मटर में पौध संरक्षण

रोग प्रबंधन:-
भभूतिया (पाउडरी मिल्ड्यू) –
लक्षण: इस रोग के लक्षण सबसे पहले पत्तियों के उपरी सतह पर छोटे-छोटे सफेद चूर्णी चकते के रूप में दिखाई देते है जो पत्तियों की निचली सतह तथा पौधों के अन्य हरे भाग पर भी फैल जाते हैं। रोगग्रस्त पौधा सफेद चूर्ण से ढंका दिखाई देता है। यह सफेद चूर्ण रोगजनक कवक का कवकजाल व बीजाणुओं का समुह होता है। सफेद चूर्ण के जमाव के कारण पौधों में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया मंद पड़ जाती है जिससे पौधे छोटे रह जाते हैं। इस रोग का तीव्र प्रकोप होने पर नये फूल नहीं आते है तथा फलियों पर भी इसका प्रकोप होता है फलस्वरूप फलियों में बनने वाले दाने छोटे रह जाते हैं या फलियां भरती ही नहीं हैं।

प्रबंधन:-

  • जल्दी पकने वाली किस्मों तथा समय पर बोनी की गई फसलों पर इस रोग का संक्रमण कम होता है।
  • खेत बहुत अधिक सुखा तथा नाइट्रोजन उर्वरक की मात्रा अधिक देने से इस रोग की तीव्रता बढ़ती है।
  • रोगमुक्त फसल से प्राप्त बीजों का ही उपयोग बोनी के लिए करना चाहिए।
  • अच्छे संस्थानों से प्राप्त प्रमाणित बीज को ही बोने के लिए प्रयोग करें।
  • चयनित बीजों को कार्बेन्डाजिम (बाविस्टीन) कवकनाशी (2 ग्राम प्रति किलो बीज) से उपचारित करें।
  • रोग अवरोधी किस्में जैसे रचना, पन्त पी.5, डी.एम.आर. 11, उच.यू.पी. 2, जे.पी. 885, के.एफ.पी. 103, अंबिका, शुभ्रा, अपर्णा, आजाद पी4, पूसा पन्ना आदि लगाएं।
  • खड़ी फसल पर रोग का आक्रमण होने पर गंधक चूर्ण (200 मेश) 20-30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर का भुरकाव करना चाहिए।

अंगमारी (ब्लाइट)-
लक्षण:

  • तना विगलन के लक्षण गहरे भूरे रंग विक्षत के रूप में बीज के अंकुरित होने पर मिट्टी की सतह से नीचे की ओर पर शुरू हो जाते है। धीरे-धीरे जड़ में नीचे की ओर एवं तने में ऊपर की तरफ बढ़ते है।
  • पत्तियों, तने एवं फलियों पर चित्तियां पाई जाती है।
  • अधिक संक्रमण होने पर पत्तियों झुलसी हुई दिखाई देती है।
  • पत्तियों पर गहरे भूरे किनारे वाले गोल, कत्थई से लेकर भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं अथवा पाये जाते हैं।

प्रबंधन:-

  • कटाई के बाद फसल के अवशेषों को एकत्र कर जला दें, जिससे मिट्टी में जीवित रहने वाले कवक बहुत कम हो जाते हैं
  • तीन से चार वर्षीय फसल चक्र रोगजनक को कम करने में सहायक होता हैं।
  • बीज को थायरस 2.5 ग्राम दवा प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करें।

गेरूआ (रस्ट)-

इस रोग के प्रारंभिक लक्षण पौधों के हरे भागों पर पीले, गोल या लम्बे धब्बे समूहों में पाये जाते हैं। इन धब्बों पर गोल अथवा लम्बे गुच्छों में पाये जाते हैं। संक्रमण को उक्त अवस्था में यह स्फोट पत्ती पर बहुत अधिक संख्या में बनते हैं। जिससे पत्ती परिपक्व होने से पूर्व ही मुरझाकर नीचें गिर जाते हैं। फसल के पकनें की स्थिति में गहरे भूरे अथवा काले रंग के टिलीयोस्फोट पत्ती व तनों पर बनते हैं तथा वहीं विकसित होते हैं जहां यूरिडिनियम विकसित होते हैं।


प्रबंधन:

  • कटाई के बाद रोगग्रस्त फसल अवशेषों को एकत्र कर नष्ट कर दें जिससे अगली फसल पर संक्रमण बहुत कम होता है।
  • रोगयुक्त फसल से ही बीेजों का चयन बोनी के लिए करना चाहिए तथा प्रमाणित बीज ही बोना चाहिए।
  • कम से कम तीन वर्ष का फसल चक्र बिना मटर के अपनाना चाहिए।
  • बीजों की सतह पर चिपके रोग जनक के बीजाणुओं को साफ सुपर (कार्बेन्डाजिम मेन्कोजेब 2 ग्राम) या थायरस (3 ग्राम) कवकनाशी से प्रति किलो बीज की दर से उपचारित कर बोनी करनी चाहिए।
  • रोग रोधी किस्में जैसे हंस, डीएमआर 11 तथा रोग सहनशील किस्म टाइप 163 को उगाना चाहिए।
कीट प्रबंधन :-
पर्णसुरंगक-
प्रौढ़ मक्खी हल्के पाले रंग एवं गहरे धात्विक हरे रंग की होती है इसकी आंखे बड़ी एवं उभरी होती है। इल्लियां सफेद-भूरे रंग की होती हैै। इसके प्रौढ़ मादा पत्तीयों पर असंख्य छेद बनाती है। अधिक छेद होने के कारण नये कोमल पौधे मुरझाकर सूख जाते हैं तथा बड़े पौधों की पत्तियां सूख जाती है। इस कीट की इल्ली पत्ती की दोनों परतों के बीच सुरंग बनाकर हरे पदार्थ तथा क्लोरोफिल को खा जाती है। इस कारण पत्तियों में सफेद रंग की सुरंगें बन जाती है। इससे फूल तथा फली लगना काफी कम हो जाता है।
नियंत्रण:-

  • यह कीट सूखी भूमि पर अधिक सक्रिय रहता है इसलिए खेत में सिंचाई करें।
  • उचित समय पर बोनी की गई फसल में कीट का प्रकोप कम होता है। अत: समय पर बोनी अवश्य कर लेना चाहिए।
  • इसकी रोकथाम के लिए डायमिथिएट 30 ई.सी. या मिथाइल आक्सीडिमेटान 20 ई.सी. या फार्मेथियान 25 ई.सी. का 750 मि.ली. के हिसाब से छिड़कें।

 

 

 

 

फलीबेधक:-
प्रौढ़ कीट भूरे रंग का होता है। अगले पंखों के अग्र भाग में पीली-सफेद पट्टी रहती है। इस कीट की इल्ली आरंभ में पीली तथा बाद में दूधिया रंग की हो जाती है। फलियां बनने पर उनमें छेदकर बढ़ते हुए मटर के दानों को खाती है। इस कीट के नियंत्रण हेतु खरीफ फसल की कटाई के तुरंत बाद खेत की जुताई अच्ठी तरह करना चाहिए जिससे भूमि में छिपी इल्लियां तथा कोष उपर आकर नष्ट हो जाये। कीट के प्रकोप की स्थिति में कार्बोरिल 50 डब्ल्यू.पी. 2 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से 400 से 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।
माहो एवं थ्रिप्स:-


छोटे आकर वाले माहो कीट पत्तियों से चिपके रहते हैं। थ्रिप्स डोटे पतले शरीर वाले होते है। माहों कीट पौधों का रस चूसते है जिससे पत्तियां पीली पड़ जाती है एवं अधिक प्रकोप की स्थिति में सूखकर गिर जाती है। थ्रिप्स कीट के काले भूरे शिशु एवं प्रौढ़ पत्तियों व फूलों का रस चूसते हैं जिस कारण फलियां कम लगती है। इन कीेटों के नियंत्रण के लिए किसी भी कीटनाशक जैसे डायमिथिएट 30 ई.सी. 750 मि.ली. या मिथाईल आक्सीडिमेटान 20 ई.सी. 750 मि.ली. प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।

 

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