फूल गोभी में पौध संरक्षण

www.krishakjagat.org
  •  मुकेश नागर
  • हुकमराज सैनी,

email : shukamraj@gmail.com

फूल गोभी में कीट तथा रोग उसकी गुणवत्ता को हानि पहुंचाते हैं। इसके प्रमुख कीट तथा रोग व उनका प्रबंधन यहां दिया जा रहा है। फूल गोभी की फसल के साथ उगे खरपतवारों की रोकथाम के लिए आवश्यकता अनुसार निराई-गुड़ाई करते रहें चूँकि फूलगोभी उथली जड़ वाली फसल है इसलिए उसकी निराई – गुड़ाई ज्यादा गहरी न करें और खरपतवार को उखाड़ कर नष्ट कर दें।
कीट एवं प्रबंधन –
कटुआ इल्ली– यह गोभी के छोटे पौधों को रात्रि के समय बहुत नुकसान पहुचाते है। इस कीट की सुंडियां स्लेटी रंग की चिकनी होती है। व्यस्क शलभ गहरे भूरे रंग के होते है एवं सुंडियां आर्थिक नुकसान पहुँचाती है। इस कीट से लगभग 40 प्रतिशत तक नुकसान हो जाता है।
नियंत्रण – प्रकाश प्रपंच का प्रयोग व्यस्क शलभों को पकडऩे के लिए करना चाहिए। खेत में जगह-जगह अनुपयोगी पतियों का ढेर लगा कर इनमें शरण ली सुंडियों को आसानी से नष्ट किया जा सकता है। खेत के चारों ओर 20-25 से.मी. गहरी चौड़ी नाली खोद देनी चाहिए ताकि सूंडियां गिरकर एकत्र हो जायेगी और सुबह इन्हें आसानी से नष्ट किया जा सकता है।
हीरक पृष्ठ पतंगा (डाइमंड बैक मौथ) – दुनियाभर में इस कीट से गोभीवर्गीय सब्जियों को अत्यधिक नुकसान हो रहा है। इस कीट की इल्लियां पीलापन लिये हुये हरे रंग की और शरीर का अगला भाग भूरे रंग का होता है एवं व्यस्क, घूसर रंग का होता है । जब यह बैठता है तो इसके पृष्ठ भाग पर 3 हीरे की तरह चमकीले चिन्ह दिखाई देते है। इसी वजह से इसे हीरक पृष्ठ पतंगा कहते है। नुकसान पहुँचाने का काम इल्लियां करती है। जो पत्तियों की निचली सतह को खाती है और उनमें छोटे-छोटे छिद्र बना देती है। अधिक प्रकोप होने पर छोटे पौधे मर जाते है। बड़े पौधों पर फूल छोटे आकार के लगते है। इस कीट से लगभग 50-60 प्रतिशत तक नुकसान हो जाता है।
नियंत्रण – हीरक पृष्ठ शलभ के रोकथाम के लिये बोल्ड सरसों को गोभी के प्रत्येक 25 कतारों के बाद 2 कतारों में लगाना चाहिये। डीपेल 8 एल.या पादान (50 ई.सी.) का 1000 मि.ली. की दर से प्रति हेक्टेयर छिड़काव करें। स्पाइनोशेड़ (25 एस.सी.) 1.5 मि.ली.ली. या थायोडाईकार्ब 1.5 ग्रा.ली. की दर से या बेसिलस थूरीजेंसिस कुस्टकी (बी.टी.के.) 2 ग्रा.ली. के दर से 500 ग्राम प्रति हेक्टेयर के दो छिड़काव करें। छिड़काव रोपण के 25 दिन व दूसरा इसके 15 दिन बाद करें।
माहू – यह छोटे आकर के हरे पीले पंखदार व पंखविहीन कीट होते है। इस कीट के शिशु एवं व्यस्क दोनों ही पत्तियों से रस चूसते हैं। जिससे पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं। उपज का बाजार मूल्य कम हो जाता है। माहो अपने शरीर से मधु रस उत्सर्जित करते हैं जिस पर काली फफूंदी विकसित हो जाती है जिससे पौधों पर जगह-जगह काले धब्बे दिखाई देतें है। इस कीट से लगभग 20-25 प्रतिशत तक नुकसान हो जाता है।
नियंत्रण – परभक्षी कीट लेडी बर्ड बीटल (काक्सीनेला स्पी.) को बढावा दें। मैलाथियान 5 प्रतिशत या कार्बोरिल 10 प्रतिशत चूर्ण का 20 से 25 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से भुरकाव करे या मिथाइल डिमेटान (25 ई.सी.) या डाईमिथोएट (30 ई.सी.) 1.5 मि.ली./ ली. पानी में घोल कर छिड़काव करें।
तंबाकू की इल्ली – इस कीट के पतंगे गहरे भूरे रंग के व आगे के पंखों पर सफेद धारियां होती है। जिसके बीच में काले धब्बे पाये जाते है। यह पतंगें रात को बहुत सक्रिय होते हैं। प्रांरभिक अवस्था में सुंडिय़ां हरे रंग की होती है। जो पत्तों को खुरच कर खाती है। बड़ी अवस्था में सुडिय़ाँ पत्तों को गोल- गोल काट कर खाती है। गोभी के शीर्षों और गाँठों में यह सुडिय़ाँ ऊपर से घुसकर नुकसान करती है। मादा व्यस्क पत्तियों की निचली सतह में समूह में अण्डे देती है। इस कीट से लगभग 30-40 प्रतिशत तक नुकसान हो जाता है।
नियंत्रण – अण्डे के समूहों को एकत्र कर नष्ट करें। न्यूक्लियर पालीहाइड्रोसिस वायरस 250 एल.ई. हेक्टेयर की छिड़काव करें। मेलाथियान 2 मि.ली. प्रति लीटर या स्पाइानोशेड 25 एस. सी. को 15 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर की दर से 10.15 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करना चाहिए।
अर्धकुंडलक कीट (सेमीलूपर) –  यह बहुभक्षी कीट है यह चलते समय अर्धकुंडलाकार रचना बनाते हैं। इस कीट की इल्लियां हरे रंग की होती है एवं शरीर पर सफेद रंग की धारियां होती है। इल्लियां पत्तियों को खा जाती है परिणामस्वरूप केवल शिराएँ ही रह जाती है। इस कीट के आक्रमण से लगभग 30-60 प्रतिशत उपज में कमी आ जाती है।
नियंत्रण – प्रारभिक अवस्था में सुडिय़ाँ समूह में रहती है। अत: इन्हें पत्तियों समेत नष्ट कर देना चाहिए। प्रकाश प्रपंच का प्रयोग व्यस्क शलभों को पकडऩे के लिए करना चाहिए। मेलाथियान (50 ई.सी.) को 1.5 मि.ली. प्रति ली. की दर से पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए।
प्रमुख व्याधियाँ एवं प्रबंधन –
आद्र्र गलन – इस रोग का प्रकोप गोभी में नर्सरी अवस्था में होता है। इसमे जमीन की सतह वाले तने का भाग काला पड़कर गल जाता है। और छोटे पोधे गिरकर मरने लगते हैं।
नियंत्रण – बुआई से पूर्व बीजों को 3 ग्राम थाइरम या 3 ग्राम केप्टान या बाविस्टीन प्रति किलों बीज की दर से उपचारित कर बोयें। नर्सरी, आसपास की भूमि से 6 से 8 इंच उठी हुई भूमि में बनावें। मृदा उपचार के लिये नर्सरी में बुवाई से पूर्व थाइरम या कैप्टान या बाविस्टीन का 0.2 से 0.5 प्रतिशत सांद्रता का घोल मृदा मे सींचा जाता है जिसे ड्रेंचिंग कहते हैं। रोग के लक्षण प्रकट होने पर बोर्डों मिश्रण 5-5: 50 या कापर आक्सीक्लोराइड 3 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल कार छिड़काव करें।
भूरा गलन या लाल सडऩ – यह रोग बोरान तत्व की कमी के कारण होता है। गोभी के फूलों पर गोल आकार के भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। और फूल को सड़ा देते है।
नियंत्रण – रोपाई से पूर्व खेत में 10 से 15 किलो बोरेक्स प्रति हैक्टेयर की दर से भुरकाव करना चाहिए या फसल पर 0.2 से 0.3 प्रतिशत बोरेक्स के घोल का छिड़काव करना चाहिए।
तना सडऩ (स्टेम राट)- रोग की प्रारंभिक अवस्था में दिन के समय पौधे की पत्तियां लटक जाती है। और रात्रि में पुन: स्वस्थ दिखाई देती है। तने के निचले भाग पर मृदा तल के समीप जल सिक्त धब्बे दिखाई देते है। धीरे-धीरे रोगग्रसित भाग पर सफेद कवक दिखाई देने लगती है व तना सडऩे लग जाता है। इसे सफेद सडऩ भी कहते है।
नियंत्रण – बाविस्टीन 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें। डायथेन एम.45, 2.0 ग्राम व बाविस्टीन 1 ग्राम को मिलाकर 15 दिन के अन्तराल पर जब फूल बनना प्रारभ हो 3 छिड़काव करें।
काला सडऩ – इस बीमारी के लक्षण सर्वप्रथम पत्तियों के किनारों पर वी आकार में हरिमाहीन एवं पानी में भीगे जैसे दिखाई देते है। तथा पत्तियों की शिराएँ काली दिखाई देती है। उग्रावस्था में यह रोग गोभी के अन्य भागों पर भी दिखाई देता है। जिससे फूल के डंठल अन्दर से काले होकर सडऩें लगते हैं।
नियंत्रण – बीजों को बुवाई से पूर्व स्ट्रेप्टोसाइक्लिन 250 मि.ग्रा. या एवं बाविस्टीन 1 ग्राम प्रति लीटर पानी के घोल में 2 घंटे उपचारित कर छाया में सुखाकर बुवाई करें। पौध रोपण से पूर्व जडों को स्ट्रेप्टोसाइक्लिन एंव बाविस्टीन के घोल में 1 घंटे तक डुबाकर लगावें तथा फसल में रोग के लक्षण दिखने पर उपरोक्त दवाओं का छिड़काव करना चाहिए।
झुलसा या अल्टरनेरिया पानी धब्बा – इस रोग से पत्तियों पर गोल आकार के छोटे से बड़े भूरे धब्बे बन जाते है। और उनमें छल्लेनुमा धारियाँ बनती है। अन्त में धब्बे काले रंग के हो जाते है।नियंत्रण – मेंकोजेब 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।
मुलायम/नरम सडऩ (साफ्ट राट)- यह रोग पौधे की विभिन्न अवस्थाओं में दिखाई देता है। यह मुख्य रूप सें काला सडऩ रोग के बाद या फूल पर चोट लगने पर अधिक होता है।
नियंत्रण – रोग ग्रसित फूलों को तोड़कर नष्ट कर देना चाहिए, स्ट्रेप्टोसाइक्लिन 200 मि.ग्रा. व कापर आक्सीक्लोराइड 2 ग्राम प्रति ली. पानी में मिलाकर 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करना चाहिए।
काला धब्बा (ब्लेक स्पॉट)- यह कवक जनित रोग है। प्रारंभ में छोटे काले धब्बे पत्तियों पर व तने पर दिखाई देते हैं। जो बाद में फूल को भी ग्रसित कर देते हैं।
नियंत्रण – डायथेन एम 45 के 3 छिड़काव 2 ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से 15 दिन के अन्तराल पर करना चाहिए।
मृदुरोमिल (डाउनी मिल्डयू)- यह रोग पौधे की सभी अवस्थाओं में आता है व काफी नुकसान करता है। इसमें पत्तियों की निचली सतह पर हल्के बैंगनी से भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं।
नियंत्रण – रिडोमिल एम. जेड 72 एक ग्राम प्रति ली. की दर से या डायथेन एम. 45, 2.0 ग्राम प्रति ली. पानी में घोल कर 10 से 15 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करें।
जड़ गांठ (रूट रॉट)- इस रोग से पौधों की जडा़ में गोलकृमि के संक्रमण से गांठें पड़ जाती है। जिससे पौधे की वृद्धि रूक जाती हैं पत्तियों पर झुर्रियाँ पड़ जाती है। पत्तियाँ पीली व जड़े मोटी दिखाई देती है। जिससे पौधों पर फल कम संख्या में तथा छोटे लगते है।
नियंत्रण- मई-जून में खेत की गहरी जुताई कर दें। मेड़़ के चारों तरफ गेंदा के पौधे लगाना चाहिए। मई-जून में खेत की गहरी जुताई कर दें। मेड़़ के चारों तरफ गेंदा के पौधे लगाना चाहिए।
FacebooktwitterFacebooktwitter
www.krishakjagat.org
Share