पशुओं का उत्तम आहार ल्यूसर्न

पशुओं का उत्तम आहार ल्यूसर्न

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हरा चारा खिलाने से कई लाभ होते हैं। दुधारू पशु को इससे महत्वपूर्ण पोषक द्रव्य प्रोटीन, शर्करा, खनिज, जीवन सत्व मिलते हैं। हरा चारा स्वादिष्ट होता है अत: पशु उसे चाव से खाता है तो जाहिर हैं कि उसको शुष्क पदार्थ भी मिलते हैं। चारा पाचक होता है अत: पशु का पाचन भी ठीक रहता है लेकिन ‘अति सर्वत्र वर्जयेत’ इस कहावत अनुसार 30 से 35 किलो प्रति पशु प्रतिदिन इससे ज्यादा हरा चारा नहीं खिलाये क्योंकि इससे उन्हें आफरा (पेट में गैस वायु इक_ा होना) की शिकायत हो सकती है।
हरे फलीधारी चारे में रबी में काश्तयोग्य एक चारा हैं ल्युसर्न। इसे आंग्लभाषा में अल्फा अल्फा कहते हैं। इसका अरबी भाषा में अर्थ हैं सर्वोत्तम।
जलवायु
इस चारा फसल की काश्त राजस्थान के अत्यधिक गर्म प्रदेश से लद्दाख के अति ठंडे प्रदेश में भी की जा सकती है। ठंडी जलवायु इस फसल को सुहाती है। यह जिस मिट्टी में पानी की अच्छी तरह से निकासी होती हैं। ऐसी मिट्टी में बढिय़ा बढ़ती है। खेत में पानी का जमाव इसे नुकसानदेह होता है।
काश्त
इस चारा फसल को बोने हेतु अक्टूबर तथा नवम्बर के अंत तक का समय ठीक रहता है। खेत में एक गहरी जुताई कर भुरभुरी मिट्टी की क्यारियां बनायें। खेत समतल बनायें ताकि पानी की निकासी ठीक से हो।
बीज प्रक्रिया
ल्यूसर्न के बीजों का सतही कवच जरा कठिन होता हैं। जिससे अंकुरण ठीक से नहीं हो पाता। अत: बीज को बुआई से पहले (छह से आठ घंटे पहले) पानी में भिगोकर रखें। इसके बाद बीज को राइजोबियम मेलिलोटी नामक जीवाणु संवर्धक से उपचारित कर सकते हैं। यह खास ल्यूसर्न के लिए किया जाता है। फिर बीज छाया में सुखायें।
बुआई
बीज प्रक्रिया के छह से आठ घण्टे बाद अगर शुष्क तथा अर्धशुष्क इलाका हैं जहां तलछटी वाली मिट्टी है तो खेत समतल बनाकर बीज को खेत में ऐसे ही बिखेर सकते हैं। इसके बाद उसे बखर हल्के से चलाकर मिट्टी में मिलायें।

दुग्ध व्यवसाय में निविष्टाओं का खर्च ज्यादा बढ़ गया है अत: मुनाफा कम मिलता है। इसलिए इसे कम करने हेतु दुधारु पशुओं को हरा-पौष्टिक फलीधारी वनस्पति का चारा खिलाना निहायत जरुरी है। ऐसा करने से खुराक का खर्च कम हो जाता है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह की चारा अपने खेत पर ही उत्पादित करना जरुरी है क्योंकि यह सस्ता पड़ता हैं। बाजार में हरे चारे की कीमत काफी बढ़ चुकी हैं अत: वहां से रोजाना चारा खरीदना समय पैसा और मेहनत के लिए पुराता नहीं है।

इसके अलावा ल्यूसर्न बीज को बुआई यंत्र द्वारा सीधी कतारों में 30 से 35 सेंटीमीटर दूरी पर बो सकते हैं। अगर ज्यादा बरसात वाला इलाका है जहां खेत में पानी भर जाता हैंं तो खेत में (रिजेस) बनायें जो एक- दूसरे से 50 से 60 सेंटीमीटर दूर हो। फिर बुआई यंत्र से बुआई करें।
खाद
ल्यूसर्न फसल की अच्छी बढ़वार हेतु उसे फास्फोरस, पोटेशियम, कैल्शियम तथा गंधक (सल्फर) की ज्यादा जरुरत होती है। अत: बुआई के समय 18 किलो नत्रजन, 70 से 75 किलो फॉस्फेट, 40 किलो पोटेशियम और 150 ग्राम सोडियम मॉलीबडेट मिट्टी में डालकर सिंचाई करें। इससे पहले मिट्टी में 20 से 25 टन अच्छी तरह पकी गोबर खाद जिसमें ह्युमस भरपूर है। वह प्रति हेक्टर में डाले और मिट्टी में मिलायें।
सिंचाई
ल्यूसर्न को नमी की जरुरत होती है। अत: जरुरत अनुसार हर हफ्ते 1 या 2 हल्की सिंचाई दें। बुआई के तुरंत बाद सिंचाई करें ताकि अंकुरण अच्छा हो। जाड़े में 15 से 20 दिन के अंतराल से सिंचाई करेंं।
कटाई
जब फसल में फलियां आती हैं तब आखिरी में से लेकर जब फसल के दसवें भाग में फूल आते हैं तब पहली कटाई कर सकते हैं।

  •  डॉ. सुनील नीलकंठ रोकड़े   प्रधान वैज्ञानिक (पशुधन उत्पादन तथा प्रबंधन)  मो. : 09850347022
  • डॉ. रविन्द्र झिंझर्डे  सहायक प्रोफेसर पशुपोषण
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