गेहूं की खेती के प्रमुख बिन्दु

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भूमि– गेहूं की खेती के लिए अच्छी उर्वरता वाली समतल व अच्छे जल धारण क्षमता वाली दोमट व भारी दोमट भूमि जिसका पीएच मान 5.5 से 6.8 तक हो सर्वोत्तम रहती है।

खेत की तैयारी – गेहूं के लिए मिट्टी पलटने वाले हल से एक जुताई करने के बाद हैरो, कल्टीवेटर या देशी हल से 2-3 बार जुताई कर देते हैं और फिर पाटा लगा देते हैं और धान के ठूंठों को सड़ाने के लिए 15-20 कि.ग्रा. नाइट्रोजन (यूरिया के रूप में) प्रति हेक्टेयर खेत को तैयार करते समय पहली जुताई पर अवश्य देना चाहिए और गोबर की खाद 35-40 क्विंटल मात्रा में देना चाहिए।

बीज का चयन व उपचार  –  बोआई से पहले स्वस्थ्य बीजों का चयन करना आवश्यक होता है और बीज को थायरम 2.5 ग्रा. प्रति किग्रा. की दर से उपचारित कर लें। या पहाड़ी इलाकों में वीटाबैक्स या एग्रोसान जी.एम. या सेरेसान से बीज उपचारित करें।

उन्नत किस्में – 

सिंचित क्षेत्रों में- सोनालिका, यूपी 2003, 115, 262, 368, 2121, एचपी 1102

असिंचित क्षेत्रों में– मगहर, प्रताप (एच.डी. 1981), मुक्ता (एच.आई. 385), यू.पी. 2113, एच.डी. 2888 आई.सी.ए.आर. द्वारा निर्मित गेहूं की नवीनतम विकसित किस्में व्हीएल.829, एच.एस. 420, एच.एस.- 335,  डी.डब्लू.वी – 14, एच.आई. 1500

बोआई समय –

  • सामान्य रूप से गेहूं का बोआई समय नवम्बर का प्रथम पखवाड़ा (1-15 नवम्बर) के बीच गेहूं की बोआई करें।
  • पिछेती बोआई 15 दिसम्बर तक करें।

बीज दर – 

  • सामान्य दशा में 100 कि.ग्रा./हे.।
  • असिंचित क्षेत्र या पिछेती बोआई के लिए 120 किग्रा/हे.।
  • डिबलर द्वारा 25-30 कि.ग्रा/हे.।
गेहूँ एक बहुत ही महत्वपूर्ण फसल है गेहूं की उत्पत्ति दक्षिणी-पश्चिमी एशिया (तुर्की) है तथा इसकी खेती रबी मौसम में की जाती है। इसके दाने में 8-15 प्रतिशत प्रोटीन, 65-70 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, 1.5 प्रतिशत वसा, 2 प्रतिशत खनिज पाया जाता है। गेहूं का उपयोग चपाती (रोटी), डबल रोटी, बिस्कुल, मैदा, सूजी बनाने में किया जाता है।

 

बीज उपचार – 

  • कवकनाशी – वीटावेक्स/बाविस्टीन 3.5 ग्रा./कि.ग्रा. बीज की दर से।
  • कीटनाशी – क्लोरोपाइरीफॅास 450 मिली./100 किग्रा बीज एवं
  • एजेटोबेक्टर – तीन पैकेट प्रति हे. की दर से प्रयोग करें।

पंक्ति की दूरी – 

  • सामान्य दशा में 18-23 सेमी. व गहरायी 5 सेमी.,
  • पौध से पौध की दूरी 10 सेमी.।

बोआई की विधियां – 

  • छिटकवां विधि – 90-100 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर बीज की मात्रा।
  •  सीडड्रिल द्वारा बोआई – 80-90 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर बीज की मात्रा।
  • डिबलर विधि – 25-30 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर बीज की मात्रा।
  • पिछेती बुआई – 125-130 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर बीज की मात्रा।

खाद्य एवं उर्वरकों का प्रयोग – गोबर की खाद 35-40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर समान दशा में सिंचित क्षेत्र मे बौनी किस्म के लिए एमपीके क्रमश: 120: 60: 40 और देशी किस्म के लिए 60: 30: 30 मात्रा उपयोग करनी चाहिए।

सिचाई – 

  • पहली सिंचाई – क्राउनरूट बुवाई के 20-25 दिन बाद (ताजमूल अवस्था से)।
  • दूसरी सिंचाई – बुआई के 40-45 दिन बाद (कल्ले निकलते समय)।
  • तीसरी सिंचाई – बुआई के 60-65 दिन बाद (गांठें बनते समय)।
  • चौथी सिंचाई – बुआई के 80-85 दिन बाद (पुष्पावस्था में)
  • पंचमी सिंचाई – बुआई के 100-105 दिन बाद (दुग्धा अवस्था में)।
  • छठी सिंचाई – बुआई के 115-120 दिन बाद (दाना भरते समय)।
  • सौरभ चन्द्र सोनी
  • डॉ. विनीता देवी

email : saurabhchandrasoni17011993@gmail.com

 

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