बाजरा की उन्नत खेती

खेत की तैयारी

बाजरा की खेती के लिए दोमट मृदा जिसमें जल धारण की क्षमता हो व जल निकास की व्यवस्था हो उपयुक्त रहती हैं। वर्षा होते ही एक अच्छी जुताई करें जिससे मिट्टी में पर्याप्त नमी बनी रहती हैं। रेगिस्तानी क्षेत्रों में बिना जुताई के सीधी बुवाई करें। बुवाई के 2-3 सप्ताह पहले 10-15 टन गोबर की खाद प्रति हेक्टर डालकर भूमि में मिला देें।

बीजदर

एक हेक्टर खेत की बुवाई के लिए 4 से 5 कि.ग्रा. प्रमाणित बीज बाने के काम लें।

उन्नत किस्में

आर.एच.बी. 177- यह किस्म जोगिया रोगरोधी तथा शीघ्र पकने वाली इस किस्म के अनाज की औसत पैदावार लगभग 10-20 क्विंटल प्रति हेक्टर तथा सूखे चारे की पैदावार 40-45 क्विंटल प्रति हेक्टर हैं।

आर.एच.बी. 173- बाजरे की संकर किस्म की ऊंचाई 200 सेन्टीमीटर तथा सिट्टों की लम्बाई 30 से 35 सेन्टीमीटर हैं। इस किस्म की पकाव अवधि 75-80 दिन हैं। यह किस्म जोगिया रोग के प्रति रोधक है।

आर.एच.बी. 154– बाजरे की यह किस्म देश के अत्यन्त शुष्क जलवायु वाले क्षेत्रों के लिये अधिसूचित हैें। यह किस्म 70 से 76 दिन में पककर तैयार हो जाती हैं।

आई.सी.एम.एच. 356- यह सिंचित एवं बारानी, उच्च व कम उर्वरा भूमि के लिए उपयुक्त, 75-80 दिन में पकने वाली संकर किस्म हैं। सूखे के लिए मध्यम व तुलासिता रोग प्रतिरोधी इस किस्म की औसत उपज 20-26 क्विंटल प्रति हेक्टर होती हैं।

आई.सी.एम.एच. 155- यह किस्म 80-100 दिन में पककर तैयार होने वाली इस किस्म की उत्पादन क्षमता औसत 18-24 क्विंटल प्रति हेक्टर हैं।

एच.एच.बी. 67- यह किस्म अल्प अवधि वाली, तुलासिता रोग रोधक है। 80-90 दिन में पककर तैयार होने वाली इस किस्म की उत्पादन क्षमता औसत 15-20 क्विंटल प्रति हेक्टर हैं।

राज 171 – यह किस्म मध्यम व सामान्य वर्षा वाले क्षेत्रो हेतु उपयुक्त, 80-85 दिन में पकने वाली इस संकुल किस्म का तना मोटा दो-तीन फुटान वाला एवं दाना हल्की पीली झांई लिये हल्का स्लेटी होता हैं। प्रति हेक्टर 20-25 क्विंटल दाने एवं 45-48 क्विंटल चारे की पैदावार देती हैं।

बाजरा खरीफ की मुख्य फसल है। संकर एवं संकुल किस्मों से स्थानीय फसल की तुलना में पैदावार काफी अधिक होती है। बाजरा की खेती दाना व चारा दोनों के लिए की जाती है। जहां वर्षा 300 से 450 मिलीमीटर होती है इन क्षेत्रों के लिए बाजरा एक प्रमुख फसल मानी जाती है। बाजरे के दाने में 12.5 प्रतिशत जल, 11.6 प्रतिशत प्रोटीन, 5.0 प्रतिशत वसा, 67.0 प्रतिशत कार्बोहाइडे्रट एवं 2.7 प्रतिशत खनिज लवण होते हैं।

बीजोपचार

बीज को नमक के 20 प्रतिशत घोल में लगभग पांच मिनट तक डुबो कर गून्दिया या चैंपा से फसल को बचाया जा सकता हैं। हल्के बीज व तैरते हुए कचरे को जला देना चाहिये। तथा शेष बचे बीजों को साफ पानी से धोकर अच्छी प्रकार छाया मेें सुखाने के बाद बोने के काम में लेना चाहिये। उपरोक्त उपचार के बाद प्रति किलोग्राम बीज को 3 ग्राम थायरम दवा से उपचारित करें। दीमक के रोकथाम हेतु 4 मिलीलीटर क्लोरीपायरीफॉस 20 ई.सी. प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से बीजोपचार करना चाहिए।
बुवाई का समय एवं विधि

बुवाई का उपयुक्त समय मध्य जून से मध्य जुलाई तक है। बीज को 3 से 5 सेमी गहरा बोये जिससे अंकुरण सफलतार्पूवक हो सके। कतार से कतार की दूरी 40-45 सेमी तथा पौधे से पौधे की दरी 15 सेमी रखें।

खाद एवं उर्वरक
बाजरा की बुवाई के 2 से 3 सप्ताह पहले 10-15 टन गोबर की खाद प्रति हेक्टर की दर से देना चाहिए। जिन क्षेत्रों में वर्षा 600 मिलीमीटर या अधिक होती है। वहां अधिक उपज के लिए 90 कि.ग्रा. नाइटोजन एवं 30 कि.ग्रा. फॉस्फोरस प्रति हेक्टर दें। जिन क्षेत्रों में वर्षा 600 मिलीमीटर से कम होती है। वहां अधिक उपज के लिए 30 से 60 कि.ग्रा. नाइट्रोजन एवं 20 से 30 कि.ग्रा. फॉस्फोरस प्रति हेक्टर देना चाहियें। नाइट्रोजन की आधी मात्रा एवं फॉस्फोरस की पूरी मात्रा बुवाई से पहले कतारो मे 10 सेन्टीमीटर गहरा उर कर दें।

खरपतवार नियंत्रण
बाजरा की बुवाई के 3-4 सप्ताह तक खेत में निडाई कर खरपतवार निकाल लें। आवश्यकतानुसार दूसरी निंदाई-गुड़ाई के 15-20 दिन पश्चात् करें। जहां निंदाई-गुड़ाई सम्भव न हो तो बाजरा की शुद्ध फसल में खरपतवार नष्ट करने हेतु प्रति हेक्टेयर आधा कि.ग्रा. एट्राजिन सक्रिय तत्व का 600 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।

सिंचाई
बाजरा की सिंचित फसल की आवश्यकतानुसार समय-समय पर सिंचाई करते रहना चाहिए। पौधे में फुटान होते समय, सिट्टे निकलते समय तथा दाना बनतेू समय भूमि में नमी की कमी नहीं होनी चाहिए।

  • शीशपाल चौधरी
  • डॉ.बी.एल.दुधवाल
  • महेन्द्र चौधरी
  • बाबू लाल
    email: sheeshpalc001@gmail.com

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