खेती का प्राणाधार मिट्टी की सेहत जानिए

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मृदा स्वास्थ्य
मृदा अथवा जमीन को अभी तक एक निर्जीव संसाधन माना जाता रहा है। परन्तु तथ्य इसके एकदम विपरीत है। मृदा एक जीवंत निकाय है। जिसके परिभाषित जैविक, रासायनिक और भौतिक गुणधर्म होते है। इनमें से किसी भी एक गुणधर्म में परिवर्तन अथवा बदलाब मृदा के मूलभूत स्वरुप में, उसके स्वभाव में उल्लेखनीय परिवर्तन कर देते है। फलत: मृदा की उर्वरता में खासी कमी देखने को मिलती है। उदाहरण के तौर पर, किसानों द्वारा मुख्य पोषक तत्वों से युक्त रसायनिक उर्वरकों एवं क्षारीय सिंचाई संसाधनों के अंधाधुंध उपयोग ने मृदा स्वास्थ्य सम्बंधित अनेकों प्रश्न खड़े कर दिए है। उत्तर भारत के कई क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ की भूमि को एक वक्त काफी उपजाऊ माना जाता था वो अब कम उत्पादक हो गई है। इस प्रकार परिस्थितियों की वजह से उत्पन्न मृदा को अस्वस्थ मृदा में रखा जा सकता है। कृषकों द्वारा कृत्रिम रूप से संश्लेषित रासायनिक उर्वरकों को जैविक खादों पर प्रधानता देने से मृदा में उपस्थिति लाभदायक सूक्ष्म जीवाणुओं की संख्या भारी कमी भी अस्वस्थ मृदा का प्रमुख कारण है।
भारी औद्योगीकरण एवं शहरीकरण के फलस्वरूप उत्सर्जित होने वाले प्रदूषित जल एवं अपशिष्ट पदार्थो में कैडमियम, लैड निकिल , क्रोमियम इत्यादि विषाक्त तत्वों की मात्रा ज्यादा होती है। किसानभाई जब इन पदार्थो को पोषक तत्वों की तरह कृषि प्रयोग करने लगते है तब शनै: शनै: इन विषाक्त तत्वों की मात्रा बढऩे लगती है। जिसके फलस्वरूप मृदा की पौधों को पोषण प्रदान करने की व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो जाती है। अंतत: ये विषाक्त तत्वों पौधों से होते हुए मानव शरीर को भी क्षति पहुंचाते है।
रसायनिक खादों एवं फसलों को रोगों, हानिकारक कीटों और खरपतवार के नियंत्रण के लिए उपयोग में आने वाले अनेको अन्य रसायनों में जमीन में रहने वाले असंख्य सूक्ष्म जीवों के अस्तित्त्व पर प्रश्न चिह्न लगा दिया है। इसके अलावा पारंपरिक अवैज्ञानिक रीत से अत्यधिक सिंचाई करने से आसानी से प्राप्य पोषक तत्वों के जमीन में नीचे उतर जाते है। जिसके कारण जमीन की नैसर्गिक अम्लता में बदलाव दर्ज किये गए है। बारम्बार एक ही रसायनिक खाद का किसी फसल विशेष में बहुत बरसों तक सतत उपयोग से भी जमीन की उर्वरता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
सामान्यत: मृदा में उपस्थित कार्बनिक पदार्थ, मृदा की अवस्था के अच्छे सूचक होते है। परन्तु रसायनिक खादों पर अत्यधिक निर्भरता एवं नैसर्गिक खाद के कम प्रयोग से भी जमीन के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ा है। जिस से एक समय की उर्वर जमीन भी अनुपजाऊ की श्रेणी में आ गयी है।
मृदा को स्वस्थ रखने के विकल्प एवं प्रबंधन कार्यनीति
समन्वित पोषण प्रबंधन – समन्वित पोषण प्रबंधन एक ऐसी पादप पोषण वयवस्था है जिसमे पोषक तत्वों के प्राकृतिक रूप से उपलब्ध कार्बनिक, जैविक एवं कृत्रिम रूप से संश्लेषित रसायनिक स्रोतों का समुचित और संतुलित समन्वय किया जाता है। ये तीनों पोषक तत्वों के स्रोतों फसलों की आवश्यकता के आधार पर एक विशेष अनुपात (1:2:2 जैविक: कार्बनिक:रसायनिक खाद) प्रदान करने की सलाह दी जाती है ।
प्राकृतिक कार्बनिक खाद में से पौधों को पोषक तत्व के साथ साथ मृदा में कार्बन भी उपलब्ध होता है जो की सूक्ष्म जीवों के लिए ऊर्जा का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। जिसके कारण मृदा जीवंत रहती है और सूक्ष्म जीवों के लिए एक अनुकूल आवास सिद्ध होती है ।
प्रकृति प्रदत्त जीवाणुओं को पहचानकर उनसे बिभिन्न प्रकार के पर्यावरण हितैषी उर्वरक तैयार किये गए हैं जिन्हे जैव उर्वरक बायोफर्टिलाइजर या जीवाणु खाद कहते हैं। दूसरे शब्दों में हम कह सकते है की जैव उर्वरक/जीवित उर्वरक है जिनमे सूक्ष्मजीव विद्यमान होते हैं। यह प्राकृतिक तरीके से पौधों का पोषण करता है। ये रसायनिक खाद से बेहतर व सस्ता होता है। साथ ही यह मिट्टी की प्राकृतिक गुणवत्ता को बनाए रखता है।
जीवाणु खाद के प्रकार
नाइट्रोजन यौगिकीकरण करने वाले : दलहनी फसलें .. राईजोबियम, अन्न फसलें- एज़ोटोबेक्टर, एजोस्पाइरिलम, एसीटोबैक्टर आदि चावल/धान – नीली हरी शैवाल।
फॉस्फोरस घुलनशीलता के लिए – एसपर्जिलस, पैनिसिलियम, सयूडोमोनॉस, बैसिलस आदि।
पोटाश व लोहा घुलनशीलता के लिए – बैस्लिस, फ्रैच्युरिया, एसीटोबैक्टर आदि।
प्लांट ग्रोथ प्रमोटिंग राईजोबैक्टिरिया- बैस्लिस, फ्रलोरिसैंट आदि
माइकोराईजल कवक-एक्टोमाईकोराईजा तथा अरवस्कुलर माईकोराईजा
रसायनिक उर्वरक आज भी पौधों के लिए पोषण के प्रमुख स्रोत हैं। बदती आबादी को ध्यान में रहते हुए, पोधों के पोषण के लिए इनका कोई दूसरा संभावित विकल्प भी निकट भविष्य में नहीं दिखता है। इसलिए अधिक फसलोत्पादन के लिए पोषक तत्वों की जरुरत पूरा करने के लिया रसायनिक खादों का प्रयोग करने अनिवार्य हो गया है।
पौधों के लिए समन्वित पोषक तत्व प्रबंधन के पीछे की मूल विचारधारा ये है की 1) खेत और बाहरी स्रोतों से उपलब्ध कार्बनिक पदार्थों का यथा संभव उपयोग 2) मृदा में पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए जैविक उर्वरकों का महतम्म उपयोग 3) जैव उर्वरक का उपयोग करने के लिए कृषक समुदाय को प्रोत्साहित करना जिससे रसायनिक खादों पर निर्भरता कम की जा सके। जिसके फलस्वरूप मृदा की भौतिक, रसायनिक और जैविक गुणधर्मों को लम्बे समय तक बनाये रखा जा सके। इसके अलावा, समन्वित पोषक तत्व प्रबंधन के अन्य मुख्य उद्देश्य सही समय पर पोषक तत्वों सही मात्रा प्रदान करना है। साथ ही साथ कृषि लागत में उल्लेखनीय कमी लाना जिस से फसल उत्पादन ज्यादा लाभकारी और टिकाऊ बन सके।
समन्वित कीट नियंत्रण – समन्वित कीट नियंत्रण एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें कृषि से संबंधित विभिन्न परिस्थितियों एवं पर्यावरण के साथ सामंजस्य बनाते हुए नासी कीट, रोगों और खरपतवार के नियंत्रण की तकनीकों का प्रयोग किया जाता है। इससे नाशी जीवों की संख्या, सघनता इत्यादि नियंत्रित होते हैं। इसके अलावा विषाक्त किट रासायनों का उपयोग भी कम किया जा सकता है। जिसका कारण मृदा में रहने वाले सूक्ष्म जीवों अपना अस्तित्व कायम रख सकते है।
सिंचाई व्यवस्था एवं पानी की गुणवत्ता –
भारत में प्रचलित परंपरागत सतह आधारित सिचाई पद्धतियां अमूमन कम प्रभावशाली, श्रम साध्य एवं मृदा की उर्वरता को नुकसान कारक होती है। इन विधियों में जल की क्षति तो होती ही साथ ही साथ मृदा की गुणवत्ता पर भी असर पड़ता है। अत: यदि ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई की विधियों को अपनाया जाए तो इन हानियों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। मृदा-स्वास्थ्य को सिंचाई के पानी की गुणवत्ता का भी खास असर पड़ता है। अत: जहाँ तक हो सके पानी की गुणवत्ता की जाँच करा कर ही सिंचाई में उपयोग करना लाभकारी होगा।

  • अंकुश
  • विक्रम सिंह
    मृदा विज्ञान विभाग व सस्य विज्ञान विभाग, चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार
    Email : ktankdhanda@gmail.com
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