाभदायक होती है। यह पौधे बड़े होकर पशुओं के चारे के उपयोग में लाया जा सकता है। इससे अतिरिक्त आय रूप में फल और इमारती लकड़ी के रूप में कमाया जा सकता है।
खेत के किनारे गढ्ढे बनाने के लाभ

  • मृदा कटाव का रूकना।
  • वर्षा की पानी खेत में रहती है जिससे जमीन का जल स्तर बढ़ता है।
  • पानी को रोकने में मदद मिलती है जिसमें खेत में चारों तरफ नमी होती है।
  • गढ्ढे के चारों तरफ फलदार वृक्ष लगाया जा सकता है जिससे कि फल के साथ इमारती लकड़ी का अतिरिक्त मुनाफा होता है।
  • पेड़ों के कारण पत्तियों से हरी खाद भी मिलती है व पशुपालन करने में मदद मिलती है।
डबरी या फार्म पॉन्ड
डबरी या फार्म पॉन्ड एक प्रकार का छोटे रूप में वर्षा जल को संरक्षित करने की संरचना है जिसमें वर्षा का अतिरिक्त जल जो बह कर जाता है खेत में संरक्षित हो जाता है जिसका उपयोग उचित रूप से किया जा सकता है।
फार्म पॉन्ड से लाभ

  • खेत में लगे वृक्षों के लिये आवश्यक सिंचाई की पानी का काम करता है।
  • वर्षा जल के साथ बहने वाले उर्वर मृदा को रोकती है।
  • वर्षा न होने की स्थिति में सब्जियों की सिंचाई का काम करती है।
  • मछली पालन भी किया जा सकता है।

फार्म पॉन्ड बनाने की विधि
भौतिक रूप से एक फार्म पान्ड एक प्रकार के चौकोर आकार से बनाया जाता है, चौकोर आकार ऊपर से लेकर नीचे तक एक निश्चित ढलान में किया जाता हैै। इसमें एक पानी आगमन के लिये तथा एक पानी बाहर निकालने की संरचना होना चाहिये। इस आगमन व निकास के लिये 1:1 मीटर आकार हो सकता है। अगर पानी आगमन व निकास की जगह में पत्थरों के बनायें तो मिट्टी का कटाव बहुत ही कम हो जाता है।

  • देवेन्द्र कुमार कुर्रे
    email : devendrakurrey95@gmail.com

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