बेर फल वृक्षों में छत्र प्रबंधन

यद्यपि बेर की खेती कम प्रचलित है तथा व्यवसायिक रूप से यह कम महत्वपूर्ण फल है किन्तु उपोषण क्षेत्रों के शुष्क भाग की सीमान्त मृदा में यह अच्छी तरह से उगता है।

  • बेर के पौधे को खेत में लगाने के बाद इसे शुरुआत से ही उध्र्वाकार सपोर्ट देना जरुरी होता है पेड़ के 80 से 90 से. मी. ऊँचाई तक प्ररोह को नहीं निकलने देना चाहिए।
  • पेड़ के ऊपरी सिरे की ऊँचाई अन्य फल वृक्षों की तुलना में ज्यादा रखना चाहिए ताकि शाखाओं को जमीन पर फैलने से बचाया जा सके इस ऊँचाई के बाद उचित दूरी पर 4-5 प्ररोहों का चयन मुख्य आधार शाखा बनने के लिया छोड़ देना चाहिए।
  • रोपण के बाद अगले 2-3 वर्षो में पेड़ को एक सशक्त संरचनात्मक आधार देते हैं इसके बाद मार्च क्ले दौरान पुराने प्ररोहों को काटकर नए शक्तिशाली प्ररोहों की वृद्धि हेतु कलम बंद के ऊपर एक-दो गांठें ही छोड़ी जाती है।
  • एक सीधे पुष्ट ऊपर की ओर निकलने वाली कोपल या प्ररोह को मुख्य तने में विकसित होने के लिए कायम रख जाता है तथा जमीं स्तर से 30 सेन्टी मीटर ऊँचाई तक किसी भी तरह द्वितीयक शाखाओं को नहीं पनपने दिया जाता है।
  • कटाई (हेड बैक) उपरांत मुख्य तने पर उचित दूरी और उचित प्रकार से व्यवस्थित 3-4 मुख्य शाखाओं को बढऩे दिया जाता है। दूसरे वर्ष भी इन मुख्य शाखाओं को काटा जाता है तथा प्रत्येक शाखा पर 3-4 द्वितीयक शाखाओं को ही रहने दिया जाता है। इस प्रक्रिया को तृतीयक शाखा विकसित करने के लिए जारी रखते हैं।
    ‘एक उद्र्धवाकार वृक्ष तैयार करने के लिए प्रत्येक चरण में बढ़ते कोपलों को छोड़ा जाना चाहिए। एक गाँठ पर एक से ज्यादा उध्र्वाकार प्ररोह न रखे जाये ताकि सकरे क्रोचेज से बचा जा सके। वृक्ष के मूल ढांचे को बनाये रखने के लिए जब भी तने के वाटर शूट्स (जल प्ररोह) निकले तो उन्हें हटा दिया जाना चाहिए। यदि पेड़ की संरचना में परिवर्तन करना हो तो उसे वार्षिक छटाई करते समय निकाल दिया जाना चाहिए।
    ‘नए स्वस्थ कोपलों को अधिक संख्या में प्रेरित करने के लिए बेर में अधिक छटाई जरुरी है क्योंकि नई कोपलों पर अच्छे फल लगते हैं। यह जरूरी है की शाखाओं के मकडज़ाल से बचने अच्छी वृद्धि तथा अधिकतम फलों कि प्राप्ति के लिए अवांछनीय कमजोर परस्पर टकराने वाली। रोग ग्रस्त तथा टूटी टहनियों को हटा दिया जाये।
    ‘गर्म और शुष्क मौसम के दौरान उस समय छंटाई कि जानी चाहिए जब वृक्षों के पत्ते गिर रहे हो और उनकी प्रसुप्त अवस्था आने बाली हो। तमिलनाडु में बेर के वृक्षों कि छंटाई जनवरी से अप्रैल के दौरान की जाती है। महाराष्ट्र में छंटाई कार्य को अप्रैल के अंत तक अवश्य ही पूरा कर लेना चाहिए जबकि हरियाणा में इस कार्य को मई के अंत तक पूरा कर लेना चाहिए। छटाई के समय और इसकी तीव्रता विभिन्न स्थानों में अलग-अलग होती है। सामान्य रूप से लगभग 25 कलियों की हल्की छंटाई बेहतर है। तदापि अधिक संतुलित मौसम में 15-20 कलियों की छंटाई की जानी चाहिए।
    ‘सभी दुतियक कोपलों को पूरी तरह से हटा दिया जाये। कई वर्षो तक हलकी छटाई के कारण लम्बे प्ररोहों तथा अनुत्पादक मूल हिस्सों को उभरने से रोकने के लिए पिछले वर्ष के आधे प्ररोहों को छांट कर उन्हें 20 कलियों तक सीमित करके आधार पर उपस्तिथ एक या दो गांठों पर बची आधी कलियों को रहने दिया जाय। ‘छंटाई से दो दिन पहले 3 प्रतिशत थायो यूरिया या पोटेशियम नाइट्रेट के एक छिड़काव से अधिकतम गांठो में शीघ्र अंकुरण होता है।

 

  • श्याम सिंह धाकड़
  • डॉ. डी. के सरोलिया
  • शिवेंदु प्रताप सिंह
  • डॉ. री.कौशिक
    email : shyamsingh.mau@gmail.com

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