धान के प्रमुख रोग एवं निदान

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भूरी चित्ती रोग:
यह एक बीज जनित रोग है। इस रोग में धान की फसल को जड़ से लेकर दानों तक को नुकसान पहुंचाता हैं। इस रोग के कारण पत्तियों पर गोलाकार भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं। यह रोग फफूंद जनित है। पौधों की बढ़वार कम होती है, दाने भी प्रभावित हो जाते हैं, जिससे उनकी अंकुरण क्षमता पर प्रभाव पड़ता है। पत्तियों पर तिल के आकार के भूरे रंग के काले धब्बे बन जाते हैं। ये धब्बे आकार एवं माप में बहुत छोटी बिंदी से लेकर गोल आकार का होता है। धब्बों के चारों ओर हल्की पीली आभा बनती है। पत्तियों पर ये पूरी तरह से बिखरे होते हैं। धब्बों के बीच का हिस्सा उजला या बैंगनी रंग की होती है। बड़े धब्बों के किनारे गहरे भूरे रंग के होते हैं, बीच का भाग पीलापन लिए, गेंदा सफेद या घूसर रंग का हो जाता है। उग्रावस्था में पौधों के नीचे से ऊपर पत्तियों के अधिकांश भाग धब्बों से भर जाते हैं। ये धब्बे आपस में मिलकर बड़े हो जाते हैं, और पत्तियों को सुखा देता हैं। आवरण पर काले धब्बे बनते हैं। इस रोग का प्रकोप उपजाऊ धान में कम उर्वरता वाले क्षेत्रों में मई-सितम्बर माह के बीच अधिक दिखाई देते हैं।
नियंत्रण –

  • बीजों को थाइरम एवं कार्बेन्डाजिम (2:1) की ग्राम दवा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करके बोना चाहिए।
  • रोग दिखाई देने पर मैन्कोजेब के 0.25 प्रतिशत घोल के 2-3 छिड़काव 10-12 दिनों के अंतराल पर करना चाहिे।
  • अनुशंसित नत्रजन की मात्रा ही खेत में डाले।
  • बीज को बाविस्टीन 2 ग्राम या कैप्टान 2.5 ग्राम नामक दवा  से प्रति किलोग्राम बीज की दर से पहले उपचारित कर लेना चाहिए।
  • खड़ी फसल में इंडोफिल एम-45 की 2.5 किलोग्राम मात्रा को 1000 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव 15 दिनों के अंतर पर करें।
  • रोगी पौधों के अवशेषों और घांसों को नष्ट कर दें।
  • मिट्टी में पोटाश, फास्फोरस, मैग्नीज और चूने का व्यवहार उचित मात्रा में करना चाहिए।

झोंका (ब्लास्ट) रोग:
यह रोग पिरीकुलेरिया ओराइजी नामक कवक द्वारा फैलता है। धान का यह ब्लास्ट राग अत्यंत विनाशकारी होता है। पत्तियों और उनके निचले भागों पर छोटे और नीले धब्बे बनते हैं, और बाद में बढ़कर ये धब्बे नाव की तरह हो जाते हैं। बिहार में मुख्यत: इस रोग का प्रकोप सुगंधित धान में पाया जाता है। इस रोग के लक्षण सर्वप्रथम पत्तियों पर दिखाई देते हैं, लेकिन इसका आक्रमण पर्णच्छद, पुष्पक्रम, गांठों तथा दानों के छिलकों पर भी होता है। मुख्यत: पत्ती ब्लास्ट, पर्णसंधि ब्लास्ट और गर्दन ब्लास्ट के रूप में इस रोग को देखते हैं। यह फफूंदजनित है। फफूंद पौधे के पत्तियों, गांठों एवं बालियों के आधार को भी प्रभावित करता है। धब्बों के बीच का भाग राख के रंग का तथा किनारें कत्थई रंग के घेरे की तरह होते हैं, जो बढ़कर कई सेन्टीमीटर बड़ा हो जाता है। जब यह रोग उग्र होता है, तो बाली के आधार भी रोग ग्रस्त हो जाते हैं, और बाली कमजोर होकर वहीं से टूट कर गिर जाता है। भूरे धब्बों के मध्य भागों में सफेद रंग होता हैं। इस अवस्था में अधिक क्षति होती है। गांठ का भूरा-काला होना एवं सडऩ की स्थिति में टूटना, दानों का खड़ी होना एवं बाली के आधार पर फफू्ंद का सफेद जाल होना नेक राट कहलाता है। क्षत स्थल के बीच का भाग घूसर रंग का हो जाता है। अनुकूल वातावरण में कई क्षतस्थल बढ़कर आपस में मिल जाते हैं, जिसके फलस्वरूप पत्तियां झुलसकर सूख जाती है। गांठों पर भी भूरे रंग के धब्बे बनते हैं, जिससे समुचित पौधे को नुकसान पहुंचता है। तनों की गांठों पूर्णतया या उसका कुछ भाग काला पड़ जाता हैं, कल्लों की गाठों पर कवक के आक्रमण से पूरे धब्बे बनते हैं, जिससे गांठ के चारों ओर से घेर लेने से पौधे टूट जाते हैं।  गर्दन ब्लास्ट में, पुष्पगुच्छ के आधार भाग पर भूरे से लेकर काले धब्बे बन जाते हैं, जो मिलकर चारों ओर से घेर लेते हैं, और प्राय: पुष्पगुच्छ वहां से टूटकर गिर जाता हैं। रोग का गंभीर प्रकोप पाए जाने पर द्वितीयक टैकिली और दाने भी संक्रमित हो जाते हैं। परिणामस्वरूप शत-प्रतिशत फसल की हानि होती है।
नियंत्रण-

  • बीज को बोने से पूर्व बाविस्टीन 2 ग्राम या कैप्टान 2.5 ग्राम दवा को प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर लें।
  • नत्रजन उर्वरक उचित मात्रा में थोड़ी-थोड़ी करके कई बार में देना चाहिए।
  • खड़़ी फसल में 250 ग्राम बाविस्टीन+1.25 किलोग्राम इंडोफिल एम-45 को 1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए।
  • हिनोसान का छिड़काव भी किया जा सकता है। एक छिड़काव पौधशाला में रोग देखते ही तथा दो-तीन छिड़काव 10-15 दिनों के अंतर पर बालियां निकलने तक करना चाहिए।
  • बीम नामक दवा की 300 मिलीग्राम मात्रा को 1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव किया जा सकता है।

पर्णच्छंद अंगमारी/शीथ/बैण्डेड ब्लास्ट/पर्ण झुलसा/शीथ झुलसा/आवरण झुलसा रोग:
धान आच्छद झुलसा जो अब तक साधारणतया एक रोग माना जाता है, भारत के धान विकसित क्षेत्रों में  यह एक प्रमुख रोग बनकर सामने आया है। इस रोग के कारक राइजोक्टोनिया सोलेनाई नामक फफूंदी है, जिसे हम थेनेटीफोरस कुकुमेरिस के नाम से भी जानते हैं। पानी की सतह से ठीक ऊपर पौधे के आवरण एक फफूंद अंडाकार जैसा हरापन लिए हुए स्लेट/उजला धब्बा पैदा करती है। पत्तियों के आधार पर बड़े-बड़े धारीदार हरे-भूरे या पुआल के रंग के रोगी स्थान बनते हैं। बाद में ये तनों को चारों ओर से घेर लेते हैं, क्षर्तों का केन्द्रीय भाग स्लेटीपन लिए सफेद होता है, तथा किनारों पर रंग भूरा लाल होता है और ये क्षत धान के पौधों पर दौंजियां बनते समय एवं पुश्पन अवस्था में बनते हैं। इस रोग के लक्षण मुख्यत: पत्तियों एवं पर्णच्छंद पर दिखाई पड़ते हैं। अनुकूल परिस्थितियों में फफूंद छोटे-छोटे भूरे काले रंग के दाने पत्तियों की सतह पर पैदा करते हैं, जिन्हें स्कलेरोशियम कहते हैं। ये स्कलेरोशियम हल्का झटका लगने पर नीचे गिर जाता हैं। रोग की उग्रावस्था में आवरण से ऊपर की पत्तियों पर भी लक्षण पैदा करती है। सभी पत्तियाँ आक्रांत हो जाती है। पौधा झुलसा हुआ प्रतीत होता है, और आवरण से बालियां बाहर नहीं निकल पाती है। बालियों के दाने भी बदरंग हो जाते हैं।
नियंत्रण –

  • जेकेस्टीन या बाविस्टीन 2 किलोग्राम या इंडोफिल एम-45 की 2.5 किलोग्राम मात्रा को 1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।
  • खड़ी फसल में रोग के लक्षण दिखाई देते ही शेलीडा-माइसिन कार्बेन्डाजिम 1 ग्राम या प्रोपीकोनाजोल 1 मि.ली. का 1.5-2 मिली प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर 10-15 दिन के अंतराल पर 2-3 छिड़काव करें।
  • धान के बीज को स्यूडोमोनास फ्लोरोसेन्स की 1 ग्राम अथवा ट्राइकोडर्मा 4 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करके बुआई करें।
  • घास तथा फसल अवशेषों को खेत में जला देना चाहिए। गर्मी में खेत की गहरी जुताई करें।
  • प्रारंभ में खेत में रोग से आक्रांत एक भी पौधा नजर आते ही काटकर निकाल दें।
  • अधिक नत्रजन एवं पोटाश का उपनिवेशन न करें।

जीवाणुज पत्ती अंगमारी/जीवाणुज पर्ण झुलसा रोग:
जीवाणुज पर्ण झुलसा रोग लगभग पूरे विश्व के लिए एक परेशानी है। भारत वर्ष में यह रोग सबसे गंभीर समस्या बन गया है। यह रोग बिहार में भी बड़ी तेजी से फैल रहा है। यह रोग जैन्थोमोनास ओराइजी पी.वी. ओराइजी नामक जीवाणु से होता है। मुख्य रूप से यह पत्तियों का रोग हैं। यह रोग कुल दो अवस्थाओं में होता है पर्ण झुलसा अवस्था एवं क्रेसेक अवस्था। सर्वप्रथम पत्तियों के ऊपरी सिरे पर हरे पीले जल धारित धब्बों के रूप में रोग उभरता है। पत्तियों पर पीली या पुआल के रंग कबी लहरदार धारियां एक या दोनों किनारों के सिरे से शुरू होकर नीचे की ओर बढ़ती है और पत्तियां सूख जाती हैं। ये धब्बे पत्तियों के किनारे के समानान्तर धारी के रूप में बढ़ते हैं। धीरे-धीरे पूरी पत्ती पुआल के रंग में बदल जाती है। ये धारियां शिराओं से घिरी रहती है, और पीली या नारंगी कत्थई रंग की हो जाती है। मोती की तरह छोटी-छोटी पीले से कहरूवा रंग के जीवाणु पदार्थ धारियों पर पाए जाते हैं, जिससे पत्तियां समय से पहले सूख जाती हैं। रोग की सबसे हानिकारक अवस्था म्लानि या क्रेसक हैं, जिससे पूरा पौधा सूख जाता हैं। रोगी पत्तियों को काटकर शीशे के ग्लास में डालने पर पानी दुधियां रंग का हो जाता है। जीवाणु झुलसा के लक्षण धान के पौधे में दो अवस्थाओं में दिखाई पड़ते हैं। म्लानी अवस्था (करेसेक) एवं पर्ण झुलसा (लीफ ब्लास्ट) जिसमें पर्ण झुलसा अधिक व्यापक है। झुलसा अवस्था पत्ती की सतह पर जलसित्क क्षत बन जाते हैं, और इनकी शुरूआत पत्तियों के ऊपरी शिरों से होती है। बाद में ये क्षत हल्के पीले या पुआल के रंग के हो जाते है, और लहरदार किनारे सहित नीचे की ओर इनका प्रसार होता है। इस अवस्था में ग्रसित पौधों की पत्तियां लंबाई में अंदर की ओर सिकुड़कर मुड़ जाती है।
नियंत्रण –

  • एक ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लिन या 5 ग्राम एग्रीमाइसीन  100 को 45 लीटर पानी घोल कर बीज को बोने से पहले 12 घंटे तक डुबो लें।
  • बुआई से पूर्व 0.5 प्रतिशत सेरेसान एवं 0.025 प्रतिशत स्ट्रेप्टोसाइक्लिन के घोल उपचारित करें।
  • बीजों को स्थूडोमोनास फ्लोरेन्स 10 ग्राम प्रति किलो ग्राम बीज की दर से उपचारित करें।
  • खड़ी फसल में रोग दिखने पर ब्लाइटाक्स-50 की 2.5 किलोग्राम एवं स्ट्रेप्टोसाइक्लिन की 50 ग्राम दवा 80-100 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।
  • खड़ी फसल में एग्रीमाइसीन 100 का 75 ग्राम और कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (ब्लाइटॉक्स) का 500 ग्राम 500 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।
  • संतुलित उर्वरकों का प्रयोग करके, लक्षण प्रकट होने पर नत्रजन युक्त खाद का छिड़काव नहीं करना चाहिए।
  • धान रोपते समय पौधे के बीज की दूरी 10-15 से.मी. अवश्य रखें।
  • खेत में समय-समय पर पानी निकालते रहें तथा नाइट्रोजन का प्रयोग ज्यादा न करें।
  • आक्रांत खेतों का पानी एक से दूसरे खेत में न जाने दें।
  • स्वस्थ प्रमाणित बीजों का व्यवहार करें।

 

  • टिकेन्द्र कुमार
  • Email-tikendrasahu@gmail.com
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