न्यूनतम समर्थन मूल्य है तो भावांतर का औचित्य ?

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भारत सरकार ने वर्ष 2017-18 के लिए रबी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा कर दी है। गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य 1735 रु. प्रति क्विंटल निश्चित किये गये हैं जो पिछले वर्ष 2016-17 की तुलना में 110 रु. प्रति क्विंटल अधिक है। वर्ष 2013-14 में गेहूं का समर्थन मूल्य 1400 रु. प्रति क्विंटल था। पिछले चार वर्षों में इसमें मात्र 335 रु. प्रति क्विंटल की वृद्धि की गई है। रबी की प्रमुख दलहनी फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य 150 रु. बोनस सहित 4400 रुपये प्रति क्विंटल की तुलना में 400 रु. अधिक है। रबी की दूसरी प्रमुख दलहनी फसल मसूर का न्यूनतम समर्थन मूल्य 200 रु. बोनस सहित 4000 रु. प्रति क्विंटल घोषित किये गये हैं। वर्ष 2013-14 में मसूर का मूल्य 2950 रु. प्रति क्विंटल घोषित किया गया था। पिछले चार वर्ष में इसमें 1050 रु. प्रति क्विंटल की वृद्धि हुई है।
राजस्थान तथा मध्य प्रदेश की रबी की प्रमुख तिलहनी फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य 200 रु. बोनस सहित 4000 रु. प्रति क्विंटल निश्चित किया गया है जो पिछले वर्ष घोषित मूल्य से बोनस सहित मात्र 300 रु. प्रति क्विंटल अधिक है। पिछले चार वर्षों में सरसों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में बोनस सहित मात्र 950 रु. प्रति क्विंटल की वृद्धि की गई है। जौ तथा कुसुम का न्यूनतम समर्थन मूल्य क्रमश: 1410 तथा 4100 रु. प्रति क्विंटल घोषित किये हैं जो पिछले वर्ष के मुकाबले मात्र 85 तथा 400 रु. प्रति क्विंटल ही अधिक है।
न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि फसल उगाने की लागत में हुई वृद्धि के अनुपात में नगण्य है। दूसरी ओर भारत सरकार हर वर्ष न्यूनतम समर्थन मूल्य तो घोषित कर देती है, परन्तु वह किसानों की फसल को न्यूनतम समर्थन मूल्य में खरीदने की व्यवस्था करने में राज्य सरकारों को बाध्य नहीं कर सकती। फलस्वरूप पंजाब, हरियाणा को छोड़कर देश के अन्य प्रांतों के मात्र 7-8 प्रतिशत किसानों को ही अपनी फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य मिल पाता है। जब भारत सरकार फसल उत्पादन लागत के आधार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा करती है तो किसान को घाटे में फसल बेचनेे को बाध्य क्यों करती है। किसानों के उत्पादों को छोड़कर देश के अन्य उत्पादकों को अपने उत्पाद का मूल्य स्वयं निर्धारित करते हैं। संगठित व्यापारी वर्ग किसान के उत्पादों के मूल्य को अपने हित में निश्चित करते हैं यह देश व किसानों का दुर्भाग्य है। संगठित व्यापारी वर्ग किसानों तथा सरकार पर कितना भारी पड़ता है इसका उदाहरण हमें मध्यप्रदेश शासन द्वारा घोषित भावान्तर योजना में देखने को मिला। प्रदेश सरकार को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर जो भारत सरकार घोषित करती है पर सभी किसानों की फसल खरीदने के लिए व्यवस्था करनी चाहिए, इसके लिए किसानों को भी संगठित होना होगा, ताकि उनको उनकी फसल का उचित मूल्य मिल सके व भावांतर की आवश्यकता ही न पड़े जिसका कोई औचित्य ही नहीं।

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