कृषि भूमि की समस्या एवं समाधान

कृषि उत्पादन में कुछ नई समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं । भविष्य में अधिक उत्पादन के लिए इन समस्याओं का निवारण होना बेहत जरूरी है। इनमें से कुछ प्रमुख समस्याओं के बारे में जानकारी इस लेख में दी जा रही हैं।
भूमि में चौवे का ऊपर आ जाना : भारत के कुछ प्रांतों (उत्तर-पूर्वी इलाकों में) यह विकट समस्या बनी हुई है। भारत की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि पहाड़ी श्रृंखला के मौजूद होने की वजह से आसपास एक प्लेट की तरह भूमि नीची है जिसके कारण बरसात के मौसम में भूमि में चौवे ऊपर आ जाने की समस्या बनी हुई है तथा इसके साथ पानी भी खारा मिलेगा और जल निकास का उचित प्रबंध होना एक कठिन कार्य है। भारत में पिछले 20 सालों में भूमि स्तर लगातार ऊपर आ रहा है जिससे किसानों को सेम की समस्या का सामना करना पड़ रहा है। ऐसी जगह पर सबसरफेसड्रेनेज लगाना एक अच्छा उपाय है। जिन इलाकों में चौवा ऊपर आ रहा है वहां पर खारा पानी (कुछ सीमा की लवणता के साथ) की नहर के पानी के साथ इसका प्रयोग करके इस समस्या का काफी हद तक समाधान किया जा सकता है। इसके लिए खेत में कुशल जल प्रबंधन जिसमें सिंचाई का उत्तम तरीका हो तथा खाल पक्का करना आवश्यक है।

 जैसा कि हम सब जानते हैं कि भारत एक कृषि प्रधान देश है और देश की लगभग 60 प्रतिशत जनसंख्या सीधे या परोक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। जिसमें भूमि अन्य प्रयोजनों के लिए भी प्रयोग हो रही है। भूमि एक सीमित साधन है जिसमें वृद्धि लगभग असंभव है। विश्व में हमारा भारत वर्ष ऐसा इकलौता देश है जहां वर्ष में छ: अलग-अलग ऋतुएं आती हैं जिसके कारण हमारे किसान लगभग हर प्रकार की फसल लेने में सक्षम हैं। भारत का दुनिया के खाद्यान्न उत्पादन में दूसरा स्थान है, जूट उत्पादन में पहला तथा दलहन फसल में पहला स्थान है। उत्पादन में यह वृद्धि सिंचाई के साधनों के विस्तार, कृषि की आधुनिक सिफारिशों के अपनाने व किसानों और सरकार के अथक प्रयासों से ही संभव हो पाई है।

भूमिगत जल स्तर का नीचे जाना : वैसे तो जल स्तर नीचे जाना पूरे भारत (मुख्यत: उत्तर-दक्षिण भारत) में गम्भीर समस्या है लेकिन देश में जिस भी जगह किसान लगातार गेहूं- धान फसल चक्र अपना रहे हैं वहां पर पानी का बहुत दोहन हो रहा है जिससे चौवा लगातार नीचे जा रहा है और किसानों को अपने ट्यूबवेल और गहरे करने पड़ रहे हैं। आजकल ज्यादा प्रदूषण के चलते ग्लोबल वार्मिंग बढ़ रही है जिसके परिणामस्वरूप बारिश का वितरण असामान्य तथा अकस्मात होता जा रहा है और जिसकी वजह से भूमिगत जल रिचार्ज नहीं हो पा रहा। ऐसी समस्या से निपटने के लिए बारिश के पानी को जगह-जगह छोटे-छोटे बांध बनाकर रोकना चाहिए ताकि ये पानी नीचे जाए और जलस्तर को बनाए रखे। हमारे उत्तरी हिस्से में इस समस्या से निदान पाने के लिए धान की फसल की कास्त घटाकर कम पानी से पकने वाली फसलों को फसल चक्र में स्थान देना चाहिए।
मृदा क्षरण : तेज वायु के साथ मिट्टी का उड़ के जाना एवं टिब्बे बनना, बाढ़ या तेज बारिश से भूमि का कटाव और जमीन की ऊपरी उपजाऊ परत का नुकसान मृदा क्षरण कहलाता है। जिस भी इलाके में मृदा क्षरण हवा द्वारा हो रहा है वहां पर टपक सिंचाई प्रणाली काम में आए हैं जिसकी वजह से जमीन में नमी रहती है तथा मृदा के कण जुड़े रहते हैं तो क्षरण बहुत कम होता है। बारिश से भूमि कटाव रोकने की दिशा में पूरे देश में अलग – अलग जगह वाटरशेड प्रोजेक्ट्स के तहत सराहनीय काम हो रहा है।
खारा पानी का प्रयोग : मध्य, उत्तर एवं पश्चिमी प्रांतों में 40-50 प्रतिशत भूमिगत जल खारा है जिसके लगातार प्रयोग से फसल उत्पादन व भूमि स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। किसान भाई सिंचाई करते समय खारे पानी में नहर के पानी को उचित मात्रा में मिला दें तो यह मृदा और फसल दोनों के लिए गुणवत्ता से भरपूर होगा तथा किसान भाई फसल का चुनाव जलवायु व मिट्टी की किस्म के आधार पर करें तो जमीन का स्वास्थ्य ठीक रखकर अच्छी पैदावार ले सकते हैं।
कृषि रसायनों का अंधाधुंध प्रयोग : पिछले 3 दशक में कीटनाशक, कवकनाशक व खरपतवारनाशक दवाओंं का प्रयोग काफी बढ़ा है जिसे रोकने के लिए समन्वित कीट व खरपतवार नियंत्रण प्रबंध पर बल दें।
सीवर व कारखानों से निकले पानी का प्रयोग : भारत एक विकासशील देश है जिसमें विकास के चलते विभिन्न कारखानों की संख्या लगातार बढ़ रही है तथा उनका गंदा पानी प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से खाली जमीनों में ही डाला जा रहा है जो कि मिट्टी व पानी दोनों को ही प्रदूषित कर रहे हैं। जैसा कि हम जानते हैं कि इस पानी में पोषक तत्वों के अलावा विषैले पदार्थों व घुलनशील हानिकारक लवणों की अधिक मात्रा होने से भूमि, फसलों, पशुओं व मनुष्यों के स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। सीवर कारखानों से निकले पानी का उपयोग एक पानी के साथ मिलाकर तथा उपचार यंत्र के माध्यम से साफ करके किया जा सकता है।

 उर्वरकों का असंतुलित प्रयोग : भारत में 1981-82 में उर्वरकों की खपत 60.64 लाख टन थी जो कि बढ़कर 2014-15 में 239.58 लाख टन हो गई है। इससे जमीन में नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटेशयम का अनुपात बिगड़ गया है तथा भूमि में अलग-अलग पोषक तत्वों का असंतुलन व जैविक कार्बन की कमी होने से जमीन की भौतिक, रसायनिक व जैविक हालत खराब हो गये हैं। भूमि में पोषक तत्वों का संतुलन बनाए रखने के लिए किसानों को समन्वित पोषक तत्व प्रबंधन पर जोर देना चाहिए जिसमें संतुलित उर्वरकों के साथ-साथ गोबर खाद, कम्पोस्ट, वर्मीकपोस्ट, हरीखाद, जैविक खाद एवं फसल चक्र में दलहन फसलों को स्थान देना चाहिए।

 

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