लवणीय एवं क्षारीय भूमि ऊसर जमीनों में पेड़ लगाएं

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स्थानीय भाषाओं में लवण या क्षारग्रस्त भूमियाँ भिन्न-भिन्न नामों से पुकारी जाती हैं। उत्तरप्रदेश में इन्हें रेह या ऊसर कहा जाता है। पंजाब तथा हरियाणा में इनको सेम व कल्लर के नाम से तथा गुजरात में खार व लोना के नाम से जानते हैं। ऊसर संस्कृत भाषा के शब्द उष्ट से लिया है जिसका अर्थ बंजर होता है।
लवण एवं क्षार प्रभावित भूमियों के लक्षण
इन भूमियों की सही पहचान जानने के लिए उन लक्षणों को जानना जरूरी है जिससे इनकी खेत में पहचान की जा सके। इनके मुख्य लक्षण निम्न है –

  •  भूमि की सतह कठोर हो जाती है।
  •  ग्रीष्म ऋतु में भूमियों की ऊपरी सतह पर लवणों की सफेद/भूरी परत दिखाई देने लगती है।
  •  भूमि पर प्राकृतिक वनस्पतियाँ उगनी बंद हो जाती हैं।
  •  भूमि से जल निकास कम हो जाता है तथा बरसात में क्षारीय भूमियों पर गंदला पानी अधिक समय तक खड़ा रहता है।

इन मृदाओं को सुधारने के दृष्टिकोण से एवं रासायनिक दृष्टि से दो भागों में विभाजित किया जा सकता है:
लवणीय मृदाएँ
ये वे मृदायें हैं जिनमें 25 डिग्री से.ग्रेड पर मृदा के संतृश्त विलयन की विद्युत चालकता चार डेसीसाइमन प्रति मीटर से अधिक होती है तथा विनिमयशील सोडियम भी 15 प्रतिशत से अधिक पाया जाता है तथा मृदा का पी-एच. मान 8.5 से कम होता है। लवणीय मुदाओं में सोडियम के क्लोराइड एवं सल्फेट लवण अधिक मात्रा में पाये जाते हैं जिसके कारण पौधों की वृद्धि रुक जाती है तथा उपज घट जाती है। इनमें कहीं-कहीं कैल्शियम के लवण भी पाये जाते हैं। इन परिस्थितियों के कारण मृदा के भौतिक एवं रसायनिक गुणों पर दुष्प्रभाव पड़ता है तथा पौधों की बढ़वार निम्न कारणों से प्रभावित होती है-

  •  घुलनशील लवणों की अधिकता के कारण पौधों को पानी की उपलब्धता में कमी हो जाती है।
  •  मृदा से जल निकास में कमी हो जाती है।
  •  भूजल का स्तर ऊँचा हो जाता है। इससे जलमग्नता की दशा बन जाती है तथा मृदा में वायु संचार कम हो जाता है।
  •  पोषक तत्वों का असन्तुलन हो जाता है तथा विशेेषकर नाइट्रोजन का अभाव हो जाता है।

इन सब कारणों से पौधों में समुचित जल एवं पोषक तत्वों का अभाव हो जाता है तथा उपज में कमी आती है तथा पौधे मर जाते हैं।
क्षारीय मृदाएँ
सामान्यत: इन मृदाओं का पी.एच.मान 8.5 से अधिक पाया जाता है। संतृप्त निष्कर्ष की विद्युत चालकता 4 डेसी साइमन प्रति मीटर से अधिक तथा विनिमयशील सोडियम भी 15 प्रतिशत से अधिक पाया जाता है। घुलनशील लवणों में सोडियम की अधिकता व प्रधानता के कारण मृदा कणों का प्रकीर्णन हो जाता है जिसके फलस्वरूप इन मृदाओं की भौतिक दषा बहुत ही खराब हो जाती है। निम्न प्रमुख कारणों के कारण क्षारीय मृदाओं को सफल फसल उत्पादन के अयोग्य माना जाता है।
इन मृदाओं को सुधारने एवं पुन: खेती योग्य बनाने के कई उपाय हैं। वृक्षारोपण के द्वारा भी इन मृदाओं को सुधारा जा सकता है। वृक्ष मृदा की भौतिक, रसायनिक एवं जैविक गुणों में अनुकूल परिवर्तन कर सुधार की प्रक्रिया में तेजी लाते हैं स्थानीय जलवायु में वृक्षों के कारण परिवर्तन होता है तथा शुष्कता कम हो जाती है। गहरी जड़ों के कारण वृक्ष सतह से नीचे की मिट्टी की कठोरता को कम कर उसमें वायु एवं नमी का संचार करते हैं। वृक्षों से गिरी पत्तियाँ मृदा में जीवांष पदार्थ का समावेष कर उसकी उर्वरा शक्ति बढ़ाती हैं।
लवणीय एवं क्षारीय मृदाओं में लवणों की अधिकता के कारण परिस्थितियाँ पौधों की वृद्धि के अनुकूल नहीं होती। अत: वृक्षारोपण को सफल बनाने के लिये निम्न बातों का ध्यान रखना अत्यन्त आवश्यक है।

  •  भूमि की दशा के अनुरूप सही वृक्ष प्रजाति का चुनाव।
  •  वृक्षारोपण में लिये सही-भू प्रबन्ध।
  •  नर्सरी एवं सही वृक्षारोपण की तकनीक।
  •  खाद एवं उर्वरकों के समावेश से मृदा उर्वरता में सुधार।
  •  पौधों का बीमारी, कीड़ों एवं पशुओं द्वारा चरने से बचाव।

लवणीय भूमि में वृक्षारोपण
लवणीय भूमि में सफल वृक्षारोपण के लिए सामान्यत: निम्नलिखित विधियाँ अपनाएं-
रिच ट्रेंच विधि
इस विधि में खेत में या वृक्षारोपण के स्थान पर 50 से 100 से.मी. ऊँची मेढ़ बनाते हैं। मेढ़ ऊपर से करीब 50 से 100 सै.मी. चौड़ी होती है। दो मेढ़ों के मध्य बनी खाई का उपयोग अतिरिक्त पानी के निष्कासन के लिये किया जाता है। मेढ़ के ऊपर पौधों को लगाया जाता है। इससे जड़ों के पास वायु का संचारण अधिक होता है। शुष्क जलवायु में लवणों का एकत्रीकरण भूमि की सतह पर होता है। लवण मेढ़ों की सतह पर जमा हो जाता है। समुद्र तटीय क्षेत्रों में यह विधि काफी लाभकारी होती है। इसमें अधिक जल मेढ़ों से निकलकर खाइयों में एकत्र हो जाता है तथा जड़ों के आसपास समुचित जल एवं वायु पारगम्यता को सुधारा जा सकता है।
नालियों में वृक्षारोपण
इस विधि में खेत में 30-40 से.मी. गहरी नाली बनाकर उनके मध्य में पौधारोपण करते हैं। सिंचाई के लिये भी इन्हीं नालियों का प्रयोग करते है। समय-समय पर सिंचाई करने से खूड़ों में पानी लवणों को जड़ों से दूर रखता है जिससे कि पौधों की बढ़वार ठीक होती है।
लवणीय भूमियों में सुधार के लिये किसी रसायन का प्रयोग नहीं करते परन्तु कठिन एवं अधिक चिकनी (क्ले) वाली मृदाओं में रेत, चावल का छिलका तथा गोबर की खाद डालने से मृदा के भौतिक एवं रसायनिक गुणों में अनुकूल परिवर्तन हो जाता है तथा लवणों का निक्षालन अधिक होता है। कार्बनिक पदार्थों का मल्च के रूप प्रयोग करने से लवणों का भूसतह पर संग्रहण कम हो जाता है। जिन स्थानों पर सिंचाई जल में कार्बोनेट व बाईकार्बोनेट की अधिकता होती है वहाँ पर जिप्सम का प्रयोग करने से इन लवणों के हानिकारक प्रभाव को कम करने में सफलता मिलती है।
सिंचाई
लवणीय मृदाओं में वृक्षारोपण को सफल बनाने के लिए पौधों की आरम्भिक अवस्था में नियमित सिंचाई आवश्यक होती है। इन मृदाओं में कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि जमीन गीली है फिर भी अच्छे गुण वाले जल से सिंचाई नितान्त आवश्यक होती है। इससे लवणों का निक्षालन होता है तथा जड़ों की वृद्धि के लिये अनुकूल वातावरण मिलता है। पौधों के सफल स्थापन के लिए पहले वर्ष में 10-12 तथा दूसरे वर्ष 6-8 सिंचाई आवश्यक होती हैं। आगे भी विषम परिस्थितियों में सिंचाई करते रहेें।

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