अधिक पैदावार में सहायक सोयाबीन के अंग

पौधों में विभिन्न प्रकार की शारीरिक क्रियायें होती हैं जिनकी वजह से ही पौधों में बीज अंकुरण से लेकर पौधों की वृद्धि होती है एवं उन पर पत्तियों, पुष्प एवं फलियों का विकास होता है जो अन्तत: सोयाबीन की पैदावार में सहायक सिद्ध होते हैं। पौधों में इन विभिन्न शारीरिक क्रियाओं के लिए विभिन्न पोषक तत्व एवं अनुकूल वातावरण की भी आवश्यकता होती है जो इन शारीरिक क्रियाओं के परिचालन में अहम भूमिका निभाते हैं। सोयाबीन की अच्छी पैदावार में कौन से पादप भाग अत्यंत जरूरी हैं एवं उनका विकास कैसे होता है इसकी जानकारी इस लेख के द्वारा किसानों को दी जा रही है।

जड़ : किसी भी पौधों की तरह सोयाबीन में भी जड़ एक प्रमुख भाग है जो न केवल पौधों को स्थिरता प्रदान करती है अपितु सोयाबीन की जड़ों में विद्यमान ग्रन्थियों में उपस्थित जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन को पौधों को उपलब्ध कराते हैं। स्वस्थ जड़ों वाले पोधे की वायुमंडलीय नाइट्रोजन अवशोषित करने की क्षमता अधिक होती है। मिट्टी के ज्यादा सघन होने, ज्यादा पानी होने या सूखा होने पर जड़ों की वृद्धि रुक जाती है। क्योंकि सघन एवं अधिक नमी वाली मिट्टी में आवश्यक पोषक तत्वों की कमी हो जाती है एवं विषाक्त रसायनों की अधिकता होती है। साथ ही अधिक नमी की वजह से मिट्टी में ऑक्सीजन की भी कमी हो जाती है। इन सभी कारणों से जड़ वृद्धि नहीं हो पाती है और जड़ें भी अधिक गहराई तक नहीं पहुँच पाती है जिसका की पौधों के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। बोवनी के समय सही मात्रा में उर्वरक देना जड़ों एवं जड़ ग्रंथियों के विकास के लिए अच्छा होता है जो की आगे जाकर पौधों को स्वस्थ बनाये रखता है। जड़ की ग्रन्थियों में जीवाणु 20 से 22 से.मी. पर ही बनते हैं। जड़ों में जीवाणु संवर्धन के लिए बोवनी से पहले बीजों को राइजोबियम कल्चर से उपचारित करना अच्छा होता है। राइजोबियम कल्चर से उपचारित बीज से बने पौधे में जड़ की ग्रन्थियां जल्दी एवं अधिक संख्या में बनती है।
फूल : सोयाबीन के पौधे पर फूल बनने की प्रक्रिया अच्छी उपज पाने के लिए महत्वपूर्ण है। फूल पतियों के ऑक्सिल में लगते हैं। सोयाबीन में फूलहमेशा मुख्य तने के तीसरे से सातवे नोड (गांठ) पर लगना शुरू होते हंै और फिर ऊपर एवं नीचे की गांठ (नोदेस) पर लगते है। प्रत्येक गांठ पर कई पुष्प लगते है। इस अवस्था के दौरान पत्तियों के झडऩे एवं जड़ों की वृद्धि प्रभावित होने पर इसका सीधा प्रभाव पुष्पन एवं पैदावार पर पड़ता है। अत: इस समय पौधे को पूर्ण नमी मिलते रहना बहुत ही जरुरी है। पूर्ण पुष्पावस्था पर पौधे की लम्बाई 17 से 22 इंच की हो जाती है। इस अवस्था में जड़ें पूर्ण रूप से गहराई में चली जाती हैं एवं नाइट्रोजन का स्तरीकरण करने लगती है। इस अवस्था के दौरान बीमारी, कीड़े लगने या तेज हवा या तेज बारिश से पत्तियां झर सकती है जिससे पैदावार भी प्रभावित होती है। फूल बनाने की शुरुआत होना एक बहुत ही संवेदनशील अवस्था होती है, फूल आने की शुरुआत करने के लिए पौधों की पत्तियां पहले सही वातावरणीय और अंतर्जात कारकों की पहचान करती है एवं अनुकूल अवस्था आने पर ऊपरी शीर्ष विभज्योतक (एसएएम) को संकेत भेजती है जिसका की आगे जा कर प्रजनन विभज्योतक के रूप में विकास होता है। पर्यावरणीय कारक सोयाबीन पर फूलों की शुरूआत होना और सही संख्या में फूल आना फोटोपॉरिओड या दिन और रात की अवधि पर निर्भर करता है। सोयाबीन एक अल्प सूर्य अवधि पौधा है। इनको अपेक्षाकृत कम छोटे दिन (8-10 घंटें) और लम्बी रात की (14-16 घंटे) की आवश्यकता होती है। यह अत्यधिक प्रकाश अवधि संवेदनशील है और देरी से बोए गए सोयाबीन में कम उपज आने का यह मुख्य कारण होता है। फेटोक्रोम यौगिक जो की पौधों में दो आइसोफॉर्म में पाया जाता है। यह दिन की लंबाई में परिवर्तन को नापने के लिए सेंसर के रूप में कार्य करता है और फ्लोरिजन हार्मोन को संश्लेषित करके विभज्योतक क्षेत्र में फूल बनता है। फ्लोरिजन पौधों में फूलों की कलियों के बनने को प्रेरित करता जिससे की आगे जाकर फूल का विकास होता है।

किसान भाईयों सोयाबीन में आवशयक भोज्य पदार्थ पतियों के अलावा फलियां भी बनाती है जो कि बीजों में एकत्रित हो कर पैदावार बढ़ाते है। अत: ये जरूरी है की बीजों के भराव के समय पतियों एवं फलियों में होने वाली प्रकाश संश्लेषण क्रिया के लिए आवश्यक कार्बन डाइऑक्साइड गैस, पानी एवं सूर्य के प्रकाश का होना अति आवश्यक है। साथ ही जड़ों में ग्रंथियों का बनना भी जरूरी है जो की वायुमंडलीय नाइट्रोजन को पौधों के लिए उपलब्ध कराती है।

पत्तियां : अन्य पौधों की भांति ही सोयाबीन में भी पत्तियों का प्रमुख योगदान रहता है जो पौधों के लिए भोज्य पदार्थ बनाने की फैक्ट्री का काम करती है। सोयाबीन में पत्तियां तीन-तीन के समूह में लगती है और इन्ही पत्तियों के ऑक्सिल (ध्रुव) में पुष्प लगते है और ये ही पुष्प बाद में फलियां बनाते है। साधारणतया सोयाबीन में 17-22 नोड (गांठ) होती है और प्रत्येक नोड पर एक त्रिपत्रक पत्ती होती है। जिनमें से 11 से 17 तक पत्ती के ऑक्सिल पर पुष्प एवं फलियां लगते है। पत्तियों का हरा रंग पत्ती में क्लोरोफिल की उपस्थिति के कारण होता है। पत्ते जो गहरे हरे रंग के होते हैं और अधिक मोटाई के होते है उनमें क्लोरोफिल अधिक पाया जाता है। इन्हीं हरी पत्तियों में प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया से भोजन बनता है एवं किसी भी पत्ते की प्रकाश संश्लेषण की क्षमता सीधे पत्तियों में मौजूद क्लोरोफिल की मात्रा से संबंधित होती है। पौधों में प्रतिकूल स्थिति जैसे पानी के तनाव, उच्च तापमान, पोषक तत्व की कमी जैसे की नाइट्रोजन, आयरन इत्यादी, पीलामोजेक वायरस इत्यादि से आने वाला पीलापन पत्तियों में क्लोरोफिल के टूटने के कारण होता है। पीलेपन के कारण पौधों की प्रकाश संश्लेषण क्षमता कम हो जाती है जिससे की आगे जा कर उपज प्रभावित होती है। समय पर दी गयी संतुलित खाद, पानी की उपलब्धता एवं बीमारियों से बचाव पत्तियों को स्वस्थ बनाता है जिसका की पौधे की वृद्धि एवं पैदावार पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। प्रकाश संश्लेषण के अलावा पत्तियां पोषक तत्वों को पौधे के दूसरे भागों में भेज कर अपना कार्य पूरा कर जाती है। पत्तियों से ही आगे जाकर फली एवं बीजों के विकास के लिए भोज्य पदार्थ एवं आवश्यक पोषक तत्व मिलते है।
फलियों के विकास के बाद सोयाबीन की पत्तियां झर जाती है। अगर पौधे से फली एवं बीज हटा दें को पतियाँ हरी बनी रहती है। शोध के अनुसार अगर किसी कारण वश लगभग 25 प्रतिशत तक पतियाँ झडऩे का पैदावार पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है।
फलियां एवं बीज भराव :
अच्छी पैदावार पाने के लिए फसल का शुरुआत से ही सही प्रबंधन जैसे की बीज की दर, पोषक तत्वों, खरपतवार प्रबंधन, अनुशंसित पैकेज का पालन करना अत्यंत आवश्यक है। पौधे की आर 3 अवस्था में फली की वृद्धि शुरू हो जाती है और इस अवस्था तक मुख्य तने पर 11 से 17 गांठें बन जाती है। इस अवस्था के दौरन मौसम की विपरीत परिस्थितियों का असर फलियों की संख्या, फली में बीजों की संख्या एवं बीज के आकार पर पड़ता है जो पैदावार को प्रभावित करते है। पौधे की आर 4 अवस्था में फलियों का विकास तेजी से होता है और इसमें बीज भी तेजी से बनने लगते है। अन्य अवस्थाओं की अपेक्षा इस अवस्था पर विपरीत परिस्थितियों का प्रभाव ज्यादा होता हैं और पैदावार भी 80 प्रतिशत तक कम हो जाती है। फली में बीज बनते समय बीज भराव के लिए आवश्यक भोज्य पदार्थ पत्तियों एवं स्वयं फली से ही मिलता है। पतियों की भांति फलियों में विद्यमान हरितलवक एवं रंद्रों की वजह से ही प्रकाश संश्लेषण की क्रिया होती है। प्रतिकूल परिस्थितिया जैसे की सूखे में पौधों में प्रकाश संश्लेषण में कमी आती है और बीज सिकुड़े रह जाते है।
उच्च तापमान पर बीज भरने की अवधि कम हो जाती है जो की बीज के वजन में कमी लाता है और अन्तत: उपज को कम करता है।
  • महाराज सिंह
  • शिवानी नागर
    भारतीय सोयाबीन अनुसन्धान संस्थान, इंदौर
    email : ms_drmr@rediffmail.com

www.krishakjagat.org

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