फसलों में सूक्ष्म पोषक तत्वों का प्रभाव

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जस्ता – मिट्टी में क्षारीयता, मृदा में चूना पत्थर की अधिकता, जलभराव से ग्रसित मिट्टी और जैव पदार्थों की कमी होना।
लोहा– मृदा क्षारीयता, चूना पत्थर की उपस्थिति होना और मिट्टी में जैव पदार्थों का कम होना।
कॉपर – मिट्टी में क्षारीयता और मिट्टी में जैव पदार्थ का कम होना।
मैगनीज – मिट्टी में चूना पत्थर की भरपूर मात्रा, बलुई मृदा में निक्षालन होना और जैविक मिट्टी में जीवाश्म कम होना।
बोरान– मिट्टी में अम्लीयता, मिट्टी में चूना पत्थर की अधिक मात्रा, बलुई मिट्टी में निक्षालन होना तथा जैविक पदार्थों का कम होना।
मोलेब्डेनम– मिट्टी में अम्लीयता, निक्षालित बलुई मृदा तथा निम्न जैवांश वाली मिट्टी।
सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी के लक्षण एवं उपचार
जस्ता – कमी के लक्षण
धान – धान की नर्सरी में जस्ते की कमी के लक्षण पौधों की पत्तियों पर छोटे-छोटे कत्थई रंग के धब्बों के रूप में दिखाई देते हैं। रोपाई के 10 से 15 दिन के बाद जस्ते की कमी आने पर पौधों की तीसरी पत्ती का रंग हल्का पीला दिखाई देने लगता है
गेहूं– जस्ता की कमी होने पर पौधों की पत्तियों पर पीली धारियां बनती है।
चना – बुवाई के 3.4 सप्ताह के पश्चात पत्तियों का रंग लाल भूरा दिखाई देता है।
टमाटर – पत्तियों का आकार छोटा होता है और शिरा के बीच का भाग हल्का या पीला हो जाता है।
उपचार
जस्ते की कमी को दूर करने के लिए जिंक सल्फेट (21 प्रतिशत जस्ता) 25 किलोग्राम बलुई मिट्टी में, 50 किलोग्राम चिकनी मिट्टी के लिए प्रति हेक्टेयर प्रयोग करना चाहिए।
लोहा – कमी के लक्षण
धान – धान की नर्सरी में लोहे की कमी के लक्षण ऊपरी पत्तियों के पीला पडऩे या सफेद होने के पर प्रकट होता हैं, उर्वरक के छिड़काव से यह पीलापन दूर नहीं होता है।
सोयाबीन – लोहे की कमी से नई पत्तियों में शिराओं के बीच का हिस्सा पीला पड़ता है जबकि शिराओं के किनारे का भाग हरा बना रहता है तथा अधिक कमी होने पर नई पत्तियां सफेद पड़ जाती है।
सेब – पौधों की नई पत्तियों में नसों के बीच का भाग पीला पडऩा और नसों का हरा बना रहना।
गन्ना – गन्ने की पेडी में लोहे की कमी के लक्षण प्राय: आते हैं जिससे नई पत्तियों का रंग सफेद या पीलापन लिए होता है।
उपचार – लोहे की कमी के लक्षण धान के नर्सरी, सोयाबीन की फसल और गन्ने की पेड़ी में आ सकते हैं। इसके उपचार के लिए 10 ग्राम फेरस सल्फेट प्रति लीटर मिश्रण का छिड़काव करना चाहिए।
तांबा -कमी के लक्षण
धान – धान की फसल में नई पत्तियों का कुम्लहाना।
गेहूं – गेहूं के पौधों पर नई पत्तियों का कुम्हला कर स्प्रिंग जैसा मुड़ जाना बालियों में दाना न बनना।
फलदार वृक्ष– पेड़ों के तने की छाल फटना, गोंद का जमा होना, नींबू वर्गीय फसलों में मध्य में गोंद का जमा होना तथा पेड़ों की नई शाखाओं का टूटना।
अमरूद – फलों पर भूरे कत्थई धब्बे पडऩा।
सेब – नई पत्तियों के शीर्ष का मृत होना – पत्तियों के किनारे जलना और ऊपर की ओर मुडऩा।
उपचार
तांबे की कमी को दूर करने हेतु मृदा परीक्षण के आधार पर 4-5 किलोग्राम कॉपर सल्फेट (25 प्रतिशत कॉपर) प्रति हेक्टेयर प्रयोग किया जा सकता है। खड़ी फसल में कॉपर की कमी का निदान 2.5 ग्राम कॉपर सल्फेट और 1.25 ग्राम चूना प्रति लीटर के मिश्रण का छिड़काव करके भी दूर किया जा सकता है।
मैग्नीशियम– कमी के लक्षण
गेहूं – पौधों की पुरानी पत्तियों पर छोटे धूसर सफेद धब्बे पड़ते हैं जो बाद में जुड़कर धारी का आकार ले लेते हैं।
गन्ना – गन्ने के पौधों की पत्तियों मे शिराओं के बीच पीलापन दिखाई देता है।
सेब – सेब के पौधों की पुरानी पत्तियों में शिराओं के बीच का भाग पीला पडऩा और पीलेपन का किनारे से मुख्य शिरा की ओर बढऩा।
उपचार
मैगनीज की कमी के लक्षण बलुई भूमि में उगाई जाने वाली गेहूं या मक्का की फसल में देख सकते हैं इसके उपचार के लिए 30 किलो मैगनीज सल्फेट प्रति हेक्टेयर का प्रयोग बुवाई से पूर्व मिट्टी में करें। खड़ी फसल मैं लक्षण दिखाई देने पर 5 ग्राम मैगनीज सल्फेट और 2:30 ग्राम चूना प्रति लीटर के मिश्रित धोल का छिड़काव करना चाहिए।
बोरान – कमी के लक्षण
बोरॉन की कमी के लक्षण अधिकतर सरसों, सूरजमुखी, मूंगफली, फूलगोभी, चुकंदर, कटहल, आम, नींबू, लीची, अंगूर और सेब आदि में दिखाई देते हैं।
धान – धान के पौधे की नई पत्तियों पर सफेद लंबे-लंबे दिखाई देते हैं।
मक्का – मक्के की पौधों में नई पत्तियों पर सफेद लंबे धब्बे एक सीध में बनते हैं जो बाद में जुड़कर लंबी धारी बना लेते हैं तथा भुट्टे में दाने नहीं बनते हैं।
गन्ना – नई पत्तियों में शिराओं के बीच अर्धपारदर्शी धब्बे बनते हैं और नई पत्तियां सूखने लगती है।
आलू – पौधे के शीर्ष की बढ़वार मारी जाती है पौधा झाड़ी की तरह हो जाता है पत्तियां मोटी और ऊपर की ओर मुड़ी हुई हो जाती है, आलू कंद फटने लगते हैं और आकार छोटा हो जाता है।
बरसीम – पौधा छोटा बना रहता है, नई पत्तियों पर किनारे का भाग पीला लाल पड़ जाता है, फूल नहीं आता है पर आसानी से झड़ जाता है।
फूलगोभी – फूल छोटा और देर से बनता है तने के मध्य का भाग खोखला और भूरा पड़ जाता है।
लीची – पत्तियां छोटी होती हैं, कच्चे फल गिरते हैं और फटते हैं तथा फलों की मिठास घट जाती है।
अमरूद – अमरूद के कच्चे फल लंबाई में फट जाते हैं।
सेब – कच्चे फल गिरते हैं और फलों के अंदर का भाग भूरा पड़ जाता है।
उपचार
बोरान की कमी यदि मृदा में हो तो धान की फसल लगाने से पहले 10 किलोग्राम बोरेक्स प्रति हेक्टेयर का प्रयोग करें। यदि खड़ी फसल में बोरान की कमी के लक्षण दिखे तो 2 ग्रामबोरेक्स प्रति लीटर घोल का छिड़काव करना चाहिए।
बोरेक्स को पहले गुनगुने पानी में घोलना चाहिए, आलू के बीजों को 30 ग्राम बोरेक्स प्रति लीटर में आधा घंटा भिगोने के बाद छाया में सुखाकर लगाना चाहिए।
मोलिब्डेनम– कमी के लक्षण
फूल गोभी- पत्तियों के आधार के पास पीलापन दिखाई देता है और धीरे-धीरे मध्य क्षेत्र के दोनों ओर का भाग मृत हो जाता है और केवल पत्ती केशीर्षपर ही हरा भाग रहता है।
सोयाबीन– पत्तियों मेंशिराओं के बीच पीलापन आता है, जड़ों में ग्रंथियां अनेकवछोटी बनती है तथा उनका रंग हल्का पीला पन लिए होता है।
दलहनी फसलें– इनमें जड़ों में प्रभावी ग्रंथियां नहीं बनती और बढ़वार समुचित नहीं होतीहै।
उपचार
मोलिब्डेनम की कमी यदि मृदा में हो और पौधों पर इसके लक्षण दिखाई दें तो उसकी कमी को दूर करने के लिए खड़ी फसल में अमोनियम मोलिब्डेट 2 ग्राम प्रति लीटर का छिड़काव करना चाहिए।

 

  • एस.आर.एस.रघुवंशी
  • ओ.पी.एस.रघुवंशी
  • जे.पी.लखानी
  • email: jplakhani.2020@gmail.com
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