कद्दूवर्गीय सब्जियों में कीट व रोग नियंत्रण

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कुष्मांडकुल को कद्दूवर्गीय सब्जियों के नाम से भी पुकारा जाता है। इस कुल की सभी सब्जियों का उपयोग आहार के रूप में किया जाता है अधिकांश कद्दूवर्गीय सब्जियों का उत्पत्ति स्थान भारत हैं। इस वर्ग की सब्जियों में खीरा, ककड़ी सलाद के रूप में, खरबूजा, तरबूज पके फल के रूप में, लौकी कद्दू, तुरई, टिण्डा, करेला आदि सब्जी के रूप में तथा पेठा, परवल मिठाई के रूप में सुरक्षित कर उपयोग में लाया जाता है। कद्दूवर्गीय सब्जियों में कीट व रोगों का प्रकोप भी बहुत होता हैं। इनके कारण कई बार पूरी फसल ही खराब हो जाती हैं। जिससे बहुत हानि से सामना करना पड़ता है। अत: इनका समय पर ही नियंत्रण कर लेना चाहिए। कद्दूवर्गीय सब्जियों में लगने वाले कीट व रोगों का विस्तार से उल्लेख किया गया है।

कीट
लाल भृंग – यह कीट इस कुल की सब्जियों का कीट है जो उनकी प्रारंभिक अवस्था में बहुत हानि पहुंचाता है यह कीट नवजात पत्तियों की शिराओं के बीच के भाग को खाकर उनमें छेद कर देता है। यह कीट उड़कर एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचता है। बसंत ऋतु आते ही इनका प्रकोप बढ़ जाता है। इस कीट की सुंडियां जमीन में रहती हैं। तथा पौधे के तने व जड़ों को खाती है।
नियंत्रण:

  • अगेती बुआई से इस कीट का प्रकोप कम होता है।
  • जड़ों के पास 3-4 से.मी. गहराई पर कार्बोफ्यूरान 3 जी दाने की 7 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से मिलाएं।
  • अधिक प्रकोप होने पर 25 किग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से कार्बोरिल 1.5 प्रतिशत चूर्ण या मेलाथियान 5 प्रतिशत चूर्ण का भुरकाव करें।
  • फसल कटाई के बाद गहरी जुताई करें।

बरुथी (माइटस) – पत्तियों की निचली सतह पर रहकर रस चूसती हैं। इससे पत्तियों पर सफेद धब्बे बन जाते हैं जो बाद में भूरे रंग के हो जाते हैं।
नियंत्रण:

  • नीम की निम्बोली के 5 प्रतिशत सत्व का छिड़काव करे।
  • नीम आधारित कीटनाशक जैसे निर्माक 0.5 प्रतिशत या रीपेलिन 1.0 प्रतिशत या मर्गोसाइड 0.1 प्रतिशत का छिड़काव करें।
  • डाइकोफाल 0.04 प्रतिशत का छिड़काव करें।

फलमक्खी (फ्रूट फ्लाई) – यह कीट भी इस कुल की सब्जियों को हानि पहुंचाता है। यह मक्खी स्वयं नुकसान न पहुंचाकर इसकी लटें फलों के अंदर के गुदे को खाकर नुकसान पहुंचाते हैं जिसके फलस्वरूप फल सडऩे लगते हैं। यह प्रौढ़ मक्खी अपने अंडे ओवीयोजिटल (पिछले भाग की मदद से फलों में छेद कर गूदे में अंडे देती हैं। तथा बाहर से इन छेदों को एक लसदार पदार्थ से वापस बंद कर देती हैं। अंडों से 3-5 दिन में सुंडियां (मेगट्स) बनकर फलों को नुकसान पहुंचाती है जिससे फल सडऩे लगते हैं और नीचे गिर जाते हैं इसके बाद यह सुंडियां फलों से निकलकर जमीन में चली जाती हंै तथा यहां पर अपनी प्यूपा अवस्था से गुजरती हैं कुछ दिनों बाद इनमें से वयस्क निकल आते हैं। तथा अंडे देना शुरू कर देते हैं।
नियंत्रण:

  • मादा मक्खियों को आकर्षित करने के लिये विषैला प्रलोभक खाना बनाने के लिए एक लीटर पानी में 1.5 मिली मिथाइल यूजीनाल तथा 2 मिली डाइक्लोरो मिलाकर खुले बर्तनों में फल आने के समय खेत में रख दें तथा हर 15 दिन के अंतराल इसे बदलते रहना चाहिए।
  • नीम की निम्बोली के 5 प्रतिशत तत्व का घोल बनाकर छिड़काव करें।
  • इससे नियंत्रण नहीं हो पाने पर 1.25 लीटर मेलाथियान 50 ई.सी. तथा 12.5 कि.ग्रा. गुड या चीनी को पानी में मिलाकर प्रति हेक्टर छिड़काव करें।
  • फसल बोने से पहले एवं काटने के बाद गहरी जुताई करें।
बीमारियां – 
तुलासिता (डाउनी मिल्ड्यू) – 

यह बीमारी स्यूडोमेरोनोस्पोरा क्यूवेन्सिस फफूंद से होता है इस रोग के प्रकोप से इस कुल की सब्जियों की पत्तियों के नीचे की सतह पर फफूंद सी जम जाती है तथा ऊपरी सतह पर पीले-पीले धब्बे बन जाते हैं।
नियंत्रण:

  • 25 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से गंधक चूर्ण का भुरकाव करें।
  • केराथेन 1 मिली प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करें।
  • एन्थ्रेक्नोज या झुलसा रोग – यह कोलेटोट्राइकम लेजिनेरियम द्वारा उत्पन्न होता है। झुलसा रोग के प्रकोप से पत्तियों पर भूरे रंग के छल्लेदार धब्बे बन जाते है जो प्रकोप के साथ बढ़ते हैं।

छाछ्या (पाउडरी मिल्ड्यू) – यह रोग एरिसाइकी सिकोरेसियरम और स्मीरोबिका फ्यूलियजेना नामक फफूंद से होता है। इस रोग के कारण कद्दूवर्गीय सब्जियों की बेलों की पत्तियों पर तथा अधिक प्रकोप होने की स्थिति में डंठलों व फलों तक पर सफेद चूर्ण सा जमा हो जाता है।

फल भी कमजोर हो जाता है तथा पैदावार कम हो जाती हैं।
नियंत्रण:

  • नियंत्रण हेतु मेन्कोजेब या जाइनेब या थाइरम 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करें। आवश्यकता पडऩे पर पंद्रहवें दिन इसे दोहराएं।

जड़ ग्रन्थी रोग (सूत्रकृमि) –  यह रोग मेलाइडोगाइन जवनिका, मेलाइडोगाइन इन्काग्निटा सूत्रकृमि से होता है। लगातार उसी खेत में कुष्मांड कुल की सब्जियां लेते रहने से इसका विस्तार अधिक होता है। इससे पौधों की पत्तियां पीली होकर झुलसने लगती हैं का रंग पीला पडऩे लगता है। जड़ों में छोटी – छोटी गांठें पड़ जाती हैं।
नियंत्रण:

  • गर्मियों में गहरी जुताई करें तथा फसल की जड़ों के अवशेषों को इकट्ठा करके जला दें।
  • सब्जियों के साथ बीच-बीच में गेंदा के पौधों की कतार से सूत्रकृमि का प्रकोप कम हो जाता है। तथा फूलों की अतिरिक्त आमदनी होती है।
  • खेत तैयार करते समय 200 कि.ग्रा. प्रति हेक्टर के हिसाब से नीम, करंज या महुआ की खली डालें।
  • अधिक प्रकोप होने पर कालोफ्यूरान 1-2 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व (25 कि.ग्रा. फ्यूराडान) प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई पूर्व खेत में डालकर मिट्टी में मिला दें।
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