विभिन्न मौसमों में मुर्गियों की देखरेख

शीतकालीन मौसम में प्रबंधन
शीतकालीन मौसम में मुर्गी आवास की सफाई पुराना बुरादा, पुराने बोरे, पुराना आहार एवं पुराने खराब पर्दे इत्यादि अलग कर देना चाहिए या जला देना चाहिए। वर्षा का पानी यदि आवास के आसपास इक्कट्ठा हो तो ऐसे पानी को निकाल देना चाहिए और उस जगह पर ब्लीचिंग पावडर या चूना का भुरकाव कर देना चाहिए। फार्म के चारों तरफ उगी घास, झाड़, पेड़ आदि को नष्ट कर देना चाहिए। दाना गोदाम की सफाई करनी चाहिए एवं कॉपर सल्फेट युक्त चूने के घोल से पुताई कर देनी चाहिए ऐसा करने से फंगस का प्रवेश दाना गोदाम में रोका जा सकता है। कुंआ, दीवाल आदि की सफाई भी ब्लीचिंग पावडर से कर लेना चाहिए।

मुर्गी पालन में मुर्गियों की मृत्युदर के प्रमुख कारक उनका मौसमानुसार सही प्रबंधन न होना एवं बाहरी बीमारियों का मुर्गी आवास में प्रवेश करना है अत: मृत्यु दर को रोकने के लिये मुर्गी आवास का बताये अनुसार मौसम प्रबंधन करना चाहिये एवं मुर्गी आवास के अदंर/बाहर से बीमारियों के प्रवेश को रोकना चाहिये।

शीतकालीन मौसम में दाने एवं पानी की खपत
शीतकालीन मौसम में दाने की खपत बढ़ जाती है यदि दाने की खपत बढ़ नही रही है तो इसका मतलब है कि मुर्गियों में किसी बीमारी का प्रकोप चल रहा है। शीतकालीन मौसम में मुर्गियों के पास दाना हर समय उपलब्ध रहना चाहिए।
शीतकालीन मौसम में पानीे की खपत बहुत ही कम हो जाती है क्योंकि इस मौसम में पानी हमेशा ठंडा ही बना रहता है इसलिए मुर्गा इसे कम मात्रा में पी पाते है इस स्थिति से बचने के लिए मुर्गायों को बार-बार शुद्ध ताजा पानी बदलकर देते रहना चाहिए।
शीतकालीन मौसम में मुर्गी आवास का प्रबंधन
ठंड के दिनों में मुर्गी आवास को गरम रखने के लिए फार्मर को पहले से सावधान हो जाना चाहिए क्योंकि जब तापमान 10 सेंटीग्रेड से कम हो जाता है तब आवास के शीशे से ओस की बूंद टपकती है इससे बचने के लिए व्यवसायी को अच्छी ब्रुडिग़ कराना तो आवश्यक है ही साथ ही मुर्गी आवास के ऊपर पैरा या बोरे, फट्टी आदी बिछा देना चाहिए एवं साइड के पर्दे मोटे बोरे के लगाना चाहिए, ताकि वे ठंडी हवा के प्रभाव को रोक सकें।

वर्षा के मौसम में प्रबंधन
हमारे देश में बरसात हमेशा जून से सितम्बर माह तक रहती है। इस मौसम में बीमारियाँ बड़ी आसानी से फैलती हैं क्योंकि इस मौसम में नमी बनी रहती है और सूर्य की रोशनी कुक्कट फॉर्म में कम ही आ पाती है बरसात के दिनों में सबसे अधिक परेशानी ई-कोलाई नामक बीमारी से होती है और बीमारी का मुख्य स्रोत कुंआ या नल का पानी होता है इससे बचने के लिए हमेशा डिस्इफेक्टेन्ट दवाई जैसे ब्लीचिंग पावडर 6-10 ग्राम 1000 ली. पानी का उपयोग करना चाहिए

  • पानी के टेंक को हमेशा साफ रखना चाहिए, महीने में कम से कम एक बार चूने से पुताई करनी चाहिए।
  • मुर्गी के दाने में एसीडिफाइर्स का उपयोग करना चाहिए।
  • मुर्गी आवास को हमेशा साफ – सुथरा रखना चाहिए जिससे मक्खियों का प्रवेश न हो सके।
  • वर्षा के दिनों में दूसरी बड़ी समस्या फंगस (फफूंद) की होती है जो कि बड़ी तीव्रता से मुर्गी के दाने में फैलती है।
  • यदि मुर्गी दाने मे थोड़ी सी नमी आ जाती है तो इसमें फफूंद बड़ी तीव्रता से फैल जाती है।
  • इससे बचने के लिए हमें निम्न उपाय करने चाहिए
  • अच्छे एवं ताजे आहार का प्रयोग करना चाहिए।
  • ट्राक्सिन वाईन्डर दवा आहार में आवश्यक रुप से देनी चाहिए।
  • आहार का स्टाक लकड़ी के तख्ते पर करना चाहिए एवं दीवार से एक इंच की दूरी पर रखना चाहिए एवं स्टाक आहार को हमेशा सूर्य का प्रकाश मिलता रहना चाहिए।
  • कुक्कट आहार हेतु जो भी कच्चा माल खरीदना हो वह सूखा होना चाहिए उसमें नमी 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए।
  • यदि दाने (आहार) में फंगस आ गई हो तो ऐसे आहार में ढेले बनने लगते है, इस आहार को हमें मुर्गियों को नहीं देना चाहिए, इसके लिए आहार को तेज धूप में सूखाकर ढेलों को फोड़ देना चाहिए इस सूखे हुए आहार में ट्राक्सिन वाईन्डर दवा जैसे कॉपर सल्फेट, मिलाकर मुर्गियों को देना चाहिए।
  • यदि मुर्गियों ने फफूंद युक्त आहार खा लिया हो तो इस स्थिति में मुर्गियां पतली बीट करने लगती है क्योंकि फफूंद मुर्गियों के यकृत (लीवर) को खराब कर देती है, ऐसी स्थिति में हमें मुर्गियों के पीने के पानी में लीवर टोनिक दवाई देना चाहिए एवं ट्राक्सिन वाईन्डर दवा का उपयोग करना चाहिए। वर्षा के दिनों में मुर्गियों में निम्न बीमारियाँ अक्सर देखी जाती है:-जैसे:- ई.कोलाई, डर्माटाईटिस, नेक्रेटिक एनट्राईटिस, हिपेटाइटिस, काक्सीडियोसिस एवं फंगस टाक्सीसिटी इत्यादि।
गर्मी के मौसम में रखरखाव

  • गर्मी की अधिकता के कारण दाने की खपत में कमी।
  • दाने की खपत कम होने के कारण उत्पादन में कमी।
  • हीट स्ट्रोक (गरमी) के कारण मुर्गियों का मर जाना।
  • मुर्गियों का वजन कम होना।

गर्मी के दिनों में मुर्गी आवास में गर्म छत, दीवार, गर्म हवायें आवास के अंदर इतनी भयानक गर्मी पैदा करते हैं कि मुर्गियां इस गर्मी को सहने में असमर्थ रहती है अत: फार्मर को इससे निपटना बहुत मुश्किल पड़ता है इसके लिए फार्मर को निम्न उपाय करना चाहिए –

  • परदों को पूरा बंद नहीं करना चाहिए, परदों को इतना बंद करें कि मुर्गी आवास में मुर्गियों को सीधे लू न लगे।
  • परदा बंद करने का उद्देश्य सिर्फ इतना होना चाहिए कि पक्षियों को लू से बचाया जा सके एवं ठंडी हवा का प्रवाह बना रहे।
  • यदि आप मुर्गी आवास के अंदर हो और आप अंदर के वातावरण में आराम महसूस कर रहें हो तो यह वातावरण मुर्गियों के लिए अनुकूल है।
  • मुर्गियों में गर्मी का प्रभाव सुबह 11 बजे से रात 9़-10 बजे तक अधिक पड़ता है एवं दाना खाने के बाद गर्मी का असर और बढ़ जाता है।
  • पानी गर्मी के दिनों में ठंडा पिलाना चाहिए, हो सके तो दिन के हर पानी में इलेक्ट्रॉल का उपयोग करना चाहिए।
  • गर्मी के मौसम में दिन के समय दाना कम व पानी ज्यादा पिलाना चाहिए।
  • बोरे के पर्दों को पानी से गीला करते रहना चाहिए।
  • अण्डादेय मुर्गियां जो कि पिंजड़ों में है को स्प्रे की सहायता से गीला करते रहना चाहिए एवं मुर्गी आवास के ऊपर शीट में पैरा बिछाकर स्प्रिंकलर से गीला करते रहना चाहिए।
  • मुर्गी आवास के अंदर पंखे या एग्जास्ट पंखे अवश्य लगाना चाहिए।
  • रात को देर में व सुबह जल्दी दाना देना चाहिए।
  • मुर्गी प्यासी नहीं रहनी चाहिए एवं ठंडा पानी उपयोग में लाना चाहिए।
  • दोपहर के वक्त मुर्गियों को दाना नहीं देना चाहिए।

 

  • डॉॅ. रूपेश जैन
  • डॉॅ. आर.के.एस.तोमर
     email : rupesh_vet@rediffmail.com

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