मुनाफा देगी अरहर

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दलहनी फसलों के पौधों की जडों पर उपस्थित ग्रंथियाँ वायुमण्डल से सीधे नत्रजन ग्रहण कर पौधों को देती हैं, जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति बनी रहती है। दलहनी फसलें खाद्यान्न फसलों की अपेक्षा अधिक सूखारोधी होती है।
मध्यप्रदेश से अरहर की नई प्रजातियां जे.के.एम.-7, जे.के.एम.-189 व ट्राम्बे जवाहर तुअर-501, विजया, आई.सी.पी.एच.-2671 (संकर) दलहन विकास परियोजना, खरगोन द्वारा विकसित की गई है। अरहर को सोयाबीन के साथ अंतरवर्तीय फसल के रूप में लगाने की अनुशंसा कर करीब एक से दो लाख हेक्टेयर क्षेत्र का रकबा म.प्र. में बढ़ाया जा सकता है।
भूमि का चुनाव एवं तैयारी: अरहर की फसल के लिए समुचित जल निकासी वाली मध्य से भारी काली भूमि जिसका पी.एच. मान 7.0-8.5 का हो उत्तम है। देशी हल या ट्रैक्टर से दो-तीन बार खेत की गहरी जुताई क व पाटा चलाकर खेत को समतल करें। जल निकासी की समुचित व्यवस्था करें।
अंतरवर्तीय फसल: अंतरवर्तीय फसल पद्धति से मुख्य फसल की पूर्ण पैदावार एवं अंतरवर्तीय फसल से अतिरिक्त पैदावार प्राप्त होगी । मुख्य फसल में कीड़ों का प्रकोप होने पर या किसी समय में मौसम की प्रतिकूलता हेाने पर किसी न किसी फसल से सुनिश्चित लाभ होगा। साथ-साथ अंतरवर्तीय फसल पद्धति में कीड़ों और रोगों का प्रकोप नियंत्रित रहता है। निम्न अंतरवर्तीय फसल पद्धति मध्य प्रदेश के लिए उपयुक्त है।

  • अरहर + मूंगफली या सोयाबीन 2:4 कतारों के अनुपात में (कतारों दूरी 30 से.मी.)
  • अरहर + उड़द या मूंग 1:2 कतारों के अनुपात में (कतारों दूरी 30 से.मी.)
  • अरहर की उन्नत जाति जे.के.एम.-189 या ट्राम्बे जवाहर तुअर-501 को सोयाबीन या मूंग या मूंगफली के साथ अंतरवर्तीय फसल में उपयुक्त पायी गई है।

बोनी का समय व तरीका: अरहर की बोनी वर्षा प्रारम्भ होने के साथ ही कर देना चाहिए। सामान्यत: जून के अंतिम सप्ताह से लेकर जुलाई के प्रथम सप्ताह तक बोनी करें। कतारों के बीच की दूरी शीघ्र पकने वाली जातियों के लिए 60 से.मी. व मध्यम तथा देर से पकने वाली जातियों के लिए 70 से 90 से.मी. रखना चाहिए। कम अवधि की जातियों के लिए पौध अंतराल 15-20 से.मी. एवं मध्यम तथा देर से पकने वाली जातियों के लिए 25-30 से.मी. रखें।
बीज की मात्रा व बीजोपचार : जल्दी पकने वाली जातियों का 20-25 किलोग्राम एवं मध्यम पकने वाली जातियों का 15 से 20 कि.ग्रा. बीज/ हेक्टर बोना चाहिए। चौफली पद्धति से बोने पर 3-4 किलों बीज की मात्रा प्रति हैक्टेयर लगती है। बोनी के पूर्व फफूंदनाशक दवा 2 ग्राम थायरम +1 ग्राम कार्बेन्डाजिम या वीटावैक्स 2 ग्राम+5 ग्राम ट्राईकोडर्मा प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचारित करें।
उर्वरक का प्रयोग: बुआई के समय 20-25 कि.ग्रा. नत्रजन, 40-50 कि.ग्रा. स््रफुर, 20-25 कि.ग्रा. पोटाश व 20 कि.ग्रा. गंधक प्रति हेक्टर कतारों में बीज के नीचे दिया जाना चाहिए। खेतों में प्रत्येक तीन वर्ष में एक बार 25 कि.ग्रा. प्रति हेक्टर जिंक सल्फेट को आखिरी बखरनी पूर्व भुरकाव करने से पैदावार में अच्छी बढ़ोतरी होगी।
निंदाई-गुड़ाई: खरपतवार नियंत्रण के लिए 20-25 दिन में पहली निंदाई तथा फूल आने के पूर्व दूसरी निंदाई करें। 2-3 कोल्पा चलाने से नींदाओं पर अच्छा नियंत्रण रहता है व मिट्टी में वायु संचार बना रहता है। नींदानाशक पेन्डीमिथालिन1.25 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व/ हेक्टर बोनी के बाद प्रयोग करने से नींदा नियंत्रण होता है ।

किस्में (मध्यम अवधि)
आईसीपीएच 2671 (2010), आईसीपीएच 2740 (2013), जेकेएम -7 (1996), जेकेएम-189 (2006), आईसीपी-8863, (मारुती, 1986), जवाहर अरहर-4 (1990), आईसीपीएल-87119 (आशा 1993), बीएसएमआर-853 (वैशाली, 2001), बीएसएमआर- 736 (1999), विजया आईसीपीएच- 2671 (2010)

 

 

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