आम में जैली सीड दैहिक विकार का प्रबंधन

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जैली सीड समस्या का प्रबन्धन
जैली सीड समस्या के प्रति संवेदनशील प्रजाति संवेदनशील प्रजाति दशहरी में विभिन्न अनुसंधानों द्वारा इस समस्या को रोकने के लिए कई उपाय किये गये, जिनमें से प्राप्त परिणामों के आधार पर महत्वपूर्ण उपाय इस प्रकार हैं:-
पलवार (मल्चिंग)
मल्चिंग एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें पेड़ के चारों तरफ की मिट्टी को ढककर पौधे की वृद्धि तथा उत्पादन की परिस्थितियों को अनुकूल बनाया जाता है। विभिन्न पलवारों में काली प्लास्टिक पलवार की आम के फलों के गुणवत्तायुक्त उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका है। पलवार (मल्चिंग) मृदा तापमान को नियंत्रित करता है और मृदा सौरीकरण खरपतवार, मृदा कीट को नियंत्रित करने, पौधों को पोषक तत्वों की उपलब्धता सुगम करने के साथ-साथ जल संरक्षण का भी कार्य करता है। दशहरी आम के वृक्षों पर तीन वर्षों तक निरन्तर किये गये प्रयोगों से निष्कर्ष निकला कि काली प्लास्टिक पलवार (100 माइक्रान मोटी) के उपयोग से जैली सीड समस्या को काफी कम किया जा सकता है। पलवार के रूप में केले की सूखी पत्तियां भी लाभकारी पाई गई है। प्लास्टिक मल्चिंग से उपचारित पौधों के फलों में भण्डारण में क्रियात्मक भार में कम क्षति पाई गई है

आम के बागानों में जैली सीड एक गंभीर समस्या है। जैली सीड में गुठली के पास का गूदा अधिक पिलपिला हो जाता है, जिससे फलों की गुणवत्ता प्रभावित होती है और फल खाने में स्वादिष्ट भी नहीं लगते हैं। उत्तर भारत की व्यवसायिक प्रजाति दशहरी इस समस्या से सबसे अधिक प्रभावित है, जिसके कारण दशहरी आम की मांग में निरन्तर कमी आ रही है तथा इसके फलों का निर्यात भी क्षमता के अनुरूप नहीं हो पा रहा है। आम की संकर प्रजाति आम्रपाली भी इस समस्या से प्रभावित पायी गयी है जबकि लंगड़ा, बाम्बे ग्रीन एवं चौसा के फलों में यह विकार समय से फलों की तुड़ाई न करने पर ही पाया गया है। इस विकृति के कारण फलों का ठोसपन कम होने के साथ-साथ उनकी भण्डारण क्षमता भी कम हो जाती है। इस तरह के फल देखने में तो सामान्य फलों के समान लगते हैं परन्तु इन्हें काटने पर गुठली के पास का चारों तरफ का भाग जैलीनुमा गहरा पीला एवं अत्यंत मुलायम रहता है। प्रभावित फलों का पोषकमान भी कम होता है।

तथा फलों में कुल विलय ठोस एवं कैरोटिनायड की मात्रायें अधिक पाई गई। प्लास्टिक मल्च के प्रयोग से फास्फोरस एवं पोटेशियम का उद्ग्रहण मृदा की अपेक्षा पौधों में अधिक पाया गया है। साथ ही मृदा में लाभकारी सूक्ष्मजीव जैसे कवक एवं जीवाणु भी ज्यादा पाये गये, जौ पौधों में पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाते हैं।
मिथाइल साइक्लोप्रोपीन का प्रयोग
एथिलीन एक गैसीय पादप हार्मोन है जो फलों को पकाने में मुख्य भूमिका निभाता है। आम की जिस प्रजाति में एथिलीन का उत्पादन तीव्र गति से होता है उसमें फल जल्दी पकते हैं और उन फलों में जैली सीड की समस्या भी अधिक होती है। 1-मिथाइल साइक्लोप्रोपीन फलों में एथिलीन बनाने की प्रक्रिया को कम करता है। अत: इसके प्रयोग से फलों के पकने की गति धीमी हो जाती है फलस्वरूप जैली सीड की समस्या कम हो जाती है। विभिन्न प्रजातियों जैसे दशहरी, चौसा, लंगड़ा, मल्लिका के फलों को 1-मिथाइल साइक्लोप्रोपीन 170 मिलीग्राम प्रति 5 लीटर आयतन की दर से उपचारित किया गया। इससे फलों की एथिलीन, कार्बन डाई ऑक्साइड एवं श्वसन दर मंद हो गई जिसके फलस्वरूप फलों के पकने की गति मंद हो गयी तथा फलों में गलन की समस्या में कमी पायी गयी और इससे फलों की गुणवत्ता में भी सुधार हुआ अत: आम के फलों में जैली सीड समस्या को कम करते हुए फलों की भण्डारण क्षमता बढ़ाने में 1-मिथाइल साइक्लोप्रोपीन एक महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में योगदान दे सकता है।
पोषक तत्वों का प्रयोग
आम के फलों की गुणवत्ता के लिए विभिन्न पोषक तत्वों में कैल्शियम, पोटेशियम एवं बोरान की महत्वपूर्ण भूमिका पायी गयी। इन तीनों तत्वों को विभिन्न मात्राओं में वृक्षों में फलन अवस्था के पहले एवं फलन अवस्था के समय प्रयोग करके जैली सीड समस्या का समाधान किया जा सकता है। इन तत्वों के प्रयोग से फलों को देर से भी तोडऩे पर गलन विकार में काफी कमी पायी गयी। जैली सीड समस्या से प्रभावित दशहरी आम के बागों में तीन वर्षों तक अनवरत शोध के उपरांत इसके प्रबंधन के लिए निम्न संस्तुतियां दी जाती हैं:-

  • विभिन्न प्रकार की पलवार (मल्चिंग) में काली पॉलिथीन की पलवार (100 माइक्रान मोटाई) का प्रयोग सितम्बर-अक्टूबर में तथा मई के द्वितीय सप्ताह (फल तोडऩे के एक माह पूर्व) में फलों पर 2.0 प्रतिशत डाइहाईड्रेटेड कैल्शियम क्लोराइड का छिड़काव करके जैली सीड के प्रभाव को कम किया जा सकता है।
  • दशहरी में 750 ग्राम प्रति वृक्ष की दर से कैल्शियम नाइट्रेट का नवम्बर के द्वितीय सप्ताह में मृदा में प्रयोग तथा फलों पर 1 प्रतिशत पोटेशियम सल्फेट का छिड़काव मई के द्वितीय सप्ताह (फल तोडऩे के एक माह पूर्व) में करने पर जैली सीड समस्या को कम किया जा सकता है।
  • दशहरी प्रजाति में कैल्शियम नाइट्रेट 375 ग्राम तथा बोरेक्स 250 ग्राम प्रति वृक्ष की दर से नवम्बर के द्वितीय सप्ताह में मृदा में प्रयोग तथा इन्हीं तत्वों का पर्णीय छिड़काव क्रमश: 4.5 एवं 1.0 प्रतिशत की दर से मई के द्वितीय सप्ताह (फल तोडऩे के एक माह पूर्व) में करने से जैली सीड की समस्या को बहुत कम किया जा सकता है।
  • कैल्शियम नाइट्रेट 1.5 कि.ग्रा. एवं बोरेक्स 0.5 कि.ग्रा. प्रति वृक्ष की दर से नवम्बर के द्वितीय सप्ताह में मृदा में प्रयोग करने से भी जैली सीड के प्रभाव को कम किया जा सकता है।
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