पंखिया सेम में कीट एवं रोग नियंत्रण

पंखिया सेम (सोफोकारपस टेट्रागोनोलोबस) की खेती कई वर्षों से दक्षिण तथा दक्षिण पूर्व एशिया की समशीतोष्ण तथा आद्र्र जलवायु में होती आ रही है। भारत में इसकी खेती आसाम, मणिपुर, मिजोरम, केरल, तमिलनाडु एवं कर्नाटक के आदिवासियों द्वारा विशेष रूप से अपने बाडिय़ों में लगाया करते थे। परन्तु धीरे-धीरे इसकी उपयोगिता एवं पोषक महत्व को देखते हुए उत्तरी भारत एवं अन्य भागों में इसकी खेती हो रही है। पंखियां सेम की फलियां अपरिपक्व अवस्था में सब्जी के रूप में प्रयोग की जाती है। इसकी पत्तियां, फूल एवं बीजों का उपयोग विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाने में उपयोग करते हैं। इसके बीज में 30-40 प्रतिशत, प्रोटीन, 15-20 प्रतिशत वसा एवं विटामिन ‘ए’ का अच्छा स्रोत पाया जाता है।

कीट
बीन वीबिल (ब्रूकस स्पीसीज) – यह कीट फसल को खेत में अथवा गोदाम में फलियों व बीजों को खाकर नष्ट करता है। प्राय: कीट फलियों पर अण्डा देते हैं जो लार्वा बनने पर फलियों में छेद कर अन्दर चले जाते हैं, व फलियों को नुकसान पहुंचाते हैं।

नियंत्रण – नियंत्रण के लिए कार्बन डाई सल्फाइड का 1.5 से 4 कि.ग्रा. प्रति 1000 घनफुट की दर से धुंआ करना चाहिए इस समय तापक्रम लगभग 60 डिग्री फारेनहाइट से अधिक होना चाहिए।

बीन एफिड – यह बहुत छोटा हरे या काले रंग का कीड़ा होता है, जो कोमल भागों विशेषकर पत्तियों से रस चूसता है।

नियंत्रण – इस कीट के नियंत्रण के लिए निकोटिन सल्फेट (1:600) या पैराथियान (0.25त्न) का छिड़काव करना चाहिए।

 

फली छेदक – यह सेम वर्गीय फसलों के लिए विशेषकर लब-सब सेम के लिए विनाशकारी होता है। इसका प्रकोप सामान्य रूप ठंड में अधिक विनाशकारी होता है। इसके केटरपीलर पहले पत्तियों एवं फलियों पर आक्रमण करते हैं, फिर फलियों में छेद कर अंदर चले जाते हैं और विकसित बीज को खा कर नष्ट कर देते हैं।

नियंत्रण – आक्रमण प्रारंभ होते ही केटरपीलर को हाथ से चुनकर नष्ट कर देना चाहिए। रोगोर 30 ई.सी. 650 मि.ली. प्रति हेक्टेयर फूल लगने के पहले तथा फलियां लगने पर पायरेथ्रम (1:800) का छिड़काव करें।

रोग
एन्थ्रेक्नोज – यह रोग कोलेटोट्राइकम लिण्डेमुथिएनम नामक फफूंद के कारण होता है। रोग का सर्वप्रथम लक्षण बीज पत्राधरों पर छोटे-छोटे धब्बों के रूप में दिखाई देता है, रोग की अधिकता में पतियां मुरझाकर गिरने लगते हैं।
नियंत्रण – फसल चक्र अपनाना चाहिए तथा रोग रहित बीजों को बोना चाहिए, बोने के पहले 0.125 प्रतिशत सेरेसॉन अथवा केप्टान 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें।
पाउडरी मिल्ड्यू – यह रोग एरीसाइफी पोलीगोनी नामक फफूंद के कारण होता है। रोग का आक्रमण जड़ को छोड़कर सभी भागों में दिखाई देता है। पत्तियों एवं फलियों पर सफेद चूर्णी धब्बों के रूप में दिखाई देता है।
नियंत्रण – इस रोग के नियंत्रण हेतु खेत को साफ रखना चाहिए तथा दूसरे परपोशियों को नष्ट कर देना चाहिए। रोग के लक्षण दिखते ही गंधक चूर्ण 27-33 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से भुरकाव 10-15 दिन के अन्तर से करना चाहिए।

 

जडग़ांठ सूत्रकृमि – इस सूत्रकृमि का आक्रमण पौधों के कुछ भागों को छोड़कर सामान्य रूप से सभी सेमों पर होता है, कभी-कभी अधिक संक्रमित मिट्टी में 50 प्रतिशत तक नष्ट हो जाती है। प्रभावित पौधों की जड़ों में गांठें बन जाती है। पौधे छोटे एवं बौने रह जाते हैं।
नियंत्रण – लम्बी अवधि का फसल चक्र अपनाना चाहिए। रोगी फसल की जड़ों को जहां तक संभव हो निकाल कर जला देना चाहिए। नेमागान नाम दवा 12 लीटर प्रति हेक्टेयर से मिट्टी का उपचार फसल बोने के 3 सप्ताह पूर्व करना चाहिए।
रस्ट – यह रोग यूरोमाइसिस फेसियोली नाम फफूंद के कारण होता है, जो सेम वर्गीय फसल पर आक्रमण करता है। सर्वप्रथम लक्षण पत्तियों की निचली सतह पर छोटे-छोटे काले भूरे रंग के धब्बों के रूप में दिखाई देते है व पत्तियां पीली पड़कर गिरने लगते हैं।
नियंत्रण – रोग के लक्षण प्रकट होने से पहले ही 25-30 कि.ग्रा. सल्फर चूर्ण प्रति हेक्टेयर की दर से भुरकाव करना चाहिए।

  • पी.के. भगत
  • जी.पी.पैंकरा
  • श्रवण यादव
  • वाई. के. मेश्राम

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