किसान की आमदनी नहीं, लागत दोगुनी होगी

डीजल कीमतों में आग से

(विशेष प्रतिनिधि)
भोपाल। देश एवं प्रदेश में डीजल-पेट्रोल की आसमान छूती कीमतों ने मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सरकार जितने भी कृषक हितैषी कार्यक्रम एवं योजनाएं चला रही है जिससे 2022 तक किसान की आमदनी दोगुनी करने का सपना पूरा होगा। उसमें पलीता लग सकता है। आमदनी दोगुनी तो नहीं, लागत अवश्य दोगुनी होने की संभावना है। खरीफ तो जैसे-तैसे निकल गया परन्तु आगामी रबी में किसान की लागत का क्या होगा? सरकार एक तरफ दावा कर रही है कि किसानों की लागत कम हो रही है वहीं दूसरी तरफ डीजल की बढ़ती कीमत ने किसानों की लागत बढ़ा दी है। क्योंकि किसान को पेट्रोल से ज्यादा डीजल जरूरी है। खेत तैयार करने से लेकर फसल कटाई तक डीजल का उपयोग किया जाता है। इसी रफ्तार से यदि पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ेंगी तो आमदनी दोगुनी करना तो दूर आम जनता भी मंहगाई की चपेट से उबर नहीं पाएगी।

चुनावी वर्ष में म.प्र. सरकार के लिए भी डीजल में बेतहाशा वृद्धि अच्छा संकेत नहीं है। राजधानी भोपाल में 76 रुपए लीटर डीजल बिक रहा है। वहीं पेट्रोल की कीमत 85 रु. 80 पैसे प्रति लीटर हो गई है। प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान किसानों की आय में इजाफा करने के लिए भावांतर, कृषक समृद्धि, प्रोत्साहन योजना सहित कई अन्य उपाय कर रहे हैं परन्तु डीजल की बढ़ती कीमतें लागत बढ़ा रही है। देश में अगले वर्ष लोकसभा चुनाव होने वाले हैं, इसके बावजूद डीजल की कीमतों में आग लगी हुई है। राजधानी दिल्ली में वर्ष 2003 में डीजल 32.49 रुपए प्रति लीटर था, जो वर्ष 2014 में 71.51 रुपए प्रति लीटर हो गया तथा अब 2018 में (7 सित.) 72.07 रुपए प्रति लीटर हो गया है।

कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक डीजल के कारण रबी फसलों पर विपरीत असर पडऩे की संभावना है क्योंकि एक हेक्टेयर के खेत की जुताई में लगभग 180 लीटर डीजल लगता है इसके पश्चात सिंचाई के लिए पंप सेट में डीजल, थ्रेशर चलाने के लिए ट्रैक्टर में डीजल तथा मंडी तक फसल लाने ले जाने में भी ट्रैक्टर एवं ट्रक का प्रयोग किया जाता है। अधिकांशत: खेती में अब ट्रैक्टर का प्रयोग बढ़ रहा है ऐसे में डीजल की बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाना आवश्यक है अन्यथा लागत बढ़ेगी और किसान को हासिल होगा जीरो।

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