सब्जी उत्पादन में कीट नियंत्रण

एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन के तरीकों की सफलता मुख्यतया हानिकारक कीट एवं मित्र कीटों की निगरानी के आधार पर कीट प्रबंधन के विभिन्न घटकों के एकीकरण कर सही निर्णय को लागू करने के ऊपर निर्भर है।

फसल चक्रअपनाकर कीट नियंत्रण-

किसी भी खेत में सब्जियों को लगाते समय उचित फसल-चक्र अपनाना चाहिए जिससे एक ही कुल की सब्जी को पुन: नहीं लगाना चाहिए। इस विधि से निरन्तर जीवन चक्र , अपेक्षाकृत संख्या एवं क्षति स्तर कम किया जा सकता है।

बुवाई व पौध रोपण के समय में परिवर्तन करके-

कीटों के प्रति फसल की मुलायम अवस्था को ध्यान में रखकर फसल की बुवाई तथा रोपाई के समय में परिवर्तन करके अधिक हानि से बचाया जा सकता है। सब्जियों की बुवाई व रोपाई के समय में परिवर्तन कर लाल भृंग कीट, फल मक्खी, तना एवं फल छेदक कीट के प्रकोप को कम किया जा सकता है। पौधों की बुवाई व रोपाई ऐसे समय में करना चाहिए, जब पौधों की नाजुक अवस्थाएं एवं हानिकारक कीटों की निष्क्रिय अवस्थाएं समानान्तर हों।

सस्य क्रियाओं द्वारा कीट प्रबंधन-

कीट प्रबंधन में इस घटक के ऊपर कोई अतिरिक्त खर्च नहीं होता है, साथ ही यह पर्यावरण को सुरक्षित व अधिक टिकाऊ बनाता है। सस्य क्रियाओं का चयन ऐसा होना चाहिए जिससे नाशीकीटों के ऊपर एकीकृत एवं मित्र कीटों के ऊपर अनुकूल प्रभाव पड़े। इसके अन्तर्गत उचित किस्मों का चयन, बुवाई एवं रोपाई के समय में परिवर्तन, कीट-प्रपंच, फसल चक्र एवं अंत: फसलों का सही चुनाव आदि शामिल है।

अवरोधी एवं सहनशील किस्मों का उपयोग-

किसी क्षेत्र के नाशीकीट एवं मित्र कीटों की विविधता एवं सघनता के आधार पर अवरोधी या सहनशील किस्मों का चुनाव समन्वित कीट प्रबंधन की महत्वपूर्ण कड़ी है। इस प्रकार चयनित किस्मों में अपेक्षाकृत कीटों का प्रकोप कम होता है तथा रासायनिक दवाओं के उपयोग में भी कमी आती है। यह विधि सबसे सरल, सस्ती व दुष्प्रभाव रहित है।


ग्रीष्मकालीन जुताई-

गर्मी के मौसम में गहरी जुताई करके सुषुप्ता अवस्था में पड़े कीड़ों को नष्ट करना एक प्रभावी नियंत्रण विधि है। फसल की कटाई के बाद खेत की गहरी जुताई करके फल मक्खी, कद्दू का लाल भृंग तथा कटुआ कीट के जीवन चक्र को नष्ट कर उनकी सक्रियता को कम किया जा सकता है।

अन्त: फसलीकरण-

सब्जियों की फसल के बीच में अन्त: फसलीकरण की क्रिया के द्वारा भी कीटों के प्रकोप को कम किया जा सकता है। अन्त: फसलीकरण में लगाए गए भिन्न-भिन्न प्रकृति के पौधों द्वारा छोड़े जाने वाले जैव रसायन से कीटों के प्रौढ़ दूर भागते हैं तथा उनके द्वारा अण्डा देने की क्रिया भी कम हो जाती है। इस प्रकार के पौध रोपण प्रक्रिया से परभक्षी एवं परजीवी कीटों की क्रियाशीलता को बढ़ाती है। टमाटर एवं गोभी की अन्त: फसलीकरण से इन दोनों सब्जियों में कीट अकेले की अपेक्षा कम लगते हैं।

कीटों को आकर्षित करने वाली फसलों का उपयोग-

मुख्य फसल के साथ ऐसी फसलों को लगाना चाहिए, जिनको कीट मुख्य फसल की अपेक्षा अधिक पसंद करते हैं। आकर्षित करने वाली फसलों को मुख्य फसल में लगाकर बिना किसी रसायन के प्रयोग से मुख्य फसल को आसानी से कम लागत में उगाया जा सकता है। क्योंकि मुख्य फसल पर लगने वाले कीड़े आकर्षक फसलों पर आ जाते हैं, जिनको आसानी से नष्ट किया जा सकता है। गोभीवर्गीय फसलों को हरी सूड़ी एवं पर्ण जालक कीट के नियंत्रण के लिए सरसों का तथा टमाटर में लगने वाली फल छेदक कीट के रोकथाम के लिए गेंदे के फसल को आकर्षक फसल के रूप में प्रयोग करना चाहिए।

सब्जी में जैविक विधि से कीट नियंत्रण-]

समन्वित कीट प्रबंधन में जैविक नियंत्रण एक प्रमुख घटक है। किसी भी परिस्थिति में मित्र कीट एवं अन्य सूक्ष्म जीव मुख्यतया हानिकारक कीटों की संख्या को प्राकृतिक रूप से सीमित रखने में सहायता करते हैं। जैविक नियंत्रण से इन्हीं कारकों का प्रभावी ढंग से समन्वित कीट प्रबंधन में प्रयोग होता है, तथा मित्र कीटों को सुरक्षित रखने का प्रयास किया जाता है। बहुत सारे परभक्षी व परजीवी कीट प्राकृतिक दशा में मित्र कीट के रूप में पाये जाते हैं, जो हानिकारक कीटों के विभिन्न अवस्थाओं को क्षति पहुंचाते हैं। एक हेक्टेयर टमाटर की फसल को फलछेदक कीट से रोकथाम के लिए 2,50,000 ट्राइकोग्रामा परजीवी कीट का प्रयोग किया जाता है। इसी प्रकार क्राइसोपरला कारनिया नामक परभक्षी कीट को 50,000 प्रति हेक्टेयर की दर से दस दिन के अन्तराल पर तीन बार छोडऩे से सफेद मक्खी, हरा फुदका, माहू आदि से फसल को सुरक्षित रखा जा सकता है। कीटों के प्राकृतिक षत्रु को प्रयोगशाला में अधिक संख्या में उत्पादन कर, उसे सफलतापूर्वक, आवष्यकतानुसार फसलों पर छोड़कर विषैले रसायनों के उपयोग में कमी लायी जा सकती है।

सूक्ष्म जीव द्वारा फसलों की सुरक्षा-

सूक्ष्म जीव कीटनाशियों के अन्तर्गत जीवाणु, कवक और विषाणु का प्रयोग करके हानिकारक कीटों में रोग उत्पन्न कर उनका नियंत्रण किया जा सकता है। यह रोग हानिकारक कीड़ों में महामारी की तरह फैलता है जिससे कीड़े मर जाते हैं। सूक्ष्म कीटनाशियों में बी.टी. का प्रयोग व्यवहारिक स्तर पर किया जा रहा है। जिसके प्रयोग से गोभी का हीरक पृष्ठ कीट, भिण्डी का तना एवं फल छेदक कीट, टमाटर का फल बेधक कीटों का नियंत्रण संभव हुआ है।

यांत्रिक विधि से कीटों का नियंत्रण-

कुछ कीट जिनको आसानी से देख जा सके उन्हें पकड़कर मार देना चाहिए। हड्डा बीटल, तम्बाकू की सूड़ीं के अण्डे तथा तना व फल को भेदकर खाने वाली सूड़ीं (बैगन व भिण्डी के फल छेदक कीट) को बहुत आसानी से देखकर कीट की विभिन्न अवस्थाओं को नष्ट कर देने से इनसे होने वाली क्षति से बचा जा सकता है। कीट नियंत्रण की इस विधि में लागत कम आती है एवं यह विधि सुरक्षित भी है।

व्यवहारिक नियंत्रण-

इस विधि के अन्तर्गत प्रौढ़ कीटों को फेरोमोन का प्रयोग कर भ्रमित किया जाता है। सब्जियों में मुख्य रूप से बैगन का तना व फल बेधक, तम्बाकू की सूंड़ी, टमाटर का फल बेधक एवं फल मक्खी को फेरोमोन द्वारा आकृष्ट कर नियंत्रण किया जा सकता है।
रसायनों का सुरक्षित एवं आवश्यक मात्रा का प्रयोग- रसायनों का अनियमित और अत्यधिक प्रयोग करने से कीटों में प्रतिरोधी क्षमता का विकास हो जाता है। साथ ही हानिकारक रासायनिक अवशेषों की वातावरण में वृद्धि होती है। समन्वित कीट प्रबंधन में यदि दूसरे कारकों के साथ सही संतुलन बनाकर सुरक्षित रसायनों की सही मात्रा एवं उचित अंतराल पर छिड़काव किया जाय तो कीटनाशी रसायन बहुत प्रभावी होता है। विभिन्न कीटनाशियों का अलग-अलग प्रतीक्षाकाल होता है। इसलिए दवा छिड़कने के बाद प्रतिक्षाकाल के बाद फल की तुड़ाई करने से रासायनिक अवयवों के अवषेष नहीं रहते हैं।

  • डॉ. अजय कुमार सिंह
  • ओंकार सिंह

www.krishakjagat.org
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