पशु संरक्षण द्वारा फसलों के उजडऩे एवं सड़क दुर्घटनाओं को रोकने की आवश्यकता

देश में गौ संरक्षित करने, गौ हत्या रोकने एवं गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग आजादी से पूर्व की है। देश के राजनैतिक दलों ने भी इस मुद्दे को लेकर लम्बी राजनैतिक पारी खेली है। आचार्य विनोबा भावे से लेकर अनेकों संतों ने इस विषय में जन-जागरण के लिये अनशन तक किये हैं। लेकिन बावजूद हालात जस के तस ही हैं। गाय सहित पालतू पशुओं का संरक्षण अब तक नहीं हो सका है। पशु पालकों के मानवीय मूल्य सिर्फ गाय के दूध दोहन एवं पालतू पशुओं की मात्र उपयोगिता तक ही सीमित होकर रह गये हैं। पालतू पशुओं के अनउपयोगी होते ही, पशुपालकों द्वारा उन्हें लावारिश हालत में सड़को पर छोड़ा जा रहा है। प्रति वर्ष हजारों की तदाद में लावारिश छोड़े जा रहे यह पशु गांव एवं शहरों की सड़कों पर अपना डेरा बना रहे हैं। किसानों की फसलों को उजाड़ रहे हैं। अकेले मप्र की नेशनल एवं स्टेट हाइवे पर होने वाली दुर्घटनाओं का आकलन करें तो प्रत्येक दूसरे दिन एक व्यक्ति की मौत सड़क पर जानवर से टकराने के कारण होती है। जबकि गंभीर रूप से घायल होने वालों के आंकड़े अत्यधिक हंै। अब जबकि इंसानों के आंकड़े यह हंै, तो गाय सहित पशुओं की मौतों की संख्या कई गुना अधिक है। इन आवारा जानवरों से फसलें बचाने ग्रामीण इन्हें एक गांव से दूसरे गांव की ओर हांकते रहते हैं। बारिश एवं ठन्ड के दिनों में इन जानवरों का बसेरा स्टेट एवं नेशनल हाईवे ही हुआ करता है। जहां बारिश एवं अत्यधिक ठन्ड के कारण खुले में दम तोड़ देते हैं। दूसरी तरफ वाहन चालक इनसे टकराकर स्वयं भी काल के गाल में समा रहे हैं। लेकिन बावजूद इसके राज्य सरकार मुद्दे को लेकर गंभीर नहीं हो सकी है। स्वयंसेवी संगठन एवं सामाजिक संगठन अक्सर गाय की मौतों के लिये बवाल खड़ा करते हैं, वाहन टकराने से गाय की मौत पर वाहन चालकों से मारपीट तक की जाती है। लेकिन समस्या की जड़ में कोई भी जाना नहीं चाहता है। राज्य में सरकारी गौशालाओं की पहले से ही कमी बनी हुई है। जिसके लिये राज्य सरकार ने अनुदान के माघ्यम से सामाजिक संगठनों को गौशाला बनाने के लिये प्रोत्साहित किया था। लेकिन राज्य सरकार द्वारा प्रति पशु जो आहार अनुदान दिया जा रहा है, उसमें जानवरों का पेट नहीं भर पाता है। जिसके कारण सरकारी अनुदान पर खड़ी गौशालाएं पर्याप्त आहार के अभाव में स्वत: ही वधशाला में तब्दील हो रही है। यही कारण है कि राज्य में निजी संस्थाएं इस बावत आगे नहीं आ रही है। दूसरी तरफ राज्य में उन एनजीओ संगठन की संख्या भी कम नहीं है, जो पशु संरक्षण के नाम पर सरकार से अनुदान तो ले रहे हैं लेकिन इनके पशु संरक्षण के कार्य मात्र आडिट के कागजों पर ही दर्ज हो पा रहे हैं। राज्य सरकार के पास ग्रमीण एवं शहरी क्षेत्र में पर्याप्त सरकारी भूमि उपलब्ध है। जहां वह पंचायतों, नगर पंचायतों, नगरपालिका एवं नगर निगम के माध्यम से गौशाला एवं पशु संरक्षण गृह खोल सकती है। सरकार को चहिये की वह प्रत्येक पंचायत एवं नगर पालिका क्षेत्र में कम से कम एक पशु संरक्षण को अनिवार्य करे। जिनके संचालन की जबावदेयी भी इन्हीं संस्थाओं के हाथों में होनी चहिये। इन पशु केन्द्र से प्राप्त होने वाले गोबर एवं गौ मूत्र की आय से यह संस्थाएं आसानी से इन केन्द्रों का सफल संचालन कर पायेगी। फसलों के अवशिस्टों एवं नरवाई से भूसा प्राप्त करके न केवल लावारिस जानवरों की आहार व्यवस्था संभव है, बल्कि नरवाई की आग से प्रति वर्ष होने वाली आगजनी एवं पर्यावरण के नुकसान को भी बचाया जा सकता है। समय रहते सरकार को अब इस गंभीर होती समस्या के लिये त्वरित कदम उठाना होंगे।

सरकार की घोषणाएं झूठी साबित हो रही है
जल, जंगल एवं जानवर की अवधारणा पर 15 वर्ष पूर्व बनी मध्यप्रदेश सरकार का अब इन मुद्दों से कोई विशेष लेना – देना नहीं है। शासन द्वारा गौशाला निर्माण की घोषणाएं झूठी पड़ती नजर आ रही है। चार वर्ष पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विदिशा नगरपालिका के एक शिलान्यास समारोह में विदिशा जिले की गुलाबगंज तहसील अन्तर्गत ग्राम सुआखेड़ी में एक विशाल गौशाला की आधारशिला रखी थी, अब वह शासन के पोर्टल से गायब हो चुकी है। उपरोक्त भूमि को गुलाबगंज तहसील द्वारा चिन्हित कर निर्माण एजेन्सी विदिशा नगरपालिका को सौंपा जाना था। लेकिन विदिशा नगर पालिका द्वारा अपने वायदे से मुकर कर इस योजना को अपनी घोषणा से हटा लिया है। किसी भी सरकार की इससे बड़ी क्या जग हसाई होगी! जब मुख्यमंत्री की आधारशिला को एक झूठी घोषणा का तमगा उसके ही मातहतों द्वारा दिया जा रहा हो!

 

  • विनोद के. शाह
    मो. : 9425640778

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