दूध उत्पादक के नये कीर्तिमान

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भारत दूध उत्पादन में विश्व का सबसे अग्रणी देश बन गया है। वर्ष 2016-17 में देश में 1637 लाख टन दूध का उत्पादन हुआ। जिसकी कुल कीमत चार लाख करोड़ रुपयों से भी अधिक है। दूध के अतिरिक्त भारत गेहूं तथा चावल के उत्पादन में भी विश्व में प्रथम स्थान पर पहुंच गया है। यह भारतीय कृषि तथा पशुपालन के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि है।
दूध उत्पादन में राजस्थान देश में उत्तर प्रदेश के बाद दूसरे स्थान पर पहुंच गया है। राजस्थान का दूध उत्पादन 139.4 लाख टन तक पहुंच गया है। जबकि सबसे अधिक दूध उत्पादक उत्तर प्रदेश प्रति वर्ष 233.3 लाख टन दूध उत्पादित कर रहा है। वर्ष 2001-02 में राजस्थान में दूध का उत्पादन मात्र 77.5 लाख टन था जो पिछले 15-16 वर्षों में अब लगभग दुगना हो गया है जो एक बड़ी उपलब्धि है। राजस्थान 15 से अधिक सहकारी समितियों के माध्यम से दूध उत्पादित कर रहा है। बीकानेर जिला दूध उत्पादक सहकारी संघ लि. प्रतिदिन 90 हजार लीटर दूध का संग्रहण करता है। इस क्षेत्र में थारपरकर जाति जो मूलत: पाकिस्तान के थारपारकर जिले से है का उत्पादन लिया जाता है।
मध्य प्रदेश का दूध उत्पादन में छटवां स्थान है। वर्ष 2013-14 में प्रदेश में लगभग 99.99 लाख टन दूध का उत्पादन हुआ जो कि देश के कुल दूध उत्पादन का लगभग 6 प्रतिशत है। वर्ष 2001-02 में प्रदेश में दूध उत्पादन मात्र 52.83 लाख टन था। पिछले 13-14 वर्षों में इसमें 47.16 लाख टन की वृद्धि हुई है जो सराहनीय है। प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में पशुधन की विभिन्न स्थानीय जातियों से दूध उत्पादन लिया जा रहा है। प्रदेश में दूध क्षेत्र में साथ सहकारी समितियां कार्य कर रही हैं जो प्रदेश के अधिकांश दूध का संग्रहण कर रही हैं। यह सभी समितियां मध्य प्रदेश राज्य को-ऑपरेटिव डेयरी फेडरेशन लि. के अन्तर्गत कार्य कर रही हैं।
मध्य क्षेत्र के तीसरे प्रमुख प्रदेश छत्तीसगढ़ में दूध का प्रतिवर्ष उत्पादन मात्र 12.09 लाख टन हो रहा है। जबकि वर्ष 2001-02 में यह 7.95 लाख टन था।
इस समय देश में लगभग 19 करोड़ दुधारू पशु हैं जो कि विश्व के कुल दुधारू पशुओं का 14 प्रतिशत है। लगभग 80 प्रतिशत पशु स्थानीय जातियों के हैं। इनमें अधिकांश पशुओं की जाति निश्चित नहीं की जा सकती है। पिछले कई दशकों से विदेशी जातियों से संकरण कर दूध उत्पादन के प्रयास किये गये हैं परन्तु उनसे कोई आधारभूत परिणाम प्राप्त नहीं हुए हैं। अब आवश्यकता है कि हम राष्ट्रीय गोकुल मिशन के उद्देश्य से स्थानीय जातियों की सुरक्षा करें तथा उनके फैलाव के लिए कार्य करें। इसके लिए गायों की लाल सिन्धी, साहीवाल व गिर जातियों के साथ-साथ क्षेत्र विशेष का कुछ स्थानीय जातियों को प्रोत्साहित किया जा सकता है। यदि राष्ट्रीय गोकुल मिशन सफल हो जाता है तो अगले दस वर्षों में देश दूध उत्पादन के नये कीर्तिमान स्थापित करेगा।

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