विशेष आलेख

मामाजी की लोक लुभावन घोषणाएं

मनमानी नीतियां

विगत दिनों प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह ने भोपाल में आयोजित किसान सम्मेलन में किसानों के हित में ढेर सारी लोक लुभावन घोषणाएं की हैं जिनसे एक बात तो भली-भांति स्पष्ट है कि मामाजी की दृष्टि आगामी विधानसभा चुनाव में वापिस सत्ता पाने पर केन्द्रित है। राजनीतिज्ञ हमेशा अगली पीढ़ी के बारे में सोचता है और राजनीतिबाज केवल अपने बारे में। प्रदेश शासन पर लगभग एक सौ पचास लाख करोड़ से अधिक का कर्ज है इसके बावजूद मनमानी करते हुए प्रदेश के संसाधनों को उलीचना कर्ज ले-ले कर बांटना, उधार लेकर घी पीने जैसा है। प्रदेश सरकार स्वयं ऋणग्रस्त है और किसान भी हमेशा ऋणग्रस्त रहें, इन नीतियों का यही निहितार्थ है।

समर्थन मूल्य पर खरीद
केन्द्र सरकार ने गेहूं का समर्थन मूल्य पिछले वर्ष के 1625 रु. की तुलना में बढ़ाकर 1735 रु. प्रति क्विं. कर दिया है। केन्द्र सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि समर्थन मूल्य पर बोनस देकर गेहूं खरीदने पर खाद्य वितरण प्रणाली के लिए आवश्यक सीमा से अधिक खरीद पर अतिशेष गेहूं केन्द्र सरकार नहीं लेगी। अत: बोनस की बजाए कृषि विभाग के माध्यम से भावांतर की प्रोत्साहन राशि देकर म.प्र. सरकार, केन्द्र की आंखों में धूल झोंक रही है।
गेहूं की दो हजार रु. प्रति क्विं. की दर से खरीदी करने पर तात्कालिक रूप से किसान खुश होंगे परन्तु प्रदेश के व्यापारियों के धंधे गेहूं के ऊंचे दाम होने के कारण पिट जाएंगे। महंगा होने से प्रदेश के बाहर गेहूं बेचने पर खरीददार ही नहीं मिलेंगे और स्थानीय उपभोक्ताओं को भी महंगा गेहूं खरीदने पर विवश होना पड़ेगा। अमीरों को गेहूं के दाम बढऩे की परवाह नहीं होती और गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों को शासन लगभग मुफ्त में गेहूं दे ही रही है। मुसीबत केवल मध्यमवर्गीय परिवारों की है जिनका बजट गड़बड़ा जायेगा। छोटे किसानों के पास बेचने लायक अधिक मात्रा में गेहूं उत्पादित नहीं होता केवल सिंचित खेती करने वाले बड़ी जोत के किसानों को ही इससे फायदा होगा। जो समृद्ध किसान हैं वहीं शासन की इस नीति से और अधिक समृद्ध होंगे, दलहन- तिलहन उत्पादन करने वाले किसानों को इससे कोई लाभ नहीं होगा और आगामी वर्षों में वे भी तिलहन – दलहन फसलों की बजाए गेहूं की खेती करने लगेंगे इससे इन फसलों के आयात में शासन को और अधिक आर्थिक भार उठाना होगा। इस अप्रत्याशित मूल्यवृद्धि के कारण किसान और अधिक भूगर्भ जल का दोहन और अधिक उर्वरकों का प्रयोग कर भूमि के उपजाऊपन को खोखला करेगा।
अप्रत्याशित मूल्यवृद्धि के कारण किसानों की यही कोशिश रहेगी कि शासकीय खरीद केन्द्रों पर उनका उत्पादित गेहूं तुरंत बिक जाए जबकि खरीद केन्द्रों की संख्या यथावत है। इन हालातों में खरीद केन्द्रों में किसानों की लंबी कतार दिखाई पड़ेगी। हल्के- पतले माल खरीदने का भी दबाव रहेगा और इन अव्यवस्थाओं के चलते या तो किसानों में आक्रोश बढ़ेगा अथवा खरीद केन्द्र में नियुक्त कर्मचारी किसानों के असंतोष का कोपभाजन होंगे।
सरकार ने एक ओर तो गेहूं के क्रय मूल्य बढ़ा दिये वहीं दूसरी ओर प्रदेश में कार्यरत विद्युत वितरण कंपनियों ने कृषि सिंचाई पम्पों पर विद्युत दर लगभग आठ प्रतिशत बढ़ाने की तैयारी कर ली है, उद्योगों के लिए प्रस्तावित वृद्धि दर मात्र 1.31 प्रतिशत ही है, इससे यह स्पष्ट है कि एक हाथ से देकर दूसरे हाथ से लेने का प्रयास यथावत है।
कस्टम हायरिंग सेन्टर योजना में पेंच
सरकार की एक और घोषणा कि किसान पुत्रों के लिए एक हजार कस्टम हायरिंग सेंटर खोले जायेंगे व उन पर 10 लाख तक का अनुदान मिलेगा, इस योजना का लाभ लेने के लिए चयनित व्यक्ति को बैंक में अंशपूंजी के रूप में 6.25 लाख रु. जमा कराने पड़ेंगे, अब इतनी राशि तो बड़े किसान पुत्र ही जमा करा सकते हैं। इस योजना में बैंक से 10 लाख से कम ऋण लेने पर भी बैंक, शासन द्वारा निर्धारित स्टांप ड्यूटी बंधक के लिए लेते हैं। यह भी जेब काटने जैसा ही है। कारण कि किसान की अंशपूजी और बैंक में जमा शासकीय अनुदान राशि के बाद बैंक द्वारा दिया ऋण 10 लाख से कम ही बैठता है फिर भी 10 लाख से कम ऋण की पूरी राशि पर बंधक के लिए स्टांप ड्यूटी वसूली जा रही है। सरकार की घोषणा है कि जिन लोगों ने शासकीय भूमि, वन भूमि पर अतिक्रमण कर फसल उगाई है, उन्हें भी ओलावृष्टि से प्रभावित होने पर मुआवजा दिया जाएगा। यह सरासर गैर कानूनी काम करने वालों को प्रोत्साहन देना है। राजस्व संहिता में केवल किसानों के लिए क्षति पूर्ति के प्रावधान हैं।

शासन द्वारा प्रदेश के किसान पुत्रों को 50 हजार से लेकर 2 करोड़ तक की राशि उद्योग स्थापित करने के लिए दी जाएगी। किसान भाई ट्रैक्टर के कर्ज की राशि तो बैंकों को चुकाने में असमर्थ हो उठते हैं, जमीनें बिक जाती हैं, ऐसे में क्या ग्रामीण परिस्थितियों में निवासरत किसान पुत्रों की दो करोड़ रु. ऋण लेने की हिम्मत है? किसान पुत्रों के नाम पर भूमिधारी छद्म कृषकों के (बड़े नेताओं, अफसरों- उद्योगपतियों) के पुत्र ही इस योजना का लाभ उठा पायेंगे।

मनमानी नीतियां
मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि शासकीय भूमि के पट्टेदारों को भी अपनी भूमि बटाई पर देने के अधिकार मिल जाएंगे, वस्तुत: जीवन यापन के लिए गरीबों को भूमि के पट्टे कृषि कार्य हेतु दिये जाते रहे हैं लेकिन राजनैतिक स्वार्थपूर्ति के लिए मामाजी यहां भी मनमानी नीति की घोषणा कर रहे हैं। गरीब से खेती नहीं होती तो उससे भूमि वापिस ले लेना ही विधि सम्मत है।
कर्ज का बोझ
जिन 17.5 लाख किसानों ने लोन नहीं चुकाया उन्हें नये लोन देने की घोषणा करना कौन सी आर्थिक नीति है? उनसे पुराने लोन को दो किस्तों में चुकाने की अपेक्षा करना दिवास्वप्न है। पिछले कई वर्षों से प्राकृतिक आपदा से ग्रसित किसानों की ऋण राशि में राहत देने की बजाए मूल राशि यथावत रखकर केवल ब्याज माफी की नीति गरीब किसानों के साथ मजाक है। यही हाल बिजली के बकाया बिलों का है। वस्तुत: ईमानदार किसानों के लिए कोई प्रोत्साहन, पुरस्कार के प्रावधान नहीं करना उन्हें भी बेईमानी के लिए प्रेरित करना है। प्रजातांत्रिक व्यवस्था में बार-बार लोक लुभावन घोषणायें कर राजनेता तो गद्दी पर विराजमान होने में सफल हो जाते हैं लेकिन विपदाग्रस्त किसान के पास बढ़ते ऋण बोझ के कारण फांसी लगाने के सिवा कोई चारा नहीं बचता।
प्रदेश में बारम्बार कृषि कर्मण अवॉर्ड लेते रहने और 0 प्रतिशत ब्याज पर ऋण सुविधा उपलब्ध रहते भी यदि 17.5 लाख किसान ऋण चूककर्ता हैं, कृषि एवं राजस्व विभाग की व्यवस्थायें चौपट हैं, गरीबी के कारण कुपोषण, बाल मृत्यु दर, प्रसव के दौरान महिला मृत्यु दर देश में कीर्तिमान बना रही है तो नीति और क्रियान्वयन तथा कथनी और करनी के संदर्भ अति संक्षेप में यही कहा जा सकता है- ‘मुंह में राम बगल में …. मामाजी की नियत …।’
शासन का प्रमुख कार्य नीति बनाना और उसके क्रियान्वयन का नियमन करना है परन्तु वर्तमान में नीतियां नेता और अफसरशाही मिलकर बना रही है, विशेषज्ञों की इसमें सीमित भूमिका है और विशेषज्ञ भी वही चुने जाते हैं जो हां में हां मिलावें। रही बात क्रियान्वयन की तो पूरी तरह अराजकता व्याप्त है। सरकार के कर्णधार धंधेबाज और फंदेबाज बन गये हैं तथा निरीह असंगठित किसान अपनी दुर्दशा पर आंसू पीने को विवश हैं। दो हजार रु. में बिकने वाला गेहू्ं पूरा का पूरा शासकीय भंडारगृहों में सड़कर अंतत: शराब निर्मिताओं को बेच दिया जाएगा और अनपढ़ गरीब कृषक दारू पीकर ‘आनंदम विभागÓ की योजनाओं के लाभ लेने में मगन रहेंगे, यही नीति और नीयत का वास्तविक निहितार्थ है। शासन की मनमानी नीतियों के कारण पहले ही प्रदेश में दलहन व्यापार चौपट हो गया है। अनेकों दाल मिलें घाटे में चलकर कबाड़ में बिक चुकी हैं और वर्तमान में गेहूं खरीद के मनमाने दाम तय कर मंडी में गेहूं व्यापार पर शासन ने एकाधिकार बना लिया है। गेहूं व्यापार में संलग्न व्यापारी अपने चौपट होते व्यापार के कारण धंधे से किनारा कर लेंगे और कृषि आदान बेचने से लेकर खरीदने तक शासन का एकाधिकार हो जाएगा। ऐसी परिस्थितियों में सरकार की मनमानी नीतियों के चलते किसान को भी चौपट होते देर नहीं लगेगी। मध्यप्रदेश में शासन ही खरीददार है और शासन की विभिन्न एजेंसियों के माध्यम से गेहूं खरीदा जाता है और वे किसान को उसकी उपज का धन देने की बजाए पहले स्वयं द्वारा दिए ऋण की वसूली करता है इसके बावजूद जिला सहकारी बैंकों का अस्तित्व निरंतर बढ़ते घाटे के कारण खतरे में है। निकट भविष्य में देशभर की हर छोटी-बड़ी अनाज मंडी पर सरकारी नियंत्रण करने की केन्द्र सरकार की योजना है तब व्यापारियों के धंधे से बाहर होने तथा अनाज व्यवसाय पर शासन का एकाधिकार होने से निश्चय ही किसान का स्वतंत्र अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।

  • श्रीकांत काबरा, मो. : 9406523699

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