सोयाबीन के मुख्य कीट एवं प्रबंधन

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तना मक्खी: इस कीट की सूंडी अवस्था पौधे के तने को नुकसान पहुंचाती है। सुंडियां जड़ों से लगभग 40 से.मी. ऊपर तने में घुसकर अंदर ही अंदर टेढ़ी-मेढ़ी सुरंग बनाकर तने को खोखला कर देती है। जैसे-जैसे पौधे की लंबाई बढ़ती है वैसे-वैसे यह सूंडी भी आगे बढ़ती जाती है। यदि शुरू में ही इस कीट का आक्रमण हो जाये तो पौधा सूखकर मर जाता है एवं खेत में पौधों की संख्या कम हो जाती है। यदि बाद की अवस्था में आक्रमण हो तो पौधा सूखता नहीं लेकिन तने में सुरंग होने से फलियों में दानों की संख्या, आकार एवं वजन में कमी आती है।
प्रबंधन-

  • खेत की ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करें।
  • समय पर फसल की बुवाई करें।
  • कीट प्रतिरोधी या कीट सहनशील किस्मों की बुवाई करें जैसे- जे.एस.-93-05, जे.एस.-90-41, पी.के.-1042 आदि।
  • बीजोपचार कर बुवाई करें: इमिडाक्लोप्रिड 3 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से करें।
  • खेतों में नीम के बीजों के पाउडर या निंबोली के पाउडर का छिड़काव करते रहना चाहिये।
  • एसीफेट 1.5 ग्राम प्रति लीटर या डाइमिथियेट 2 मि.ली. प्रति लीटर की दर से घोल बनाकर छिड़काव करें।

गर्डल बीटल: यह कीट सोयाबीन की फसल में सर्वाधिक नुकसान पहुंचाता है। इस कीट की मादा पती के डंठल या कोमल तने पर मुखांग से दो चक्र 3 से 7 से.मी. की दूरी पर बनाकर नीचे वाले चक्र के पास तीन छेद बनाती है तथा बीच वाले छेद के पास अंडे देती है। अंडों से भृंगक निकलने के बाद तने को अंदर ही अंदर खाकर खोखला कर देता है। जिससे तना कमजोर हो जाता है तथा जड़ों द्वारा अवशोषित जल व खनिज पत्तियों तक नहीं पहुंच पाता है और संपूर्ण पौधा सूखकर मुरझा जाता है। इस कारण फसल के उत्पादन में काफी कमी आती है।
प्रबंधन –

  • खेत की ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करें।
  • ग्रसित पौधों की पत्तियों व तनों को तोड़कर नष्ट कर दें।
  • कीट प्रतिरोधी किस्मों की बुवाई करें।
  • फंदा फसल के रूप में ढैंचा की बुवाई करें।
  • प्रति हेक्टर 1 लीटर क्विनालफॉस 25 ई.सी. या 1.25 से 1.5 लीटर ट्राइजोफॉस 40 ई.सी. या 1.25 लीटर इथियोन 50 ई.सी. आदि में से किसी एक का छिड़काव करें।

लीफ माइनर : यह कीट पौधे की शुरूआती अवस्था में ही जब 2-3 पत्तियां हो तब आक्रमण शुरू कर देता है। सूड़ी पत्तियों में सुरंग बनाती हुई हरे भाग को खाती है जिससे पत्तियों पर भूरे चकत्ते पड़ जाते हैं। यह कीट कभी-कभी आसपास की पत्तियों को आपस में मोड़कर पत्तियों के ऊतक को खाता है।
प्रबंधन –

  • फसल लेने के बाद अवशेषों को जलाकर नष्ट कर दें।
  • खेत में प्रकाश पारा लगाये।
  • अंडा परजीव्याभ ट्राइकोग्रामा किलोनिस को खेत में छोड़े।
  • सूंडी परजीव्याभ ब्रेकन हेबेटर एवं एपेन्टेलस जबेन्सिस को खेत में छोड़ें।
  • खड़ी फसल पर निंबौली के 5 प्रतिशत घोल का छिड़काव करें।
  • प्रति हेक्टर 2 लीटर क्लोरोपायरीफॉस 20 ई.सी. या 625-750 ग्राम ऐसीफेट 75 एस.पी. या 400-500 मि.ली. लेम्बडा सायहेलोथ्रिन 5 ई.सी. आदि में से किसी एक का छिड़काव करें।

सफेद मक्खी : इस कीट के शिशु वयस्क दोनों ही पत्तियों की निचली सतह पर बैठकर पत्तियों का रस चूसते हैं तथा शहद जैसा चिपचिपा पदार्थ भी छोड़ते है जिस पर फफूंद उत्पन्न होकर पत्तियों का रंग काला कर देती है एवं पत्तियां पूर्ण विकसित होने से पूर्व ही झड़ जाती है। यह कीट विषाणु रोग फैलाने में भी सहायक होता है।
प्रबंधन-

  • प्रतिरोधी किस्मों की बुवाई करें।
  • प्रति हेक्टेयर 30 से 35 पीले या चिपचिपे ट्रेप लगाने चाहिये।
  • खेतों में तथा आसपास की जगहों से खरपतवार नष्ट कर दें।
  • नाइट्रोजन युक्त उर्वरकों का अधिक मात्रा में इस्तेमाल ना करें।
  • इस कीट पर परभक्षी कीट जैसे- क्राईसोपा, कारनिया आदि का खेतों में ज्यादा से ज्यादा संरक्षण करें।
  • अगस्त – सितम्बर में नीम का कम से कम छह बार छिड़काव करें।
  • सफेद मक्खी दिखाई देते ही फिश आयल रेसिन सोप 1.5 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर से छिड़काव करें।
  • प्रति हेक्टेयर 75 ग्राम क्लोथियानिडिन 50 डब्ल्यू. जी. या 1-1.25 ली. ट्राइडोफोस 40 ई.सी. या 500 मि.ली. स्पाईरोमेहिफेम 22.9 ई.सी. या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल. या 150-200 ग्राम एसिटामिप्रिड 20 एस.पी. आदि में से किसी एक का छिड़काव करें।

तम्बाकू की लट : आरंभ में सूडियां पत्तियों की निचली सतह पर दिखाई देती हैं एवं पत्ती के हरे भाग को खुरच कर खाती है जिससे पत्ती छलनी की तरह दिखती है एवं इसमें केवल नसें ही रह जाती है। इसके बाद सूंडी फूलों एवं फलियों पर आक्रमण करती है जिससे उपज में काफी नुकसान होता है।
प्रबंधन –

  • गर्मियों में गहरी जुताई करें।
  • खेतों में प्रति हेक्टेयर 3-4 प्रकाश प्रपंच का उपयोग करें।
  • खेत में चारों ओर अरंडी की फसल की बुआई करें।
  • खेत में अंडें दिखाई देते ही एक सप्ताह के अंतराल पर 6 बार अंड परजीवी ट्राइकोग्रामा किलोनिस के कार्ड फसलों पर लगाएं।
  • अंडों से सुंडियां निकलने पर सूंडी परजीवी ब्रेकोन स्पी. या स्टरनिमा थर्मोफिल्लम सूत्रकृमि खेतों में छोड़ें।
  • खेतों में सूंडी की पहली व दूसरी अवस्था के लिये 8-10 दिन के अंतराल पर प्रति हेक्टर स्पोडोप्टेरा एन.पी.वी. 250 एल.ई. का शाम के समय छिड़काव करना चाहिये।
  • खड़ी फसल में प्रति हेक्टेयर 1 कि.ग्रा. बी.टी. का छिड़काव करें जो इस कीट में रोगजनक है।
  • प्रति हेक्टेयर 1.5 -2 ली. क्विनालफास 25. ई.सी. या 3-5 ली. क्लोरोपायरीफॉस 20 ई.सी. या 1 लीटर क्लोरोफनापीर 10 एस.सी. या 0.875 -1 कि.ग्रा. थायोडीकार्ब 75 डब्ल्यू. पी. में से किसी एक का छिड़काव करें।

सेमीलूपर : इस कीट की सूंडी फसल को नुकसान पहुंचाती है। यह पत्तियों को खुरच कर खाती है। सूंडियों द्वारा पत्तियों के खाये हुए भाग पर सफेद झिल्ली ही रह जाती है। सूंडी बड़ी होने पर पत्तियों में विभिन्न आकार के छेद बनाती हुई खाती है जिससे पत्तियों में केवल शिराएं ही रह जाती है। जिसके कारण पौधों में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया बाधित होती है और पौधा शीघ्र ही मुरझा जाता है। इस कीट का प्रकोप अगस्त-सितम्बर से आरंभ होता है जो फसल के पकने तक रहता है।
प्रबंधन-

  • खेत की ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करे एवं खेत को फसल अवशेषों से मुक्त रखे।
  • खेत में प्रति हेक्टर 3-4 प्रकाश प्रपंच लगाये।
  • खेत में लकड़ी की खपच्चियां लगायें ताकि उन पर पक्षी बैठेंगे तो सूंडी को खा जायेंगे।
  • खड़ी फसल पर प्रति हेक्टर 1 लीटर क्विनालफॉस 25 ई.सी. या 500 मि.ली. प्रोफेनोफॉस 50 ई.सी. आदि का छिड़काव करें।

हरा तेला : इस कीट के शिशु पत्तियों की निचली सतह से रस चूसते हैं जिससे पत्तियां मुडऩे लगती है और इनका रंग लाल, पीला हो जाता है। इस कीट का अत्यधिक प्रकोप होने पर पत्तियां सूखकर झड़ जाती हंै और पौधे की बढ़वार रुक जाती है, जिससे उपज में कमी आती है।
प्रबंधन-

  • अगेती बुवाई करें।
  • खेत में प्रकाश पाश लगाये।
  • पीले चिपचिपे पाश प्रति हेक्टर 30 से 35 लगाये।
  • नाइट्रोजनयुक्त उर्वरक का प्रयोग कम से कम करें।
  • खेत में इस कीट के परभक्षी कीट जैसे क्राइसोपा, कॉक्सीनेलिडस आदि का संरक्षण करें।
  • खेत में समय-समय पर नीम के बीजों के पाउडर या निंबोली के पाउडर का छिड़काव करें।
  • प्रति हेक्टर 100 मि.ली. इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल. या 625 ग्राम एसीफेट 75 एस.पी. या 65 ग्राम थायामेथोक्सोम 25 डब्ल्यू जी. का छिड़काव करें।

 

 

  • कैलाश चन्द्र अहीर द्य आरती सैनी
  • कविता कुमावत
    कीट विज्ञान विभाग, राजस्थान कृषि महाविद्यालय, उदयपुर
    महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर (राज .)
  • email:kcahirento@gmail.com
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